रविवार, 31 अगस्त 2008

वाल-ई में हॉलीवुडीय कचड़ा

पृथ्वी एक कबाड़खाने में तब्दील हो चुकी है। जीवन का कहीं नामोनिशान नहीं है, सिवाय एक तिलचट्टे के जो वाल-ई नाम के एक रोबोट का पालतू है। न कोई इन्सान है, न जानवर, और न पेड़-पौधे। सोलर बैटरीज़ से चलने वाला वाल-ई हर जगह छितरे पड़े कबाड़ को छोटे-छोटे घन में बदलने की बुद्धिमान मशीन है। उस के भीतर इतनी मनुष्यता है कि आप ये महसूस करने लग सकते हैं कि सम्भव है कि मनुष्य भी एक अति-विकसित मशीन है जो अपना पुनरुत्पादन कर सकता है।

स्टार वार्स के आर टू डी टू की याद दिलाने वाला वाल-ई एक रोज़ पाता है कि एक स्पेस-शिप एक अन्य रोबोट को उसकी विध्वंस दुनिया में छोड़ गया है। वाल-ई से कहीं अधिक विकसित ये रोबोट अपनी प्रकृति में बेहद विनाशकारी है और थोड़ी सी आहट पर ही मिसाइल छोड़ देता है/देती है।

थोड़े ही घटना क्रम के बाद ये स्थापित हो जाता है कि उसका नाम ईवा है और वह सम्भवतः स्त्रीलिंग है (नाम है ईवा)। आगे की कहानी इन दोनों रोबोट के बीच एक रूमानी सम्बन्ध पर टिकी है जिस पर आगे चलकर डिज़्नी हमें साइंस फ़िक्शन और फ़ेयरी टेल रोमांस का चाशनी में लथेड़ने लगता है। (कभी-कभी सोचता हूँ कि हम रोमांस के कितने भूखे हैं? हॉलीवुड तो तब भी दूसरी कि़स्म की फ़िल्में बनाता है पर हम...?)

ईवा विनष्ट और ज़हरीली हो चुकी पृथ्वी पर जीवन की दुबारा खोज करने आई है। जैसे ही उसे एक पौधे की भेंट वाल-ई द्वारा प्राप्त होती है, उसका सिस्टम शट डाउन हो जाता है। और वह अपने मिशन की सफलता का सिगनल अन्तरिक्ष में भेजने लगती है। वाल-ई उसकी इस चुप्पी से परेशान हो जाता है और अपना सारा क्रिया कलाप भूलकर उसी का दीवाना हो जाता है। यहाँ तक कि ईवा को लेने आए स्पेस-शिप पर लटक कर स्पेस स्टेशन एक्सिऑम तक पहुँच जाता है।

एक्सिऑम पर मनुष्य हैं जो पृथ्वी के नष्ट हो जाने के बाद से हज़ारों साल से किसी ऐसे ग्रह की तलाश में हैं जिस पर रहा जा सके। इस यात्रा का उनकी बोन डेन्सिटी पर इतना अधिक दुष्प्रभाव पड़ा है कि वे खड़े तक नहीं हो सकते और अपने सभी कामों के लिए रोबोट पर निर्भर हैं। अमरीकी जीवन(और धीरे-धीरे शेष दुनिया) जिस बीमारी की चपेट में फूलता जा रहा है उस मैक्डॉनाल्ड संस्कृति की एक भयावह तस्वीर दिखती है यहाँ.. जो मशीनीकरण और बाज़ारीकरण पर एक अच्छी टीप है।

पर बहुत जल्दी फ़िल्म एक ऐसे बेहूदे कथानक की बैसाखियाँ पकड़ लेती है जिस के सहारे डिज़्नी आज तक अपनी हर फ़िल्म बेचता आया है जिस में हीरो-हीरोइन का प्यार और शेष जनता का जयजयकार करना मूल कथ्य बन जाता है। लायन किंग और फ़ाइन्डिंग नीमो तक तो भी तब ठीक था अब वे उन्ही मूर्खताओं को मशीनों पर भी आरोपित कर रहे हैं।

मुझे हैरानी होती है कि क्या वे सचमुच सोचते हैं कि वाल-ई का कथ्य कुछ कमज़ोर रह जाता अगर एक्सिऑम के सारे रोबोट्स और सारे मनुष्य वाल-ई और ईवा की हीरो वरशिप न करते?

वाल-ई का ये पर्यावरण सम्बन्धी सन्देश डिज़्नी ने जापानी एनीमेशन फ़िल्म्स के धुरन्धर हयाओ मियाज़ाकी से सीखा है मगर उस में वो अपनी हॉलीवुडीय खुड़पेंच करने से बाज़ नहीं आए और एक अच्छी खासी फ़िल्म को ज़बरदस्ती के मसालों से सस्ता बना गए। मैं मियाज़ाकी का भक्त हूँ क्योंकि वे अपने सन्देश में मूर्खताओं का मिश्रण किए बिना ही उन्हे इतना सफल बनाना जानते हैं कि डिज़्नी भी उनसे ईर्ष्या करता है।

मियाज़ाकी तो, आप थियेटर तो क्या शायद डीवीडी लाइब्रेरी में भी न पा सकें.. वाल-ई तो देख ही लें.. तमाम सीमाओं के बावज़ूद बेहतर फ़िल्म है।

आप के देखने के लिए मियाज़ाकी की तमाम फ़िल्मों के टुकड़ों को लेकर बनाया गया एक वीडियो यहाँ चिपका रहा हूँ.. आनन्द लीजिये..

रविवार, 24 अगस्त 2008

हमारे नाकामयाब पड़ोसी

सन २००५ से यूनाईटेड स्टेट्स थिंक टैंक, फ़ण्ड फ़ॉर पीस और फ़ॉरेन पॉलिसी पत्रिका एक सालाना मानक जारी करते हैं जिसे वे फ़ेल्ड स्टेट्स इन्डेक्स कहते हैं। आम तौर पर फ़ेल्ड स्टेट्स की परिभाषा में वे राज्य गिने जाते हैं जिनकी केन्द्रीय सत्ता इतनी कमज़ोर है कि वे अपने भूभाग की सुरक्षा नहीं कर सकते। दार्शनिक मैक्स वेबर के अनुसार जो राज्य बलप्रयोग के वैध इस्तेमाल पर इजारेदारी क़ायम रख सकता है वो राज्य एक सफल राज्य है अन्यथा असफल।

मूलतः इसी आधार पर इस सूची को तय करने के बारह मानक तय किए गए हैं-

सामाजिक मानक
१) आबादी के दबाव
२) शरणार्थियों या विस्थापितों की गतिविधि
३) आपस में प्रतिशोधी हिंसा में संलग्न गुट
४) लोगों का लगातार पलायन

आर्थिक मानक
५) सामूहिक आधार पर गैर-बराबरियाँ
६) विकट आर्थिक मन्दी

राजनैतिक मानक
७) राज्य का आपराधीकरण या वैधता का अभाव
८) सार्वजनिक सेवाओं का ह्रास
९) मानवाधिकारों का हनन
१०) राज्यसत्ता के भीतर अन्य सत्ताओं का जन्म
११) शासक वर्ग के बीच गहरी गुटबाज़ी
१२) बाहरी राज्य या बाहरी सत्ताओं की दखलन्दाज़ी


इन मानको के आधार पर हर साल तक वे फ़ेल्ड स्टेट्स की सूची निकालते रहे हैं। राहत की बात है कि भारत फ़ेल्ड स्टेट नहीं है। मगर अफ़सोस की बात है कि लगभग हर साल ही हमारे कई पड़ोसी देश, २० सबसे नाकामयाब राज्यों की सूची में जगह पाते रहे हैं।

इन पड़ोसियों के नाम हैं- पाकिस्तान, अफ़्ग़ानिस्तान, नेपाल, बांगलादेश, बर्मा और श्रीलंका। मैं जानता हूँ कि ये मानक अन्तिम सत्य नहीं है पर ऐसा भी नहीं है कि ये सूची नितान्त सत्यविहीन है। समझ में नहीं आता कि खुश हुआ जाय या दुखी ही बने रहा जाय।

भारत कामयाब राज्य है क्योंकि इस परिभाषा के तमाम अन्य मानको पर वो अपेक्षाकृत खरा उतरता है और साथ ही साथ अपने भू-भाग के भीतर बलप्रयोग पर उसकी इजारेदारी को कोई वैध चुनौती भी नहीं दे सका है। सताने वाली दुविधा यह है कि यदि भारत कश्मीरियों को उनकी जनतांत्रिक आकांक्षाओं के अनुसार आज़ादी दे देता है तो ये जनतांत्रिक मानकों पर तो नैतिक क़दम होगा मगर अपने भू-भाग के भीतर बलप्रयोग की इजारेदारी का समर्पण कर के क्या वह एक नाकामयाब राज्य बनने की ओर तो नहीं खिसक जाएगा?

शनिवार, 16 अगस्त 2008

कश्मीर: पत्थर पर दूब

कश्मीर में हिंसा का दौर एक बार फिर से शुरु हो गया है। ऐसा लगता है कि हालात काफ़ी अच्छे हो चले थे मगर प्रशासन की कुछ बेवक़ूफ़ियों के चलते बद से बदतर हो गए हैं। बेशक़ प्रशासन से ग़लतियाँ हुई हैं मगर पत्थर पर से दूब नहीं उगा करती। एक गहरा असंतोष कश्मीरियों के अन्दर भीतर ही भीतर ही सुलग रहा था जो अवसर पाते ही ज़ाहिर हो गया।

श्राइन बोर्ड से समस्या क्यों?
अमरनाथ श्राइन को दी गई ९९ एकड़ ज़मीन के बारे में कई बाते कही जा रही हैं। पहले तो ये कि ये पूर्व राज्यपाल सिन्हा की घाटी के अन्दर की जा रही ‘एक साज़िश का हिस्सा’ है। दूसरे यह कि किसी बाहिरी व्यक्ति को ज़मीन देना राज्य के क़ानून के खिलाफ़ है। तीसरे यह कि श्राइन बोर्ड में ग़ैर कश्मीरी लोग भरे हुए थे। चौथे यह कि इसके ज़रिये घाटी में हिन्दुओं को बसाने की कोशिश की जा रही है।

बयानों में ये सारी बातें अधिक शालीन भाषा में कही जा रही थीं और तक़रीरों में यही बातें एक भड़काऊ भाषा में। ज़ाहिर है कि दो महीने के लिए अस्थायी शौचालय में किस तरह हिन्दू बसाये जायेंगे इस पर ध्यान देने की किसी ज़रूरत नहीं समझी। क्योंकि मुद्दा श्राइन बोर्ड नहीं था, मुद्दा भीतर बैठा एक अलगाव का भाव था/ है जो किसी रूप में ज़ाहिर होने के लिए मचल रहा था।

उल्लेखनीय है कि मुद्दे और आन्तरिक भाव के बीच यही दूरी जम्मू के आन्दोलन में भी बनी रही। श्राइन बोर्ड के रहने न रहने से बाबा अमरनाथ की गुफ़ा, यात्रा, यात्रियों पर कोई अन्तर नहीं पड़ रहा। और ये बात सच है कि कश्मीरियों ने अपने सारे विरोध के बावजूद यात्रियों और यात्रा को कोई नुक़सान नहीं पहुँचाया। लेकिन जम्मू वाले भी एक गहरे दुराव की भावना का जवाब दुराव की ज़बान से दे रहे थे। जिस के चलते हालात यहाँ तक पहुँचे कि कश्मीर घाटी को जाने वाले राजमार्ग पर ट्रकों की नाकाबंदी हो गई और घाटी की आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित हो गई।

क्या कश्मीर घाटी का इकोनॉमिक ब्लॉकेड हुआ?
इस से इंकार नहीं किया जा सकता कि पैंतालिस पचास दिन लम्बे चले आन्दोलन में घाटी में रोज़मर्रा की चीज़ों की आपूर्ति पर, ज़रूरी दवाईयों आदि पर निश्चित फ़र्क पड़ा होगा। मगर दूसरी तरफ़ आवश्यक वस्तुएं न होने के कारण घाटी में कोई अकाल फैल गया हो ऐसा कम से कम दिखता तो नहीं। क्या आप ने कोई खबर देखी सुनी कि सब्ज़ी आदि के लिए दंगे हुए, या अनाज के लिए लूट हुई, या दवाई उपलब्ध न होने से किसी की जान पर बन आई?

और ऐसा भी नहीं कि घाटी में प्रेस की आज़ादी पर कोई रोक हो? सभी चैनल्स के रिपोर्टर्स स्थानीय कश्मीरी हैं जो इकोनॉमिक ब्लॉकेड की बात बराबर दोहराते हैं; यदि ऐसा होता तो क्या वे उसकी खबर नहीं करते? फिर लोग सब्ज़ी, दवाई आदि की माँग करने के बजाय मुज़फ़्फ़राबाद जाने में अधिक रुचि दिखा रहे हैं। खाने-पीने की इतनी व्यवस्था है कि उत्तेजना में नारे लगा रहे हैं, और सी आर पी एफ़ की चौकियों पर क़ब्ज़ा कर रहे हैं।

वे कह रहे हैं कि कमी हुई तो मान लिया जाय कि अकाल भले न हो पर कमी है। मगर उस कमी ने उन्हे जम्मू के लोगों की माँगों/ भावनाओं को समझने के बजाय मुज़फ़्फ़राबाद से होकर पाकिस्तान जाने वाले दूसरे रास्ते को खोलने की ओर उन्मुख किया। तो क्या वे जम्मू से अधिक जुड़ाव मुज़फ़्फ़राबाद से महसूस करते हैं?

असल मामला क्या है?
दो तीन दिन से हुर्रियत के नेता कहने लगे हैं कि मुद्दा इकोनॉमिक ब्लॉकेड नहीं है, मुद्दा श्राइन बोर्ड को दी गई ज़मीन नहीं है, मुद्दा कश्मीर की हुर्रियत का है.. कश्मीरी भारत के साथ नहीं रहना चाहते। वे आज़ादी चाहते हैं.. स्वतंत्र होने की या पाकिस्तान में मिल जाने की। तो बात साफ़ है कि ये मुद्दे सिर्फ़ अवाम की भावनाओं को भड़काने के लिए थे। मुख्य बात भारत के विरुद्ध एक ग़दर करना है और इस ग़दर में लगभग तीस लोग शहीद हो गए।

वे भारतीय राज्य से क्या उम्मीद कर रहे थे कि वह हज़ारों कश्मीरियों को यूँ ही मुज़फ़्फ़राबाद में चले जाने देगा? अति-संवेदन शील नियंत्रण रेखा जहाँ से लगातार आतंकवादियों को घुसाने की कोशिश होती रही और पिछले दो महीने से बार-बार युद्ध-विराम का उल्लंघन किया जा रहा है। उस नियंत्रण रेखा के पार आम जनता को आने-जाने का हक़ उन्हे कोई सामान्य सुरक्षाकर्मी दे देगा? क्या उन्हे गोली चलने का अन्देशा नहीं था? या वे जानते थे कि इसका क्या खतरनाक अंजाम हो सकता है मगर जनता के भीतर एक ग़ुस्सा भड़काने के लिए उन्होने जानबूझ कर ये क़दम उठाया?

शर्तिया वे जानते थे कि उनके इस क़दम से राज्य की तरफ़ से कुछ हिंसा होगी और जिसका इस्तेमाल वो अपने हित में करना चाहते थे। कश्मीरी नेतागण एक स्वर से अपने इस पूरे आन्दोलन को एक बेचारी, सताई हुई मगर फिर भी सेक्यूलर छवि देने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं।

मेरे एक कश्मीरी मित्र का आकलन है कि कश्मीरियों को पैथेटिक प्ले (दयनीय बनने का नाटक करना) करने की बीमारी होती है, और इस वक़्त भी वे यही कर रहे हैं बल्कि पिछले साठ साल से करते आ रहे हैं। वो पैथेटिक प्ले कर रहे हों या नहीं हालात सचमुच पैथेटिक हैं।

कश्मीरी अलगाववाद क्या एक साम्प्रदायिक आन्दोलन है?
कश्मीरियों नेताओं, अवाम और बुद्धिजीवियों का मानना है कि उनका आन्दोलन सेक्यूलर है और पूरी तरह से कश्मीरियत की भावना से ओत-प्रोत है। कश्मीरियत क्या है वो मैं नहीं जानता, और उस पर टिप्पणी भी नहीं करना चाहता। और मैं ये मानता हूँ कि जिस तरह से जम्मू का हर आन्दोलनकारी भाजपाई और संघी नहीं है वैसे ही हर कश्मीरी मुसलमान पाकिस्तान का झण्डा लहराने और हिन्दुस्तान का जलाने में यक़ीन नहीं रखता।

मैं ये भी समझता हूँ कि घाटी से पंडितों को खदेड़ने में चन्द उग्रवादियों की ही भूमिका थी लेकिन किसी भी साम्प्रदायिक दंगे में हिंसा करने वाले चन्द गुण्डे ही होते हैं चाहे वो अहमदाबाद में हो या श्रीनगर में। लेकिन मूक दर्शकों की असहमति किसी तरह से तो दर्ज होनी चाहिये..? जैसे गुजरात के हिन्दू २००२ के दंगो के लिए किसी बड़े पश्चाताप विहीन हैं वैसे ही पण्डितों को भगाने के खिलाफ़ किसी प्रकार की असहमति दर्ज कराने कश्मीरी सड़क पर नहीं उतरे हैं। इसलिए घाटी से अल्पसंख्यकों का सफ़ाया हो जाने पर सेक्यूलरिज़्म का दम्भ करना शायद उनके लिए आसान होगा पर मेरे लिए उसे स्वीकार कर पाना कठिन है।

कश्मीरियों के साम्प्रदायिक न होने के तर्क में एक ही बिन्दु है कि हाल के तमाम प्रदर्शनों के बीच भी अमरनाथ यात्रियों को कोई नुक़सान नहीं पहुँचा। क्या सिर्फ़ अपने से इतर धर्मावलम्बी पर हमला करना ही साम्प्रदायिकता है? मेरे मत से वो दंगाई मानसिकता है मगर साम्प्रदायिकता इस से गहरी चीज़ है, वह तमाम रूप में अभिव्यक्त होती है।

नेट पर उपलब्ध डिक्शनरी डॉट कॉम पर कम्युनलिज़्म का अर्थ यह मिलता है.. strong allegiance to one's own ethnic group rather than to society as a whole यानी समूचे समाज से अधिक अपने जातीय समुदाय के प्रति प्रबल निष्ठा।

अगर यहाँ समूचा समाज पूरा हिन्दुस्तान न भी समझा जाय तो कम से कम जम्मू व कश्मीर राज्य ही माना जाय। एक समस्या है जिसके दो पहलू हैं- कश्मीर और जम्मू। इस में दोनों ही पक्ष के लोग दूसरे को साम्प्रदायिक और खुद को सेक्यूलर बता रहे हैं। जम्मू वालों में प्रबल साम्प्रदायिक तत्व हैं ये सभी मानने को तैयार हैं मगर कश्मीर वाले आन्दोलनकारी सब सेक्यूलर हैं ये मानने में मुझे तक़लीफ़ हो रही है।

न तो वे धर्म-निरपेक्षता के अर्थ में सेक्यूलर हैं और न ही सर्व धर्म सम भाव के अर्थ में। और ग़ैर-साम्प्रदायिक के अर्थ में यदि वे सेक्यूलर हैं तो उनकी निष्ठा के दायरे में जम्मू के हिन्दू भी तो आने चाहिये? मगर घाटी के सभी नेता, जी सभी नेता सिर्फ़ कश्मीर घाटी की संवेदनशीलता को समझते हैं और उसके दर्द, उसके आक्रोश और उसके नाइंसाफ़ियों के लिए दिल रखते हैं, जम्मू के दर्द और आक्रोश के लिए उनके दिल में जगह क्यों नहीं जबकि पाकिस्तान और फ़िलीस्तीन के लिए है? क्या महज़ अपने जातीय समुदाय के प्रति निष्ठा यानी साम्प्रदायिकता नहीं है?

लेकिन आप कश्मीरियों को सीना ठोंक-ठोंक कर खुद को सेक्यूलर और जम्मू वालों को हिन्दू हूलिगन्स कहने से नहीं रोक सकते। ये उनका अधिकार है कि किसी शब्द का वो कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं। शब्दों में उनके सही अर्थ बने रहने की उम्मीद करना आज की तारीख में बचकाना चिंतन है।

कश्मीर क्या एक और फ़िलीस्तीन है?
कश्मीरी लोग अकसर अपनी तुलना फ़िलीस्तीन से करते हैं। ये ठीक बात है कि कश्मीर घाटी में सेना की बड़ी मौजूदगी है और उनके द्वारा अक्सर मानव अधिकारों का हनन भी होता है। पर ये कोई अनोखी स्थिति नहीं है। दुनिया के किसी भी भाग में आप सेना से मानवीय व्यवहार की उम्मीद नहीं कर सकते, उसका चरित्र ही अमानवीय है। वो चाहे बुश का इराक़ या सद्दाम का, मुशर्रफ़ का पाकिस्तान हो या भारत के उत्तर पूर्वीय राज्य; सेना का चरित्र दमनकारी ही रहता है।

कश्मीर के लोगों का दूसरी बड़ी शिकायत उनके लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर है। सत्तासी-अट्ठासी के चुनावों में बड़े पैमाने पर धांधली हुई और जीते हुए उम्मीदवारों को हरा दिया गया। इन में से एक सैय्यद सलाहुद्दीन भी थे जो पाकिस्तान स्थित कश्मीरी आतंकवादी संगठन हिज़्बुल मुजाहिदीन के मुखिया हैं। चुनावी धांधलियाँ भी भारत और दुनिया भर में आम हैं। इन असंतुष्ट कश्मीरियों का चहेता पाकिस्तान तो उल्लेख योग्य भी नहीं जबकि अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश खुद एक धांधली के बाद ही अमरीकी राष्ट्र के मुखिया की गद्दी पर क़ाबिज़ हुए।

कश्मीरियों पर अत्याचार के ये दो मुख्य आधार जायज़ ज़रूर हैं पर उन्हे किस नज़र से फ़िलीस्तीन के समकक्ष रखते हैं मेरी समझ के बाहर है। कैसे कोई कश्मीर और फ़िलीस्तीन को एक ही वाक्य में कह सकता है?

कश्मीर के मुसलमानों को बेघर किया गया .. नहीं।
उनके घरों को ढहाया गया.. नहीं।
उनकी ज़मीन छीनी गई.. नहीं।
बाहर से लाकर विधर्मियों को बसाया गया.. नहीं।
ये किस तरह का फ़िलीस्तीन है?

उलटे खुद कश्मीरियों ने घाटी के अल्पसंख्यकों को खदेड़ कर बाहर कर दिया और फिर भी वे खुद की तुलना फ़िलीस्तीनियों से करने का मंशा रखते हैं। आखिर फ़िलीस्तीनियों और कश्मीरियों में क्या समानता है, सिवाय इसके कि दोनों मुसलमान हैं? और यदि यही उनके साथ (और पाकिस्तान के साथ) एकता और जुड़ाव महसूस करने का एकमात्र बिन्दु है तो ये साम्प्रदायिकता नहीं तो और क्या है?

क्या उन्हे अलग होने का हक़ है?
हिन्दुस्तान ने कश्मीर पर हमला कर के क़ब्ज़ा नहीं किया। कश्मीर के राजा हरि सिंह ने हिन्दुस्तान और पाकिस्तान से स्वतंत्र एक लग राज्य के रूप में कश्मीर के अस्तित्व को रखने का फ़ैसला किया था। मगर जब पाकिस्तानी कबाईलियों ने हमला किया तो हरि सिंह घबरा गए। क्योंकि पाकिस्तान के साथ जाने से कश्मीर के मुसलमानों का तो कोई नुक़्सान न होता मगर घाटी के पण्डितों, जम्मू के डोगरों और लद्दाख के बौद्धों का जीवन संकट में पड़ जाता।

इसलिए उन्होने पाकिस्तान के साथ न मिल कर धर्म निरपेक्ष हिन्दुस्तान के साथ मिलने का फ़ैसला किया, लेकिन अपनी स्वायत्तता की शर्त के साथ जो धारा ३७० के रूप में भारतीय संविधान में ससम्मान शामिल की गई। कश्मीर को भारतीय संघ में शामिल करने के बाद ही भारतीय सेना उनकी मदद के लिए गईं। और तब की नियंत्रण रेखा आज तक क़ायम है।

पाकिस्तान बार-बार जिस संयुक्त राज्य के प्रस्ताव की बात करता है उस के अनुसार पहले पाकिस्तानी सेना को उसके द्वारा अधिकृत कश्मीर को खाली करना होगा उसके बाद ही किसी जनमतसंग्रह किया जा सकता है। (और कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने वाले नेहरू थे, जिन्ना नहीं।) पाकिस्तान जनमत संग्रह की बात तो करता है मगर खुद के क़ब्ज़ियाए हुए कश्मीर को खाली करने की नहीं। पाकिस्तान सिर्फ़ भारत अधिकृत कश्मीर में यह जनमत संग्रह कराना चाहता है कि वे भारत में रहेंगे, पाकिस्तान में, या एक स्वतंत्र राज्य में?

मेरी निजी राय है कि कश्मीरी आन्दोलन साम्प्रदायिक है। मगर उस के साम्प्रदायिक आन्दोलन होने से वे कोई कम मनुष्य नहीं हो जाते और मानवीय अधिकार उतने ही बने रहते जितने कि किसी और के। यदि वे अलग होना चाहते हैं तो उन्हे अलग होने देना चाहिये। किसी जाति, किसी समूह को आप बन्धक बना कर अपने साथ नहीं रख सकते और न रखना चाहिये। इस में न उन का लाभ है न हमारा उलटे दोनों का नुक़्सान है।

कश्मीरियों को पाकिस्तान से मिलना है, मिल जायँ। मेरे अनुसार तो उन्हे यह हक़ बहुत पहले दे देना चाहिये था। अगर आज कश्मीरी पाकिस्तान के साथ होते तो हो सकता था कि वे हिन्दुस्तान के क़रीब होते और पाकिस्तान के खिलाफ़ अत्याचार का आरोप लगा रहे होते। पर भारत सरकार ने न तो उन्हे अपने यूनियन में मिलाया और न ही अलग होने दिया। भारत सरकार के लिए साँप-छ्छूँदर की स्थिति बनाए रखी और कश्मीरियों के भीतर एक ऊहापोह की।

सवाल बस एक रह जाता है कश्मीरियों को यदि अलग होने/ पाकिस्तान से मिलने का हक़ दिया जाता है तो कश्मीरी पण्डितों के उस ज़मीन पर हक़ का क्या होगा? वो तो फ़िलीस्तीनियों की तरह बहुसंख्यक भी नहीं है और न ही उनको निकालने वाले मुसलमान कहीं बाहर से आए हैं। उन्हे अलग से कोई पानुन कश्मीर तो देने से रहा। और जब भारत के अधिकार में होते हुए वापस कश्मीर लौटने का साहस जब उन पण्डितों में नहीं तो एक बार कश्मीर के पाकिस्तान में मिल जाने के बाद ऐसी कोई सम्भावना बनेगी इस में तगड़ा शक़ है।
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