कश्मीर में हिंसा का दौर एक बार फिर से शुरु हो गया है। ऐसा लगता है कि हालात काफ़ी अच्छे हो चले थे मगर प्रशासन की कुछ बेवक़ूफ़ियों के चलते बद से बदतर हो गए हैं। बेशक़ प्रशासन से ग़लतियाँ हुई हैं मगर पत्थर पर से दूब नहीं उगा करती। एक गहरा असंतोष कश्मीरियों के अन्दर भीतर ही भीतर ही सुलग रहा था जो अवसर पाते ही ज़ाहिर हो गया।
श्राइन बोर्ड से समस्या क्यों?
अमरनाथ श्राइन को दी गई ९९ एकड़ ज़मीन के बारे में कई बाते कही जा रही हैं। पहले तो ये कि ये पूर्व राज्यपाल सिन्हा की घाटी के अन्दर की जा रही ‘एक साज़िश का हिस्सा’ है। दूसरे यह कि किसी बाहिरी व्यक्ति को ज़मीन देना राज्य के क़ानून के खिलाफ़ है। तीसरे यह कि श्राइन बोर्ड में ग़ैर कश्मीरी लोग भरे हुए थे। चौथे यह कि इसके ज़रिये घाटी में हिन्दुओं को बसाने की कोशिश की जा रही है।
बयानों में ये सारी बातें अधिक शालीन भाषा में कही जा रही थीं और तक़रीरों में यही बातें एक भड़काऊ भाषा में। ज़ाहिर है कि दो महीने के लिए अस्थायी शौचालय में किस तरह हिन्दू बसाये जायेंगे इस पर ध्यान देने की किसी ज़रूरत नहीं समझी। क्योंकि मुद्दा श्राइन बोर्ड नहीं था, मुद्दा भीतर बैठा एक अलगाव का भाव था/ है जो किसी रूप में ज़ाहिर होने के लिए मचल रहा था।
उल्लेखनीय है कि मुद्दे और आन्तरिक भाव के बीच यही दूरी जम्मू के आन्दोलन में भी बनी रही। श्राइन बोर्ड के रहने न रहने से बाबा अमरनाथ की गुफ़ा, यात्रा, यात्रियों पर कोई अन्तर नहीं पड़ रहा। और ये बात सच है कि कश्मीरियों ने अपने सारे विरोध के बावजूद यात्रियों और यात्रा को कोई नुक़सान नहीं पहुँचाया। लेकिन जम्मू वाले भी एक गहरे दुराव की भावना का जवाब दुराव की ज़बान से दे रहे थे। जिस के चलते हालात यहाँ तक पहुँचे कि कश्मीर घाटी को जाने वाले राजमार्ग पर ट्रकों की नाकाबंदी हो गई और घाटी की आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित हो गई।
क्या कश्मीर घाटी का इकोनॉमिक ब्लॉकेड हुआ?
इस से इंकार नहीं किया जा सकता कि पैंतालिस पचास दिन लम्बे चले आन्दोलन में घाटी में रोज़मर्रा की चीज़ों की आपूर्ति पर, ज़रूरी दवाईयों आदि पर निश्चित फ़र्क पड़ा होगा। मगर दूसरी तरफ़ आवश्यक वस्तुएं न होने के कारण घाटी में कोई अकाल फैल गया हो ऐसा कम से कम दिखता तो नहीं। क्या आप ने कोई खबर देखी सुनी कि सब्ज़ी आदि के लिए दंगे हुए, या अनाज के लिए लूट हुई, या दवाई उपलब्ध न होने से किसी की जान पर बन आई?
और ऐसा भी नहीं कि घाटी में प्रेस की आज़ादी पर कोई रोक हो? सभी चैनल्स के रिपोर्टर्स स्थानीय कश्मीरी हैं जो इकोनॉमिक ब्लॉकेड की बात बराबर दोहराते हैं; यदि ऐसा होता तो क्या वे उसकी खबर नहीं करते? फिर लोग सब्ज़ी, दवाई आदि की माँग करने के बजाय मुज़फ़्फ़राबाद जाने में अधिक रुचि दिखा रहे हैं। खाने-पीने की इतनी व्यवस्था है कि उत्तेजना में नारे लगा रहे हैं, और सी आर पी एफ़ की चौकियों पर क़ब्ज़ा कर रहे हैं।
वे कह रहे हैं कि कमी हुई तो मान लिया जाय कि अकाल भले न हो पर कमी है। मगर उस कमी ने उन्हे जम्मू के लोगों की माँगों/ भावनाओं को समझने के बजाय मुज़फ़्फ़राबाद से होकर पाकिस्तान जाने वाले दूसरे रास्ते को खोलने की ओर उन्मुख किया। तो क्या वे जम्मू से अधिक जुड़ाव मुज़फ़्फ़राबाद से महसूस करते हैं?
असल मामला क्या है?
दो तीन दिन से हुर्रियत के नेता कहने लगे हैं कि मुद्दा इकोनॉमिक ब्लॉकेड नहीं है, मुद्दा श्राइन बोर्ड को दी गई ज़मीन नहीं है, मुद्दा कश्मीर की हुर्रियत का है.. कश्मीरी भारत के साथ नहीं रहना चाहते। वे आज़ादी चाहते हैं.. स्वतंत्र होने की या पाकिस्तान में मिल जाने की। तो बात साफ़ है कि ये मुद्दे सिर्फ़ अवाम की भावनाओं को भड़काने के लिए थे। मुख्य बात भारत के विरुद्ध एक ग़दर करना है और इस ग़दर में लगभग तीस लोग शहीद हो गए।
वे भारतीय राज्य से क्या उम्मीद कर रहे थे कि वह हज़ारों कश्मीरियों को यूँ ही मुज़फ़्फ़राबाद में चले जाने देगा? अति-संवेदन शील नियंत्रण रेखा जहाँ से लगातार आतंकवादियों को घुसाने की कोशिश होती रही और पिछले दो महीने से बार-बार युद्ध-विराम का उल्लंघन किया जा रहा है। उस नियंत्रण रेखा के पार आम जनता को आने-जाने का हक़ उन्हे कोई सामान्य सुरक्षाकर्मी दे देगा? क्या उन्हे गोली चलने का अन्देशा नहीं था? या वे जानते थे कि इसका क्या खतरनाक अंजाम हो सकता है मगर जनता के भीतर एक ग़ुस्सा भड़काने के लिए उन्होने जानबूझ कर ये क़दम उठाया?
शर्तिया वे जानते थे कि उनके इस क़दम से राज्य की तरफ़ से कुछ हिंसा होगी और जिसका इस्तेमाल वो अपने हित में करना चाहते थे। कश्मीरी नेतागण एक स्वर से अपने इस पूरे आन्दोलन को एक बेचारी, सताई हुई मगर फिर भी सेक्यूलर छवि देने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं।
मेरे एक कश्मीरी मित्र का आकलन है कि कश्मीरियों को पैथेटिक प्ले (दयनीय बनने का नाटक करना) करने की बीमारी होती है, और इस वक़्त भी वे यही कर रहे हैं बल्कि पिछले साठ साल से करते आ रहे हैं। वो पैथेटिक प्ले कर रहे हों या नहीं हालात सचमुच पैथेटिक हैं।
कश्मीरी अलगाववाद क्या एक साम्प्रदायिक आन्दोलन है?
कश्मीरियों नेताओं, अवाम और बुद्धिजीवियों का मानना है कि उनका आन्दोलन सेक्यूलर है और पूरी तरह से कश्मीरियत की भावना से ओत-प्रोत है। कश्मीरियत क्या है वो मैं नहीं जानता, और उस पर टिप्पणी भी नहीं करना चाहता। और मैं ये मानता हूँ कि जिस तरह से जम्मू का हर आन्दोलनकारी भाजपाई और संघी नहीं है वैसे ही हर कश्मीरी मुसलमान पाकिस्तान का झण्डा लहराने और हिन्दुस्तान का जलाने में यक़ीन नहीं रखता।
मैं ये भी समझता हूँ कि घाटी से पंडितों को खदेड़ने में चन्द उग्रवादियों की ही भूमिका थी लेकिन किसी भी साम्प्रदायिक दंगे में हिंसा करने वाले चन्द गुण्डे ही होते हैं चाहे वो अहमदाबाद में हो या श्रीनगर में। लेकिन मूक दर्शकों की असहमति किसी तरह से तो दर्ज होनी चाहिये..? जैसे गुजरात के हिन्दू २००२ के दंगो के लिए किसी बड़े पश्चाताप विहीन हैं वैसे ही पण्डितों को भगाने के खिलाफ़ किसी प्रकार की असहमति दर्ज कराने कश्मीरी सड़क पर नहीं उतरे हैं। इसलिए घाटी से अल्पसंख्यकों का सफ़ाया हो जाने पर सेक्यूलरिज़्म का दम्भ करना शायद उनके लिए आसान होगा पर मेरे लिए उसे स्वीकार कर पाना कठिन है।
कश्मीरियों के साम्प्रदायिक न होने के तर्क में एक ही बिन्दु है कि हाल के तमाम प्रदर्शनों के बीच भी अमरनाथ यात्रियों को कोई नुक़सान नहीं पहुँचा। क्या सिर्फ़ अपने से इतर धर्मावलम्बी पर हमला करना ही साम्प्रदायिकता है? मेरे मत से वो दंगाई मानसिकता है मगर साम्प्रदायिकता इस से गहरी चीज़ है, वह तमाम रूप में अभिव्यक्त होती है।
नेट पर उपलब्ध डिक्शनरी डॉट कॉम पर कम्युनलिज़्म का अर्थ यह मिलता है.. strong allegiance to one's own ethnic group rather than to society as a whole यानी समूचे समाज से अधिक अपने जातीय समुदाय के प्रति प्रबल निष्ठा।
अगर यहाँ समूचा समाज पूरा हिन्दुस्तान न भी समझा जाय तो कम से कम जम्मू व कश्मीर राज्य ही माना जाय। एक समस्या है जिसके दो पहलू हैं- कश्मीर और जम्मू। इस में दोनों ही पक्ष के लोग दूसरे को साम्प्रदायिक और खुद को सेक्यूलर बता रहे हैं। जम्मू वालों में प्रबल साम्प्रदायिक तत्व हैं ये सभी मानने को तैयार हैं मगर कश्मीर वाले आन्दोलनकारी सब सेक्यूलर हैं ये मानने में मुझे तक़लीफ़ हो रही है।
न तो वे धर्म-निरपेक्षता के अर्थ में सेक्यूलर हैं और न ही सर्व धर्म सम भाव के अर्थ में। और ग़ैर-साम्प्रदायिक के अर्थ में यदि वे सेक्यूलर हैं तो उनकी निष्ठा के दायरे में जम्मू के हिन्दू भी तो आने चाहिये? मगर घाटी के सभी नेता, जी सभी नेता सिर्फ़ कश्मीर घाटी की संवेदनशीलता को समझते हैं और उसके दर्द, उसके आक्रोश और उसके नाइंसाफ़ियों के लिए दिल रखते हैं, जम्मू के दर्द और आक्रोश के लिए उनके दिल में जगह क्यों नहीं जबकि पाकिस्तान और फ़िलीस्तीन के लिए है? क्या महज़ अपने जातीय समुदाय के प्रति निष्ठा यानी साम्प्रदायिकता नहीं है?
लेकिन आप कश्मीरियों को सीना ठोंक-ठोंक कर खुद को सेक्यूलर और जम्मू वालों को हिन्दू हूलिगन्स कहने से नहीं रोक सकते। ये उनका अधिकार है कि किसी शब्द का वो कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं। शब्दों में उनके सही अर्थ बने रहने की उम्मीद करना आज की तारीख में बचकाना चिंतन है।
कश्मीर क्या एक और फ़िलीस्तीन है?
कश्मीरी लोग अकसर अपनी तुलना फ़िलीस्तीन से करते हैं। ये ठीक बात है कि कश्मीर घाटी में सेना की बड़ी मौजूदगी है और उनके द्वारा अक्सर मानव अधिकारों का हनन भी होता है। पर ये कोई अनोखी स्थिति नहीं है। दुनिया के किसी भी भाग में आप सेना से मानवीय व्यवहार की उम्मीद नहीं कर सकते, उसका चरित्र ही अमानवीय है। वो चाहे बुश का इराक़ या सद्दाम का, मुशर्रफ़ का पाकिस्तान हो या भारत के उत्तर पूर्वीय राज्य; सेना का चरित्र दमनकारी ही रहता है।
कश्मीर के लोगों का दूसरी बड़ी शिकायत उनके लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर है। सत्तासी-अट्ठासी के चुनावों में बड़े पैमाने पर धांधली हुई और जीते हुए उम्मीदवारों को हरा दिया गया। इन में से एक सैय्यद सलाहुद्दीन भी थे जो पाकिस्तान स्थित कश्मीरी आतंकवादी संगठन हिज़्बुल मुजाहिदीन के मुखिया हैं। चुनावी धांधलियाँ भी भारत और दुनिया भर में आम हैं। इन असंतुष्ट कश्मीरियों का चहेता पाकिस्तान तो उल्लेख योग्य भी नहीं जबकि अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश खुद एक धांधली के बाद ही अमरीकी राष्ट्र के मुखिया की गद्दी पर क़ाबिज़ हुए।
कश्मीरियों पर अत्याचार के ये दो मुख्य आधार जायज़ ज़रूर हैं पर उन्हे किस नज़र से फ़िलीस्तीन के समकक्ष रखते हैं मेरी समझ के बाहर है। कैसे कोई कश्मीर और फ़िलीस्तीन को एक ही वाक्य में कह सकता है?
कश्मीर के मुसलमानों को बेघर किया गया .. नहीं।
उनके घरों को ढहाया गया.. नहीं।
उनकी ज़मीन छीनी गई.. नहीं।
बाहर से लाकर विधर्मियों को बसाया गया.. नहीं।
ये किस तरह का फ़िलीस्तीन है?
उलटे खुद कश्मीरियों ने घाटी के अल्पसंख्यकों को खदेड़ कर बाहर कर दिया और फिर भी वे खुद की तुलना फ़िलीस्तीनियों से करने का मंशा रखते हैं। आखिर फ़िलीस्तीनियों और कश्मीरियों में क्या समानता है, सिवाय इसके कि दोनों मुसलमान हैं? और यदि यही उनके साथ (और पाकिस्तान के साथ) एकता और जुड़ाव महसूस करने का एकमात्र बिन्दु है तो ये साम्प्रदायिकता नहीं तो और क्या है?
क्या उन्हे अलग होने का हक़ है?
हिन्दुस्तान ने कश्मीर पर हमला कर के क़ब्ज़ा नहीं किया। कश्मीर के राजा हरि सिंह ने हिन्दुस्तान और पाकिस्तान से स्वतंत्र एक लग राज्य के रूप में कश्मीर के अस्तित्व को रखने का फ़ैसला किया था। मगर जब पाकिस्तानी कबाईलियों ने हमला किया तो हरि सिंह घबरा गए। क्योंकि पाकिस्तान के साथ जाने से कश्मीर के मुसलमानों का तो कोई नुक़्सान न होता मगर घाटी के पण्डितों, जम्मू के डोगरों और लद्दाख के बौद्धों का जीवन संकट में पड़ जाता।
इसलिए उन्होने पाकिस्तान के साथ न मिल कर धर्म निरपेक्ष हिन्दुस्तान के साथ मिलने का फ़ैसला किया, लेकिन अपनी स्वायत्तता की शर्त के साथ जो धारा ३७० के रूप में भारतीय संविधान में ससम्मान शामिल की गई। कश्मीर को भारतीय संघ में शामिल करने के बाद ही भारतीय सेना उनकी मदद के लिए गईं। और तब की नियंत्रण रेखा आज तक क़ायम है।
पाकिस्तान बार-बार जिस संयुक्त राज्य के प्रस्ताव की बात करता है उस के अनुसार पहले पाकिस्तानी सेना को उसके द्वारा अधिकृत कश्मीर को खाली करना होगा उसके बाद ही किसी जनमतसंग्रह किया जा सकता है। (और कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने वाले नेहरू थे, जिन्ना नहीं।) पाकिस्तान जनमत संग्रह की बात तो करता है मगर खुद के क़ब्ज़ियाए हुए कश्मीर को खाली करने की नहीं। पाकिस्तान सिर्फ़ भारत अधिकृत कश्मीर में यह जनमत संग्रह कराना चाहता है कि वे भारत में रहेंगे, पाकिस्तान में, या एक स्वतंत्र राज्य में?
मेरी निजी राय है कि कश्मीरी आन्दोलन साम्प्रदायिक है। मगर उस के साम्प्रदायिक आन्दोलन होने से वे कोई कम मनुष्य नहीं हो जाते और मानवीय अधिकार उतने ही बने रहते जितने कि किसी और के। यदि वे अलग होना चाहते हैं तो उन्हे अलग होने देना चाहिये। किसी जाति, किसी समूह को आप बन्धक बना कर अपने साथ नहीं रख सकते और न रखना चाहिये। इस में न उन का लाभ है न हमारा उलटे दोनों का नुक़्सान है।
कश्मीरियों को पाकिस्तान से मिलना है, मिल जायँ। मेरे अनुसार तो उन्हे यह हक़ बहुत पहले दे देना चाहिये था। अगर आज कश्मीरी पाकिस्तान के साथ होते तो हो सकता था कि वे हिन्दुस्तान के क़रीब होते और पाकिस्तान के खिलाफ़ अत्याचार का आरोप लगा रहे होते। पर भारत सरकार ने न तो उन्हे अपने यूनियन में मिलाया और न ही अलग होने दिया। भारत सरकार के लिए साँप-छ्छूँदर की स्थिति बनाए रखी और कश्मीरियों के भीतर एक ऊहापोह की।
सवाल बस एक रह जाता है कश्मीरियों को यदि अलग होने/ पाकिस्तान से मिलने का हक़ दिया जाता है तो कश्मीरी पण्डितों के उस ज़मीन पर हक़ का क्या होगा? वो तो फ़िलीस्तीनियों की तरह बहुसंख्यक भी नहीं है और न ही उनको निकालने वाले मुसलमान कहीं बाहर से आए हैं। उन्हे अलग से कोई पानुन कश्मीर तो देने से रहा। और जब भारत के अधिकार में होते हुए वापस कश्मीर लौटने का साहस जब उन पण्डितों में नहीं तो एक बार कश्मीर के पाकिस्तान में मिल जाने के बाद ऐसी कोई सम्भावना बनेगी इस में तगड़ा शक़ है।
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शनिवार, 16 अगस्त 2008
बुधवार, 6 अगस्त 2008
उबल रहा है जम्मू..
जम्मू में अमरनाथ श्राइन बोर्ड विवाद से उपजे आन्दोलन के चलते हुए पैंतीस दिन हो गए। अब कांग्रेस आरोप लगा रही है कि भाजपा लोगों को भड़का कर चुनावी रोटियाँ सेंकना चाहती है। मगर जम्मू के कांग्रेसी नेता भाजपाईयों के साथ मिलकर जम्मू बंद में हिस्सा ले रहे हैं। और मुझे यह इस बात का सबूत मालूम देता है कि इस आन्दोलन से जम्मू की आम जनता की आंकाक्षाएं जुड़ गई हैं। पर दुख की बात ये है कि ऐसे आन्दोलनो को अपने हितों का साधन बनाने वालों की बन आई है। जम्मू और कश्मीर घाटी दोनों जगह बिल्ली के भाग से छींके फूट चुके हैं।
उधर कश्मीर घाटी के राजनीति के नेतागण टीवी पर आ आ कर धमकियाँ दे रहे हैं। कोई कह रहा है कि ९९ एकड़ ज़मीन के लिए आप कश्मीर से हाथ धो बैठेंगे। कोई अपील कर रहा है कि कश्मीर को फ़िलीस्तीन मत बनाइये। और ये नेता इस तरह का अलगाववादी सुर इसलिए अलाप रहे हैं क्योंकि चुनाव नज़दीक हैं और उन्हे लगता है कि इन उबलते हुए जज़बातों के बीच वे समझौतावादी समझदारी की बातें करेंगे तो उनकी चुनावी नैया डूब जाएगी।
पर हालात बुरे हैं बहुत बुरे। जब मुस्लिम कट्टरपंथी कश्मीरी जमातों के दबाव में आकर ग़ुलाम नबी आज़ाद ने अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई ज़मीन वापस ले ली थी तभी उन्होने एक ऐसी बुनियादी ग़लती कर दी थी कि भाजपा और अन्य हिन्दू साम्प्रदायिक दल उसका भरपूर फ़ायदा उठाकर जनता को भड़का सकें। श्राईन बोर्ड को दी गई ज़मीन को वापस लेने का फ़ैसला किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता।
कश्मीरी मुसलमान को डर है कि इस तरह ज़मीन हथिया कर के कश्मीर घाटी में हिन्दुओं को भरने की साज़िश की जा रही है। क्या किसी के डर के आधार पर सरकार फ़ैसले करती है? मुझे डर है कि दूसरा मेरा गला काटने वाला है इसलिए सरकार मेरे डर के आधार पर उसे जेल में डाल दे? ये तो माइनॉरिटी रिपोर्ट जैसा मामला हो गया। घाटी के लोगों की संवेदशीलता को सम्बोधित करने के चक्कर में वे जम्मू के लोगों के प्रति संवेदनहीन हो गए।
जम्मू के हिन्दुओं को इस बात पर प्रतिक्रिया करना स्वाभाविक था खासकर तब जब कि वहाँ रहने वालों में एक अच्छी संख्या कश्मीरी पण्डितों की हो जिन्हे बीस साल पहले कश्मीर घाटी से खदेड़ दिया गया। एक लम्बे अरसे से घाटी में मुस्लिम कट्टरपंथियों ने अलगाववाद और आतंकवाद की राजनीति की है, आज जम्मू से उसका विद्रूप जवाब आ रहा है।
ये समस्या कांग्रेस की खड़ी की हुई है जिस का फ़ायदा भाजपा और कट्टर कश्मीरी संगठन उठा रहे हैं और नुक़सान देश का हो रहा है।
उधर कश्मीर घाटी के राजनीति के नेतागण टीवी पर आ आ कर धमकियाँ दे रहे हैं। कोई कह रहा है कि ९९ एकड़ ज़मीन के लिए आप कश्मीर से हाथ धो बैठेंगे। कोई अपील कर रहा है कि कश्मीर को फ़िलीस्तीन मत बनाइये। और ये नेता इस तरह का अलगाववादी सुर इसलिए अलाप रहे हैं क्योंकि चुनाव नज़दीक हैं और उन्हे लगता है कि इन उबलते हुए जज़बातों के बीच वे समझौतावादी समझदारी की बातें करेंगे तो उनकी चुनावी नैया डूब जाएगी।
पर हालात बुरे हैं बहुत बुरे। जब मुस्लिम कट्टरपंथी कश्मीरी जमातों के दबाव में आकर ग़ुलाम नबी आज़ाद ने अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई ज़मीन वापस ले ली थी तभी उन्होने एक ऐसी बुनियादी ग़लती कर दी थी कि भाजपा और अन्य हिन्दू साम्प्रदायिक दल उसका भरपूर फ़ायदा उठाकर जनता को भड़का सकें। श्राईन बोर्ड को दी गई ज़मीन को वापस लेने का फ़ैसला किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता।
कश्मीरी मुसलमान को डर है कि इस तरह ज़मीन हथिया कर के कश्मीर घाटी में हिन्दुओं को भरने की साज़िश की जा रही है। क्या किसी के डर के आधार पर सरकार फ़ैसले करती है? मुझे डर है कि दूसरा मेरा गला काटने वाला है इसलिए सरकार मेरे डर के आधार पर उसे जेल में डाल दे? ये तो माइनॉरिटी रिपोर्ट जैसा मामला हो गया। घाटी के लोगों की संवेदशीलता को सम्बोधित करने के चक्कर में वे जम्मू के लोगों के प्रति संवेदनहीन हो गए।
जम्मू के हिन्दुओं को इस बात पर प्रतिक्रिया करना स्वाभाविक था खासकर तब जब कि वहाँ रहने वालों में एक अच्छी संख्या कश्मीरी पण्डितों की हो जिन्हे बीस साल पहले कश्मीर घाटी से खदेड़ दिया गया। एक लम्बे अरसे से घाटी में मुस्लिम कट्टरपंथियों ने अलगाववाद और आतंकवाद की राजनीति की है, आज जम्मू से उसका विद्रूप जवाब आ रहा है।
ये समस्या कांग्रेस की खड़ी की हुई है जिस का फ़ायदा भाजपा और कट्टर कश्मीरी संगठन उठा रहे हैं और नुक़सान देश का हो रहा है।
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