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गुरुवार, 11 नवंबर 2010

वामपंथी सच्चाई - मरोड़ी हुई


मैं एक लम्बे समय तक वामपंथी विचारधारा से प्रभावित रहा हूँ। आज भी मेरे मूल आग्रह वामपंथ से बहुत अलग नहीं है। लेकिन पिछले कुछ सालों से मैं धीरे-धीरे वामपंथ के तौर-तरीक़ों को लेकर बहुत पकता रहता हूँ। और मैंने पाया है कि विचारधारा के नाम पर ये आग्रह अपने विरोधियों के चोले में ढलते जा रहे हैं। जैसे अभी हाल की अरुंधती वाले मसले की मिसाल लीजिये- जिसमें अरुंधती के कश्मीर पर उनके कुख्यात बयान के बाद भाजपा के एक दल ने अरुंधती के घर पर ‘हमला’ किया।

मैंने इसकी रपट टीवी पर देखी थी। बाद में मेरे मित्रों ने फ़ेसबुक और ब्लौग्स पर इस घटना को दक्षिणपंथी गुण्डों द्वारा किए हमले की संज्ञा देते हुए इस लोकतंत्र पर हमला, फ़ासीवाद, और न जाने क्या-क्या बताया। फिर अरुंधती की चिठ्ठी देखी जिसमें उन्होने भी घर का गेट तोड़कर तोड़फोड़ की बात कही, हालांकि उन्होने ख़ुद स्वीकारा कि वे उस वक़्त घर पर नहीं थी। अभी देखता हूँ कि अरुंधती ने न्यूयौर्क टाइम्स में एक लेख में इस घटना का उल्लेख किया है और उन्होने वहाँ इसे हमले की नहीं, एक प्रदर्शन की संज्ञा दी है।

भाजपा का एक दंगाई इतिहास है (है तो वैसे कांग्रेस का भी, और तमाम दूसरी पार्टियों का भी) और जिसके लिए मैं उनका कड़ा विरोधी भी हूँ। लेकिन उनके विरोधी होने भर से मैं उनकी अभिव्यक्ति का भी विरोध करना उचित नहीं समझता। अगर हम अरुंधती और दूसरे वामपंथियों की अभिव्यक्ति की रक्षा के लिए उत्सुक होते हैं तो अपने विरोधियों की अभिव्यक्ति को सहन करने के लिए भी हमें तैयार रहना चाहिये। न कि उनके बोलने के पहले ही –इसने मुझे गाली दी, मुझे मारा- का आरोप लगाने चाहिये। जैसा कि इस मामले में हुआ।

संयोग से चाणक्यपुरी स्थित अरुंधती के पति प्रदीप क्रिशन के घर पर भाजपा के महिला मोर्चे द्वारा इस प्रदर्शन के इस तथाकथित हमले से आभासी जगत पर मची हलचल से पहले मैंने इसकी रपट टीवी पर देखी थी। मैंने देखा कि तक़रीबन सौ औरतें एक बड़े से घर के बड़े से गेट के आगे नारे लगा रही हैं। उनमें से एक औरत एक गमले को उठाकर उसे पटकने का उपक्रम करती है, एक दूसरी औरत उसे रोकती है, पहली उस गमले को वापस जा कर रख देती है। फिर भी कुछ गमले ज़रूर टूटे लेकिन न तो उन्होने किसी पर हमला किया न कोई मारपीट। यहाँ पर दिये वीडियो से साफ़ पता चलता है कि विरोध करने वाली महिलाएं दक्षिणपंथी विचारधारा की ज़रूर थीं मगर हूलिगन या गुण्डी नहीं थीं। उनका विरोध भी टीवी कैमरों के लाभार्थ अधिक है, ऐसा भी साफ़ दिख रहा है।

लेकिन मेरे वामपंथी उदारवादी मित्रों ने इस दक्षिणपंथी गुण्डों का हमला बताया? उनसे ये चूक कैसे हुई? क्या वे वास्तविकता का सही आकलन करने में असमर्थ हैं? ये कैसी असमर्थता है जिसमें पत्थर फेंकने वाली भीड़ अहिंसक कहलाती है और नारे लगाकर प्रदर्शन करने वाली भीड़ हमलावर?

या वे जानबूझ कर अपने पक्ष को मज़बूत करने के लिए अपने विरोधियों की हर हरकत को एक आपराधिक रंगत देने की नीति में यक़ीन रखते हैं? क्या यही मानसिकता दो विरोधी पक्षों के बीच साम्प्रदायिक दंगे जैसी तनाव की स्थिति में भारी जानमाल की क्षति का कारण नहीं बनती है? साम्प्रदायिकता का प्राणपन से विरोध करने वाले मेरे वामपंथी मित्र सच्चाई को अपनी सहूलियत के अनुसार मरोड़ने, और उस मरोड़ी हुई सच्चाई का ऊँचे स्वर से प्रचार करने की दंगाई मानसिकता से कैसे ग्रस्त हो रहे हैं, यह मेरे लिए गम्भीर चिंता का विषय है।


गुरुवार, 29 जनवरी 2009

खालिस मुम्बईया पावभाजी

जी देख ली स्लमडॉग मिलयनेयर। बड़ी चर्चा है फ़िल्म की। देखने के पहले ही तमाम हू-हा सुना। कुछ लोगों ने कुछ कहा। कुछ ने मेरी तरफ़ भी किसी बयान की उम्मीद से तरेरा। पर मैं चुप रहा। आज बोलने को तैयार हूँ।

कैसी लगी? मुझे अच्छी नहीं लगी! ह्म्म.. मतलब मैं अमिताभ बच्चन के बात से सहमत हूँ? नहीं! उन्होने क्या लिखा.. लोगों ने क्या समझा.. उस डिबेट से मैं दूर रहना चाहता हूँ। निजी तौर पर इस फ़िल्म में मुझे कोई मनोरंजक तत्व नहीं मिला बावजूद इसके कि यह फ़िल्म भारत की जटिल सच्चाईयों को सफलता से दो घण्टे में क़ैद कर लेती है।

कुछ इस तरह कि जो भारत को दूर से देख रहे हैं वो अश-अश कर उठते हैं। वैसे ही जैसे मैं औरे मेरे जैसे वर्ल्ड सिनेमा के दूसरे विद्यार्थी योरोपीय, चीनी, ईरानी, वियतनामी और ब्राजीली सिनेमा में देखी गई सच्चाई के आगे धराशायी हो जाते हैं। हमारे लिए वो हमारे मानस में एक अद्भुत रस का संचार करती हैं। मगर क्या मारिया फ़ुल ऑफ़ ग्रेस क्या कोलम्बियाई लोगों के लिए भी एक रोंगटे खड़े कर देने वाली फ़िल्म होगी?

स्लमडॉग फ़िल्म मुझे अच्छी नहीं लगी क्यों कि मेरे लिए उसमें ऐसा कुछ भी नहीं था जिसे देखकर मैं कह उठता अद्भुत! फिर मुझे फ़िल्म की सरपट गति और भन्नाता हुआ संगीत भी पसन्द नहीं आया। दो गाने ज़रूर अच्छे हैं मगर वो भी रहमान का बेस्ट वर्क नहीं है। ये दीग़र बात है कि उसके लिए रहमान साहब को आस्कर से नामांकित किया गया है।

मेरे दूसरे कई दोस्तों को भी फ़िल्म पसन्द नहीं आई लेकिन हमारी राय बुरी तरह माइनॉरिटी में है। दुनिया भर के लोग इस फ़िल्म को महान फ़िल्म बता रहे हैं। IMDB पर उसका स्कोर ८.७/१० और rotten tomatoes पर उसका स्कोर ९४% है। आखिर ऐसा क्या है इस फ़िल्म में जिस पर विदेशी जनता इस तरह फ़िदा हो गई है? फ़िल्म के डाइरेक्टर डैनी बॉय्ल का कहना है कि उनकी फ़िल्म सत्या, दीवार, कम्पनी और ब्लैक फ़्राईडे से प्रभावित है । यानी उनमें दिखाई गई भारत की सच्चाई से।

तो स्लमडॉग का सच क्या है? उसमें भारत की कैसी छवि दिखाई गई है? मैंने ग़ौर से देखा तो पाया कि भारत जिन चीज़ों के लिए जाना जाता है वो सब कुछ है इस फ़िल्म में- पुलिस लॉकप में पिटाई और यातना, अमीर वर्ग का ग़रीब वर्ग की मक़्क़ारी पर गहरा भरोसा, गन्दगी, हगते हुए लोग, गन्द में नहाए हुए लोग फिर भी जीवन के प्रति उत्साहित लोग, हिन्दू-मुस्लिम दंगे, भिखारी, भिखारियों के गैंग, क्रिकेट, फ़िल्म स्टार्स और उनके प्रति दीवानगी, प्रेमियों का मिलना, बिछुड़ना और फिर मिलना, बचपन का प्यार, भाईयों का प्यार और झगड़ा, भाई की भाई से गद्दारी, भाई का भाई के लिए बलिदान, ट्रेन, प्लेटफ़ॉर्म, रोटी, रोटी की चोरी, ताजमहल, इतिहास और इतिहास का मिथक, माफ़िया, रण्डिया, खून, बच्चे, बच्चों के प्रति हिंसा, गालियाँ, टीवी, कौन बनेगा करोड़पति, अमिताभ बच्चन, कॉल सेन्टर, क्न्स्ट्रक्षन बूम और ऑपेरा।

ऑपेरा? वो शायद डाइरेक्टर का अपना कुछ ऑबसेशन होगा। बस एक ऑपेरा को छोड़कर बाक़ी सारे विषय भारत को परिभाषित करते हैं। फ़िल्म में जो कुछ दिखाया गया वो सच भले न हो पर वो भारत के तथाकथित सच से बहुत दूर भी नहीं हैं। मगर उनको पेश करने का अन्दाज़ खालिस मुम्बईया पावभाजी वाला है। जिनको रहमान के फ़र्राटेदार संगीत के तड़के के साथ परोसा गया है।

विदेशी जनता के लिए इतने सारे तत्वों का एक साथ होना एक नया अनुभव है और शायद फ़िल्म की इतनी बड़ी सफलता की वजह है। पर तत्वों का यही मसालेदार तमाशा मेरे लिए मनोरंजक न बन सका। वैसे भी मुझे कभी पावभाजी पसन्द नहीं आई।
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