गुरुवार, 5 सितंबर 2013

अंधकार



ईश्वर अंधकार में है या प्रकाश में। हम नहीं जानते। महात्माओं ने बताया है, ईश्वर ज्योतिर्मय है। नूर है। पर प्रकाश चले जाने के बाद जो बचे, वो क्या है? जहाँ प्रकाश न हो, वहां भी अंधकार बना रहता है। और जहाँ प्रकाश हो वहाँ भी होता है अंधकार। 

एक कमरे में बहुत सारा प्रकाश भरने के बाद भी बहुत सारा प्रकाश और भरने की जगह बनी रहती है। ऐसा लिखते हैं विनोद कुमार शुक्ल। 

वो खाली जगह अंधकार की है। आदि भी अंधकार है। अंत भी अंधकार है।

प्रकाश के कारण हम अंधकार को देख नहीं सकते। वो परदा है। प्रकाश परदा है। प्रकाश में समझने लायक़ कुछ भी नहीं। इसीलिए प्रकाश के आगे आदमी बिलकुल बेबस होता है। अधिक उसकी ओर देखे तो अंधा हो जाता है। आदमी अंधा होकर ही कुछ समझ सकता है। 


प्रकाश से कोई ज्ञान नहीं आता। सारा ज्ञान अंधकार में है।  

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बुधवार, 4 सितंबर 2013

साहस


समय हमको बहुत सताता है। क्या करें। अनन्त तक फैले इस समय का? अनन्त समय छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटा हुआ हमें नज़र आता है। पर वो होता नहीं। साल महीने, दिन-रात के विभाजन हमें पहले से हुए नज़र आते हैं। मगर हैं नहीं। 

रात-दिन, महीना, साल बाहरी लक्षणों की गणनाएं हैं। क्योंकि जगत लगातार बदल रहा है। पर समय नहीं बदल रहा। वो स्थिर है। अटल। वो जाता ही नहीं। वर्तमान का जो पल है, केवल उसी में समय को अनुभव किया जा सकता है। भूत स्मृति है। और भविष्य कल्पना है। 

समय केवल इस पल में जीवित है। और कभी मरता नहीं। हमेशा जीवित रहता है। क्योंकि वर्तमान कभी जाता ही नहीं। उसकी इस विराटता से घबराकर हम समय को भुलाने, इस पल से निकल जाने की कोशिशें करने लगते हैं। कल्पना में। स्मृति में। सुबह-शाम के बीच का समय भी काटना मुश्किल होता है हमारे लिए। तो हम समय को जागने, नहाने, नाश्ता करने, दोपहर का खाना बनाने के अन्तरालों में तोड़ने लगते हैं।  

अनन्तता की आज़ादी से से छूटकर, अवधि में बंधा समय हमें इतना सता नहीं पाता। फिर भी हम उसे पूरी तरह भुला देना चाहते है। तमाम बातों में अपने को मगन रखते हैं। उनसे बंधे रहते हैं। बंधे रहने में सुरक्षा है। जैसे छोटा बच्चा माँ के तन से बंदकर राहत महसूस करता है। अलग होते ही रोने लगता है। समय से आज़ाद होते ही हमारे भी भय का पारावार नहीं रहता। 


पर सारे शग़ल भुलावा हैं। समय कहीं नहीं गया। वो वहीं खड़ा है। स्थिर, एकाकी, अनन्त, विराट समय।  यूं कहें, हम खड़े हैं। अनन्त समय के आगे। और उससे नज़रे मिलाने का हमारे भीतर साहस नहीं है। 

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गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

अधूरा ईश्वर..


कहते हैं कि यह संसार/कायनात/सृष्टि/ब्रह्माण्ड ईश्वर की रचना है या फिर यह सब कुछ ही ईश्वर है जिसे सूफ़ियों ने हमा ओस्त कहा है। इस बात में मुझे कुछ दुविधा लगती है।

अगर उस सर्वशक्तिमान सम्पूर्ण ईश्वर ने ये संसार बनाया है, अगर ये उस की अभिव्यक्ति है तो ये संसार भी सम्पूर्ण होना चाहिये! हर रचना अपने आप में सम्पूर्ण होनी चाहिये, बिना किसी विकार, कमी या नुक्स के। वो इसलिए कि पूर्ण से तो पूर्ण ही निकलता है, सम्पूर्ण ईश्वर की अभिव्यक्ति अपूर्ण कैसे हो सकती है? मगर हम जानते हैं कि हमारा संसार सम्पूर्ण नहीं है- तमाम तरह की अपूर्णताओं का समुच्चय है ये संसार।

सम्पूर्ण का ना तो विकास हो सकता है और ना ही ह्रास। लेकिन इस संसार में तो बदलाव ही नियम है- कुछ भी स्थिर नहीं है। जन्म, विकास, क्षय और मरण इस संसार की आधारभूत विशेषता है। हर पल कुछ जन्म ले रहा है, कुछ मर रहा है, कुछ का विकास हो रहा है, और कुछ का क्षय। निश्चित ही यह संसार अपूर्ण है, अधूरा है, इसे किसी सम्पूर्ण ईश्वर ने नहीं बनाया हो सकता।

और अगर, किसी न्यूनतम सम्भावना के चलते, ये अधूरा संसार सचमुच किसी ईश्वर ने बनाया भी है तो किसी सम्पूर्ण ईश्वर ने नहीं.. ये अधूरा संसार किसी अधूरे, अपूर्ण ईश्वर की ही रचना हो सकता है।

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