शनिवार, 14 अप्रैल 2012

छलांग


जब से शादी हुई है, शांति छै अलग-अलग मकानों में रह चुकी है। किराएदार कहीं मकान पर क़ब्ज़ा न कर ले- इस डर से कोई मकानमालिक दो-तीन बरस से अधिक रहने ही नहीं देता। हर मकान के खिड़की, दरवाज़ों और दीवारों का अपना एक अलग चरित्र होता है जिसके साथ तालमेल बैठने में कुछ समय लगता है। और जब तक इन्सान उस चरित्र के साथ रहनेवाले आराम का कोई समीकरण बना पाए, तब तक किराएदारों के मकान से बाहर होने की बारी आ जाती है। 

शांति को इस मकान में आए लगभग डेढ़ साल होने को आया। यह मकान शांति के रहे हुए पहले के सभी मकानों से अपेक्षाकृत बड़ा और हवादार है। तीन दिशाओं में खुलने वाली बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ और एक कुशादा बालकनी भी है। मगर सभी खिड़कियों पर लोहे की जाली जड़ी हुई हैं यहाँ तक कि बालकनी के आगे भी लोहे का एक भारी जंगला लगा के उसे बंद कर दिया है। तो बालकनी और खिड़कियों से हवा और धूप तो आ सकती थी मगर किसी जानवर या आदमी का आ पाना नामुमकिन है। कबूतर- चूहे और गिलहरी जैसे छोटे जानवरों के लिए अलबत्ता कोई रुकावट नहीं है।  यह जंगले और जालियां सुरक्षा के नज़रिये से परे शांति के लिए बड़ी परेशानी का सबब रहीं। पहले के मकानों की खिड़कियों में भी जंगले थे मगर इस मकान के जंगले कुछ ज़्यादा ही सघन हैं। ऐसी कि खिड़की से बाहर झांकते हुए नज़र बाहर पसरने के बजाए जंगले से ही उलझ कर वहीं दम तोड़ देती। घर के काम-काज के बीच कुछ पल के अवकाश के कुछ पल चुराने के लिए घर के किसी भी कोने से बाहर के संसार पर नज़र फ़ेरते हुए कभी जो सुस्ताती तो एक मुक्ति के भाव को प्राप्त होने के बजाय और बन्धन में बँधा हुआ महसूस करती। कभी तो उसे ख़ुद के घर के भीतर क़ैद होने का एहसास होता तो कभी उसे आकाश समेत शेष संसार के जंगले के बाहर बंद होने जैसी भाव ग्रस लेता।  

दूसरे का मकान है, कितने दिन रहना है, किसी तरह दिन काट लो आदि भावों से ग्रस्त होकर शांति अपनी परेशानी को ज़ब्त करती रही। मगर तीन महीने पहले जब मकानमालिक से सामना हुआ तो शांति के मन की बात बाहर आ ही गई। 
'आप के मकान में सब अच्छा है.. बस ये जंगले निकलवा दीजिये! '
'क्यों? '
'बहुत घुटन होती है.. लगता है जेल में बंद हैं.. '
'क्या बात कर रही हैं आप.. इस से तो बड़ी हिफ़ाज़त रहती है.. '
'हिफ़ाज़त तो जेल में भी बड़ी रहती है.. '
मकानमालिक लाजवाब होकर भी हुज्जत करते ही रहे। लेकिन शांति के बार-बार आग्रह करने पर मकानमालिक ने अगले महीने निकाल देने की बात पर विदा ली। पर शांति को दिख रहा था कि वो वाएदा कम और टालना ज़्यादा था। इस बात को लगभग तीन हफ़्ते गु़ज़र गए थे जब कॉलोनी में एक हादसा हो गया। 

शांति इमारतों के जिस संकुल में रहती है उसी के नज़दीक में एक नई बीस मंज़िला इमारत रॉक्सी हाईट्स खड़ी हो गई थी। पिछले चार-पाँच महीनों से उसकी कुछ खिड़कियों में बत्तियां भी जगमगाने लगी थीं। पिछले हफ़्ते जब वो दफ़्तर से आ रही थी तो उसने देखा कि रॉक्सी हाईट्स के आगे कुछ लोगों की भीड़ जमा है जिसके चलते ट्रैफ़िक चींटी की चाल पर उतर आया है। उसके स्कूटर के पास रुके मोटरसाइकिल वालों की गुफ़्तगू पर कान देने से उसे पता चला कि किसी नौजवान से इमारत की बारहवीं मज़िल से क़ूद कर जान दे दी। इस हौलनाक ख़बर के साथ ही ट्रैफ़िक में थोड़ी हलचल हुई और शांति को अपने उमड़ रहे जज़्बात को किनारे कर के घर की दिशा में स्कूटर आगे बढ़ाना पड़ा। 

लौटकर आई तो सारे कॉलोनी में इसी हादसे की चर्चा हो रही थी। पार्किंग में स्कूटर खड़ा करके घर के अन्दर दाखि़ल होने तक शांति को मरने वाले की कहानी के कई संस्करण सुनने को मिले। और अगली सुबह अख़बार में उसी हादसे की सुर्ख़ी थी और तफ़्सील भी। ख़ुदकुशी करने वाले नौजवान की उमर कुल बत्तीस साल थी, एक बड़े बैंक का मैनेजर था, लाख रुपये के ऊपर तनख़्वाह थी, मगर प्रेमविवाह करने के बाद तलाक़ हो गया था। उसके बाद बैंक की ही किसी जूनियर अधिकारी से प्रेम करने लगा था मगर वो विवाहित थी और अपने पति को छोड़ने को तैयार न थी। जिस दिन यह हादसा हुआ वो महिला भी उसके साथ फ़्लैट में मौजूद थी। नौजवान दिन से लगातार शराब पी रहा था तो न जाने किस भावुक मौक़े की उत्तेजना में उसने बालकनी से नीचे छलांग मार दी।  

उस दिन दफ़्तर में इस मामले की तार्किक, नैतिक और भावुक चीरफाड़ हुई। किसी ने नए क़िस्म के शहरी जीवन और पश्चिमी मूल्यों को दोष दिया, किसी ने शराब को तो किसी ने नौजवानी को। एक साहब ने तो हद ही कर दी- उन्होने बिना जंगले की बालकनी को दोष दे डाला। उनके मुताबिक़ इन्सान के भीतर गाहे-बगाहे ऐसी भावना उमड़ती ही रहती है- ऊँची इमारतों में खुली बालकनी रखना तो मरने वालों को दावत देना है। और आगे उन्होने दिल्ली की क़ुतुब मीनार की मिसाल भी दे डाली जिसकी ऊपरी मंज़िलों में आज भी जाने की मनाही है क्योंकि जब रोक नहीं थी तब आए दिन कोई न कोई वहाँ से छलांग मार देता। बात यहीं ख़तम हो जाती तो कुछ न था। इस के अगले ही रोज़ जिस महिला के तथाकथित प्रेम में नौजवान ने अपनी जान दी थी, उस महिला ने भी अपनी चार मंज़िला इमारत की बालकनी से छ्लांग मार दी। 

इस मामले की मार्मिकता से अलग शांति के मन में एक अलग ही आशंका पलने लगी। अपने मकान की बालकनी के ख़िलाफ़ जो अभियान उसने मकानमालिक से साथ छेड़ा था, उस अभियान की सफलता पर काले बादल मंडलाते हुए उसे नज़र आने लगे। और हुआ भी वही जिसका उसे डर था। अगली दफ़े जब मकानमालिक साहब आए तो वो बालकनी के जंगले निकालने के अपने आधे वाएदे से सरासर मुकर गए। कहने लगे कि वो अपने किराएदारों के साथ किसी भी हादसे होने की सूरत पैदा करना नहीं चाहते थे। 

शांति की नज़र और ख़याल के विस्तार के अरमान तो धरे के धरे रह गए। उलटे उसने देखा कि वो मकान जिनकी खिड़कियों-बालकनी में पहले कोई जाली-जंगले नहीं थे, उनमें से तमाम पर चमचमाते काले नए लोहे जड़े दिखाई देने लगे। तय था कि लोग डरे हुए थे। उन सब के भीतर कोई था जो छलांग मारना चाहता था या उन्हे लगता था कि उनके परिवार के भीतर कोई है जो मार सकता है कभी भी छलांग।  

*** 

२२ जनवरी को दैनिक भास्कर में छपी.


गुरुवार, 29 मार्च 2012

प्रतिशोध




सुबह जब शांति पौधों को पानी देने के लिए बालकनी पर गई तो सूरज उग रहा था। पानी देते हुए उसने सूरज की तरफ़ एक अनुरागी दृष्टि डाली। सूरज सफ़ेद हो रहा था। ये नज़्ज़ारा शांति को बड़ा अजीब मालूम दिया। सूरज सफ़ेद ही होता है.. पर उगते हुए और डूबते हुए सूरज में लाली देखने की आदत पड़ी हुई है हमको। वैज्ञानिक बताते हैं यह एक दृष्टि भ्रम है जो प्रकाश के परावर्तन के चलते होता है। शांति ने सर उठा कर शेष आकाश की ओर देखा। पूरा आसमान एक अजब सलेटी रंग में पुता पड़ा था। आस-पास के पेड़ उगते सूरज की रौशनी में अच्छे चटख रंगो में खिले होने के बजाय एक धूसर उदासी से लिपटे खड़े थे। धूसर रंग उस धूल में था जो पेड़ और शांति की आँख के बीच ही नहीं, सारे आलम में तैर रही थी। अभी वसन्त में ही आए नए पत्तों और ताज़े खिले फूल के चटख रंगों के खुल कर पसरने की राह उसी धूल ने अवरुद्ध की हुई थी। वही धूल उगते सूरज की लाली को भी लील गई थी,  ऐसे कि सूरज नारंगी-लाल न होकर किसी अख़बारी काग़ज़ की तरफ़ निस्तेज और सफ़ेद नज़र आ रहा था। कभी-कभी ऐसा भी होता है, यह सोचकर शांति अपने में वापस लौट गई। बाहर धूल मचलती रही। 

तक़रीबन ढाई घंटे बाद जब शांति तैयार होकर दफ़्तर जाने के लिए निकली तो सूरज सर पर चढ़ आया था मगर धूप बहुत ही ख़स्ताहाल थी। धरती पर शांति की बौनी छाया थी ज़रूर पर बेहद क्षीण और महत्वहीन। शांति ने सर उठाकर ऊपर देखा। आकाश में कोई बादल न था पर सब तरफ़ बदली छाई हुई थी। जहाँ तक नज़र जाती थी धूल के नन्हे-नन्हे कण हवा में अठखेलियां करते नज़र आ रहे थे। पहले कभी नहीं देखी इस तरह की धूल? पहले जब कच्ची सड़कें होती थीं तो  गर्मी के प्रचण्ड प्रहार से धरती चटकने लगती थी और उसकी सतह के छोटे-छोटे टुकड़े हवा के साथ  पूरे वातावरण में उड़ने लगते थे। पर उस धूल की अपनी कोई गति नहीं थी वो हवा के कंधों पर सवार होकर यहाँ-वहाँ भटकती फिरती थी। पर उस दिन न तो प्रचण्ड गर्मी थी तो न ही हवा हुंकारे भर रही थी। ये वो धूल नहीं थी.. तो फिर ये कौन सी धूल थी? कहाँ से आई थी यह धूल?  शहर में न तो कच्ची सड़कें थीं, न नंगी पड़ी हुई ऊसर ज़मीन और न ही घास या बेघास के चटियल मैदान.. जिनसे छूटकर धूल इधर-उधर आवारा फिरती। 

शहर में भी धूल होती है। पर वो बिलकुल अलग क़िस्म की धूल है.. लम्बी-ऊंची इमारतों की तामीर में लगने वाली सीमेंट-मौरम के ज़र्रों की धूल। पर वो इस क़दर सरकश और आवारा नहीं होती। वो तो बहुत ही चुपचाप और रहस्यमय तरीक़े से रोज़ बरोज़ आसपास के घरों में जा टिकती है और हर सुबह घरों से बाहर बुहार फेंकी जाती है। जो कचरे के डब्बों से होते हुए शहर के बाहर बने कूड़े के टीलों में अपना अन्तिम स्थान पाती है। जहाँ उसके साथी होते हैं प्लास्टिक की थैलियां,  पन्नियां, कपड़ों के टैग, कच्ची-पक्की और सड़ी-गली सब्ज़ियां, टूटे हुए कांच के टुकड़े,  ठुकराए हुए खिलौने,  चिंदी करके फेंके हुए काग़ज़, कीलें, पतरे, लोहा-लंगड़ और कई तरह की धातुओं के टुकड़े। उसके ये सारे साथी उस धूल को इस क़दर जकड़ कर रखते हैं कि धूल वहाँ से कहीं जाने नहीं पाती। वहाँ से अगर कुछ उठता है तो उन सब की समवेत गंध, जिसका सामना करने की ताब किसी सामान्य मनुष्य में नहीं होती। फिर भी कुछ दिलेर नाक पर पट्टी बांधे, और कुछ तो बिना किसी पट्टी के भी उन ठुकराई हुई बेकार चीज़ों के ढेरों में अपने काम की चीज़ें खोजा करते हैं। 

फिर कौन सी धूल थी ये? इसी सोच को लिए-लिए शांति दफ़्तर पहुँची। जब उसने हेलमेट उतार कर हाथ में लिया तो देखा कि उस पर धूल की पतली सी परत आरामफ़र्मा है। शांति ने हौले से अपनी उंगली को हेलमेट पर फिराया तो उसकी इस हरकत के निशान को अंकित होते हुए देखा और फिर हेलमेट को स्कूटर पर ही टांगकर दफ़्तर में दाख़िल हो गई। दफ़्तर में एसी चल रहा था और सामान्य सरगर्मी थी। लोग दुनिया जहान की जो बातें कर रहे थे उनमें धूल भी एक चर्चा का मुद्दा थी। लेकिन जब दफ़्तर बंद हुआ तो हालात संगीन हो चले थे।  

शाम होते-होते तक धूल ने आदमी की बनाई दुनिया की ऊँचाई से दूर ऊपर कहीं तैरना छोड़कर वापस धरती की ओर धावा बोल दिया। हवाएं उसका साथ दे रही थीं। एक-दूसरे से सटकर चलने  वाली मछलियों और पंछियों के समूह की तरह धूल बड़े वेग से दिशाओं को झकझोरने लगीं। चलना तो दूर उस आँधी में खड़े रहना भी मुश्किल था, आँखें बंद हुई जाती थीं। सवारियों के लिए सड़कों पर चलना असम्भव हो गया। पहले रेंगने की गति पर आया ट्रैफ़िक एक पल में आकर एकदम ठप पड़ गया। पूरे शहर में समय जैसे ठहर गया। पर हवाओं पर सवार धूल अंधड़ बनकर चलती रही। 

एक बहुत लम्बे अंतराल के बाद शांति घर पहुँची। जैसे-जैसे शांति घर के भीतर क़दम रखती गई फ़र्श पर जमी धूल की परत पर अपने जूतों के निशान छोड़ती गई। सारा घर धूल से अटा पड़ा था। अजय, पाखी, अचरज डाइनिंग टेबल पर सन्न से बैठे थे। फोन सेवाएं ठप पड़ चुकी थी और पिछले कई घंटो से उनका शांति से सम्पर्क टूटा हुआ था। सासू माँ भी वहीं बैठी थीं- केबल भी बंद था। उस समय सफ़ाई करने का माद्दा नहीं था शांति में। वो सिर्फ़ नहाना चाहती थी। पर न जाने क्यों पानी नहीं आ रहा था। धूल से काली हो गई शांति का बदन एक उतनी ही किरकिरी चिड़चिड़ाहट से दरकने लगा। किसी तरह उसने अपने पर क़ाबू पाया और रखे हुए आधी बाल्टी पानी से अपने हाथ-पैर धो लिए। भूख मर चुकी थी पर पाखी और अजय के कहने पर उसने थोड़ा सा खाना अपनी प्लेट पर डाल लिया। निवाला मुँह में डालते ही उसे खाने का नहीं धूल का स्वाद आया। शांति ने वैसे ही प्लेट रख दी। और नहीं खाया फिर भी ज़बान पर धूल का स्वाद बैठा ही रहा। 

बाहर अंधड़ जारी था। घर में धूल बढ़ती ही जा रही थी। मेज़, कुर्सी, परदे, सब कुछ धूल से सन चुका था। शांति इतना थक चुकी थी कि बस बिस्तर पर गिर कर सो जाना चाहती थी पर बिस्तर, धूल के बिस्तर में बदल गया था। उस पर सोना नामुमकिन था। शांति ने चादर बदलने के लिए अलमारी खोली। तभी लाइट चली गई। अलमारी के भीतर शांति का हाथ जहाँ भी पड़ा वहाँ धूल मौजूद थी। किसी तरह शांति ने एक चादर बिस्तर पर डाल दी। और दूसरी दरवाज़े की झिरी पर तोप दी। उसके बाद भी धूल अदेखे-अनजाने छेदों से निकल-निकल कर शांति पर और कमरे की हर  चीज़ पर बैठती ही रही। जैसे धूल को कोई ईश्वरीय वरदान था और वो उसी वरदान का दीर्घप्रतीक्षित प्रतिशोध ले रही थी। 

*** 

शनिवार, 24 मार्च 2012

नौनिहाल


सवा पाँच बज रहे थे। दफ़्तर लगभग ख़ाली हो चुका था। परम्परा के मुताबिक लोग अपना आज का काल कल पर टालकर जा चुके थे। आज का काम आज ही ख़तम कर डालने की ज़िद करने वाली शांति अपना काम समेट रही थी जब हवाओं पर चढ़कर रह-रहकर एक धमक सी आने लगी।  शांति तो अपने काम में व्यस्त थी। सबसे पहले उनकी पहचान दफ़्तर की पुरानी खिड़कियों में जड़े शीशों ने की। हर धमक के साथ उनका पूरा अस्तित्व कम्पन करने लगा। और सारे शीशों के समवेत कम्पन से पूरे दफ़्तर में एक अजब माहौल तारी हो गया। तब शांति ने भी उस धमक की लहरों को अपने शरीर से टकराते हुए महसूस किया जिससे उसके मन में एक विचित्र आकुलता का संचार होने लगा। उसने लैपटॉप बन्द कर दिया। उस आकुलता में काम करना मुमकिन नहीं था। और बाहर की ओर चल पड़ी। जैसे-जैसे वो बाहर की ओर चलती गई, हवाओं में धमक बढ़ती चली गई। और जब वो लिफ़्ट से बाहर आई तो एक कान चीर देने की नीयत रखने वाले संगीत से उसका सामना हुआ। वो धमक इसी संगीत की निचली तरंगे थी।

शांति स्कूटर पार्किंग से निकालकर सड़क पर आ गई। ये सड़क जिस पर शांति का दफ़्तर था, बहुत संकरी तो न थी। लेकिन कुछ हिस्से पर दुकान अपनी हदों से बाहर निकलकर पसर गई थीं और कुछ पर ठेलेवाले अपनी रोज़ी बिछाए हुए थे। शहर का प्रशासन  एक सहिष्णु आचार का परिचय देते हुए इस अतिक्रमण के प्रति पूरी तरह उदासीन बना हुआ था। और आम नागरिक की हालत किसी कोलस्ट्राल से भरी रकतवाहिनी में बहते पोषक तत्वों सी हो चली थी। लेकिन उस समय सड़क का आवागमन रुका हुआ था। क्योंकि शांति से लगभग पचास मीटर आगे एक ट्रक था जिस पर पांच छै भीमकाय स्पीकर रखे थे। ट्रक के ऊपर, आगे-पीछे और अगल-बगल नौजवान लड़कों की एक उछलती-कूदती टोली थी। साठ-सत्तर की संख्या वाले उस दल में शायद ही एक-दो ऐसे थे जिन्होने कमर के ऊपर कोई कपड़ा पहन रखा हो। जो शोर ट्रक के स्पीकरों से उपज रहा था न तो उसे संगीत कहा जा सकता था और न ही उनकी फूहड़ उछल-कूद को नृत्य। वे अपने भीतर की ही किसी विकृति से विवश होकर हवा में हाथ-पैर फेंकते दिख रहे थे। वे पास ही स्थित विश्वविद्यालय के छात्रावासों में रहकर उच्च शिक्षा प्राप्त कर छात्र थे।

किसी लगातार हो रहे विस्फोट की तरह उस शोर की उत्तेजना शांति को परेशान करने लगी। वो शोर एक ऐसा आक्रमण था जिसका उसके पास कोई बचाव नहीं था। उसके आगे वाहनों की लम्बी क़तारें थी और वैसी ही धीरे-धीरे पीछे भी बनती जा रही थीं। न वो आगे निकल सकती थी और न लौट सकती थी। उस शोर की धमक में उसके ज़ेहन में उठने वाली हर सोच उठते ही दम तोड़ दे रही थी। जबकि उसकी देह के किसी निचले तल से उठता एक आदिम आवेग उस पर छाता जा रहा थी।  उसका मन कर रहा था कि सबको कुचलकर आगे बढ़ जाय। अगर वो कोई सिद्ध योगिनी होती तो अपने स्कूटर को टैंक में बदल डालती उसी पल। अचानक उसे लगा कि कोई कुछ कह रहा है उस से। उसने मुड़कर देखा- उसके बाज़ू में रुकी हुई कार से एक औरत उस से कुछ पूछ रही थी।  उसके मुँह से निकल ज़रूर होंगे कुछ शब्द मगर वो कहीं पहुँचने पहले से दबा कर मार डाले गए। उस आततायी शोर में किसी स्त्री के कोमल शब्द के लिए कोई जगह नहीं बची थी। शांति को कुछ समझ नहीं आया। ड्राइवर की सीट पर बैठा उस औरत का पति उसके कंधों को हिलाकर कुछ बोल रहा था। लेकिन वो अपने पति को अनदेखा कर के शांति से बार-बार कुछ पूछती ही रही। उसके लगातार हिलते हुए होंठ, सवालिया निगाहें और शांति तक पहुँचता सिर्फ़ शोर शांति से बरदाशत नहीं हो रहा था। उस पर से अपनी ध्यान हटाने के लिए शांति ने पिछली सीट पर देखा। पिछली सीट पर दो बच्चे आपस में लड़ रहे थे। एक छै-सात बरस का लड़का एक तीन-चार बरस की लड़की, जो शायद उसकी बहन थी, बुरी तरह पीट रहा था। बच्ची का मुँह खुला था, गले की नसें तनी हुई थीं, और आँखों से आँसू बह रहे थे। निश्चित ही वो गला फाड़ कर रो रही थी पर रोने की कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। अगली सीट पर बैठे उनके माँ-बाप को पता भी नहीं था कि पिछली सीट पर क्या चल रहा है।

होली के चार-पाँच रो़ज़ पहले ही होली मिलन का उत्सव मना रहे छात्रों का जुलूस धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा। और एक ख़ास घर के आगे जाकर रुक गया। शांति ने देखा उस घर पर दीपा गर्ल्स हॉस्टल की तख्ती लगी हुई थी। शायद वो विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली लड़कियों के लिए कोई निजी छात्रावास था। उस हॉस्टल में कोई चौकीदार नहीं था। और अगर था भी तो लड़कों के हिंसक नाच से भयभीत होकर कहीं अन्तर्धान हो गया था। अगल-बगल फलों और जूस के ठेले थे। मगर वो घबराकर अपने सामान को ढककर किनारे होने में लगे थे। उन्हे डर था कि अगर लड़कों की नज़र तिरछी हुई तो उनका माल लुटते देर नहीं लगेगी। ये उनका सौभाग्य था कि लड़कों की दिलचस्पी किसी और 'माल' में थी। जिस के चलते वो गर्ल्स हॉस्टल के बाहर खड़े होकर भीमकाय स्पीकरों से निकल रहे उन्मादक शोर पर देर तक अश्लील ढंग से उछलते-कूदते रहे। और गंदे इशारे करते रहे। जिस पर भी जब किसी भी लड़की ने उनको दर्शन की तवज्जो नहीं दी तो एक लड़के ने जूस के ठेले के साथ रखे टोकरी में से संतरे और मौसम्बी  छिलके और गाजर-चुकन्दर के सिरों को उठा-उठाकर हॉस्टल की बंद खिड़कियों पर फेंकना शुरु कर दिया। बाक़ी लड़कों ने अनुसरण किया और हॉस्टल पर अपने हथियारों की वर्षा कर दी। वो पल तमाम तरह की ख़तरनाक सम्भावनाओं से थरथराने लगे। इस दृश्य को देखते-देखते कुछ पल पहले क्रोध में उबल रही शांति, बिलकुल उलट भय की गर्त में गिर पड़ी।

घर पहुँचने के बहुत देर बाद तक भी शांति भीतर कहीं काँपती रही। क्योंकि वो एक स्त्री है, और किसी तल पर बेहद असुरक्षित है। और उसके भीतर इस आदिम असुरक्षा की भावना पैदा करने वाले कोई अनपढ़, जंगली और गँवार नहीं थे। विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा लेकर, आने वाले दिनों में आईएएस, पीसीएस आदि बनने वाले छात्र थे, नौनिहाल थे, देश का भविष्य थे। उच्च शिक्षा हासिल करके वे किस प्रकार के बेहतर मनुष्य और किस तरह के बेहतर समाज की रचना करेंगे ये कल्पना करना शांति को बहुत कठिन और कष्टकर मालूम दिया।

***

(10 मार्च को दैनिक भास्कर में छपी) 


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