फ़िल्म सावरिया दोस्तोयेव्स्की की एक रजत रातें नाम की कहानी पर आधारित है- जिस पर फ़्रेंच डाइरेक्टर रॉबर्ट ब्रेसॉन और इटैलियन डाइरेक्टर लूचिनो विस्कोन्ती पहले ही हाथ आजमा चुके हैं। चार रातों की कहानी है.. लड़का लड़की पर फ़िदा है मगर लड़की को अपने पूर्व प्रेमी का इंतज़ार है.. जो लड़के के हज़ार न चाहने पर भी फ़िल्म के अंत में आ ही जाता है। और लड़का फ़िर अकेला रह जाता है।इस महीन कहानी को अपने खास सजावटी फ़्रेम्स में गढ़ते हुए उन्होने सोचा होगा कि मैं एक परदे पर उकेर रहा हूँ अ पोएट्री इन ब्लू.. और एक गुनगुनी सरसराहट उनके मेरूदण्ड में दौड़ गई होगी। और यह सोचकर उनके गर्वीले भाल में तनाव का एक पेंच और कस गया होगा कि इस दफ़े वे सूक्ष्म दोस्तोयेवस्कियन उत्कण्ठा को गढ़ रहे हैं। दिक़्क़त यह है कि सावरिया भंसाली की सभी दूसरी फ़िल्मों की तरह अपने समय, अपने समाज से विछिन्न हैं.. वह एक स्वैर कारीगरी का घमण्डपूर्ण प्रदर्शन है। फ़िल्म में प्रदर्शित उत्कण्ठा में कोई दारुणता नही है और स्थूल शरतचन्द्रीय देवदासीय अतिनाटकीयता भी नहीं है जिसे उनकी उस दर्शक दीर्घा को लत पड़ चुकी है जिसकी मुख्य खुराक एकता कपूर के मद्रास कट वाले टीवी सीरियल्स हैं। और शायद यही उनकी असफलता का मुख्य कारण होगा, अगर फ़िल्म सचमुच असफल है तो! और रही बात उनकी सजावटी फ़्रेम्स की.. निश्चित ही उनमें एक सौन्दर्य है पर ताज़े फूलों का सौन्दर्य नहीं... पानी मारे हुए बासी फूलों का सौन्दर्य भी नहीं.. प्लास्टिक के फूलों का सौन्दर्य.. जो अपने रंगो में असली से भी ज़्यादा आकर्षक दिख सकते हैं.. मगर बे-खुशबू होते हैं।
भंसाली का सिनेमा दुनिया की एक सपाट समझ का सिनेमा है.. उसमें खुलने के लिए कोई परत नहीं होती.. उतरने के लिए कोई गहराई नहीं होती। उनके लिए सिनेमा का मतलब अपने नायक और नायिका को एक खूबसूरत पृष्ठभूमि के सामने खड़ाकर, चलाकर, नचाकर, गवाकर तस्वीर उतारना है। लोग मानते हैं कि वह रूमानी क्षणों की रचना करने में उस्ताद हैं.. निश्चित ही नायक-नायिका के बीच की आपसी नोंक-झोंक और खींच-तान की जो रचना उन्होने ‘हम दे दिल दे चुके सनम’ में की वह आज भी दर्शकों के मानस में दर्ज है। पर उनकी यह कुशलता उन्हे मुम्बईया फ़िल्मों की ‘फ़िल्मी’ कारीगरी का एक बाजीगर ही बनाती है उस से ज़्यादा कुछ नहीं। जिस तरह से उनकी पिछली फ़िल्म को ‘क्रिटिकल एक्लेम’ मिला.. उस से उनको और बहुत सारे लोगों को यह भ्रम बना होगा कि वे एक सच्चे कलाकार हैं। कला की जिस परिभाषा को मैं जानता हूँ उसमें भंसाली का सिनेमा किसी भी तरह से कला के दायरे में नहीं आता। न तो वो अपने समाज को अभिव्यक्त करता है न भंसाली के भीतर के व्यक्ति को.. वह सिर्फ़ और सिर्फ़ एक माल है.. बाज़ारू खपत के लिए।इसका मतलब यह नहीं समझा जाय कि कला का कोई बाज़ार नहीं होता.. होता है ज़रूर होता है.. पर कला और बाज़ार का कोई सीधा रिश्ता नहीं है। बाज़ार में बिकने वाली हर चीज़ कला नहीं है और हर कलात्मक चीज़ की सही पहचान कर पाने की क़ुव्वत बाज़ार में नहीं होती। हो सकता है कि कोई कला तुलसीदास, हिचकॉक और पिकासो की तरह लोकप्रिय हो और कोई कला वैनगॉग की तरह अपने समय में बुरी तरह असफल.. और उसका महत्व काफ़ी सालों बाद ही समझा जा सके।
जो लोग भंसाली के सिनेमा को पसन्द करते रहे हैं उन्हे इस फ़िल्म से निराशा नहीं होगी ये मेरा अनुमान है। और फिर देखने के लिए रनबीर राज और सोनम भी तो हैं.. जो काफ़ी सारे उन लोगों से बेहतर हैं जो फ़िल्मी परिवार के होने की बिना पर ही हमारे सर पर लादे जाते रहे हैं।
फ़िल्म कई बार रनबीर राज का राज कपूर से सम्बन्ध याद दिलाने की कोशिश करती है .. पर व्यर्थ में.. राज कपूर का सिनेमा अपने सारे सपनीले यथार्थ के बावजूद ख्वाजा अहमद अब्बास की ज़मीन से उगता था। सावरिया का यथार्थ अपनी रजत रातों से इतना कटा हुआ है कि उसमें चाँद आता तो ज़रूर है 'साँवरिया' के 'सा' के ऊपर टिकता नहीं.. डूबा ही रहता है।