शुक्रवार, 23 मार्च 2012

ग़रीब की गरिमा



जब वे प्लैटफ़ार्म पर दाख़िल हुए गाड़ी छूटने में तब भी चालीस मिनट थे।। उनके हलके-फुलके सामान के लिए कुली लेने की कोई ज़रूरत ही नहीं थी। दो दिन का कार्यक्रम था- शादी में शामिल होके बस अगले दिन वापसी। ए-वन डब्बा सबसे आख़िर में था। जीवन में पहली बार वे पहले दर्ज़े में सफ़र करने का आनन्द लेने जा रहे थे। अजय अपना वर्ग और अपनी औक़ात जानता है। पर कुछ सौ रुपये के फ़र्क़ से अगर आपका वर्ग बदल सकता है तो अजय एक बारगी यह क़ीमत देने को तैयार हो गया। और वर्गों के पार यह छलांग मार दी। अजय और शांति आराम से अपनी ट्रालियां खींचते हुए गाड़ी के अन्त की ओर चल पड़े। दूर से उन्हे गाड़ी के आख़िर में एक लम्बी मानव श्रंखला दिखाई दी। एक-दूसरे की देह में चपक जाने तक की निकटता वाली श्रंखला, सबसे निचले दर्ज़े में बैठने की जगह पा जाने के लिए लगाई गई लाइन थी। हाथ में और कंधे पर कई आकार और प्रकार के बैग थामे और लटकाए अलग-अलग उम्र के मर्द, बच्चे और औरतें थे। बैठने की जगह या सिर्फ़ खड़े हो जाने की जगह पा जाने के संघर्ष से जिनके चेहरे तनाव से आड़े-तिरछे खिंचे हुए थे। आर पी एफ़ के कुछ सिपाही उनके उस संघर्ष के उग्र और हिंसक होड़ में बदल जाने से रोकने के लिए रह-रह कर अपने डंडे को और गले के सुर को उठा रहे थे। ऐसा नहीं था कि शांति ने पहले ऐसी क़तारें नहीं देखीं थीं। पर पहला दर्ज़ा और जनरल डब्बा इस तरह एक दूसरे से सटा होता है यह देखकर उसे एक अजब से हैरत हुई जिसमें कहीं कोई अपराध भावना भी छिपी हुई थी। कोई पहले दर्ज़े का यात्री सबसे निचले दर्ज़े की ठसाठस तक़लीफ़ों को नज़रअंदाज़ कर सकता था। और जनरल डब्बे में कशमकश करने वाला सवार भावनाओं की किन तंग गलियों से गुज़रता होगा- यह शांति सोचती ही रही। 

पहले दर्ज़े के कम्पार्टमेन्ट में साइड की बर्थ नहीं होतीं। उनकी जगह खिड़कियों से लगा हुआ एक गलियारा होता है और शेष जगह में चार-चार बर्थ के कूपे। कूपे के भीतर बैठने-लेटने के लिए जो बर्थ थीं वो थी टियर और टू टियर से कहीं ज़्यादा चौड़ी थीं। उनके ऊपर बढ़िया गहरे लाल रंग की टेपेस्ट्री लगी थी। बर्थ के तरफ़ तो खिड़की थी और दूसरी तरफ़ छोटा-मोटा सामान रखा जा सकने लायक़ एक फ़ुट चौड़ी साइडटेबल थी। इतना ही नहीं उन के ऊपर सूट टांगने के लिए एक आलमारी भी थी। शांति को उसे देखकर बार-बार किसी लाल मुँह वाले अंग्रेज़ की याद आती रही जिसका सूट टाँगने के लिए उस आलमारी का विधान बनाया गया होगा। कुल मिलाकर चार लोगों के रईस परिवार के सफ़र को सुकूनसाज़ बनाने का पूरा इंतज़ाम था। यहाँ तक कि कोच परिचालक को फ़ौरन तलब करने के लिए हर बर्थ के पास घंटी भी लगी हुई थी। हालांकि कुछ समय मे ही शांति ने समझ लिया कि वो भी अंग्रेज़ो के ज़माने का अवशेष है। तब गोरे साहब के लिए हिन्दुस्तानी अटेंडेंट दौड़ा चला आता होगा- अब वो नहीं आता। या शायद किसी एमपी-एमएलए या किसी बड़े अफ़सर के कोच में उपस्थित होने पर अब भी आता हो। वैसे भी पहले दर्ज़े की रेलयात्रा जिस तरह शांति और अजय के लिए अपवाद थी शायद वे भी पहले दर्ज़े के उस कोच के लिए अपवाद थे। 

रात भर का सफ़र था। अटेंडेंट कम्बल-चादर आके दे गया। बाहर हलकी ठण्ड थी। मगर डब्बे के भीतर उससे भी ज़्यादा ठण्ड थी। इसके बावजूद शांति के सहयात्री बार-बार शिकायत करते रहे- "ठण्डा नहीं हो रहा.. पसीना आ रहा है.. और बढ़ाओ.. !" शांति हैरत से उन्हे देखती ही रह गई। क्या रहस्य था उनकी गर्मी का? बुरी तरह कुड़कुड़ाए बिना क्या उनका पैसा वसूल नहीं होने वाला था? वो कुछ कहना चाहती थी पर अजय ने उसका हाथ दबा दिया। 

रात को शांति की जब नींद खुली तो गाड़ी खड़ी हुई थी। कोई स्टेशन आया था। पांच बज रहे थे। शांति चाय की तलाश में उठकर बाहर तक गई। दरवाज़ा खोलते-खोलते ही चायवालों की आवाज़ आनी शुरु हो गई। बाहर झांक कर देखा तो उसके डब्बे के सामने कोई नहीं था। सारे चायवाले जनरल डब्बे की खिड़कियों के आगे मंडला रहे थे। मगर वे सारे जनरल डब्बे के दरवाज़े पर लगी भीड़ से बुरी तरह आच्छादित थे। चढ़ने वालों के बीच गज़ब की जद्दोजहद चल रही थी। वहाँ कोई पुलिस वाला भी नहीं था। डब्बे में दाख़िल होने के लिए धक्कामुक्की ही एकमात्र योग्यता साबित हो रही थी। और अपनी योग्यता का परिचय देने में कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता था। गाड़ी धीरे-धीरे सरकने लगी। शांति को उस प्रभात वेला में चाय मिलने की उम्मीद ख़तम होती नज़र आनी चाहिये थी। पर उसे उस भीड़ में अधिकतर की अपने गंतव्य में पहुँच पाने की उम्मीद डूबती नज़र आई। भीड़ के एकदम अंत के एक अधेड़ दम्पति ऊहापोह में पहले दर्ज़े के दरवाज़े की ओर चले आए। मगर कोच के ज़ीने पर पैर रखने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे। न जाने किस ख़्याल में शांति दरवाज़े से पीछे हट गई। शांति के इस मुद्रा को उन्होने एक इशारा समझा और चढ़ गए। और डब्बे  के एक कोने में अनाधिकार भाव से खड़े हो गए और किसी अनजान शिकायतकर्ता से बुदबुदाकर कहने लगे- आगे उतर जाएंगे। शांति वहाँ खड़े होने भर में असहज अनुभव करने लगी। वो अपनी बर्थ पर लौट गई और लेट गई। उसे नींद नहीं आई। थोड़ी देर में कुछ आवाज़े आईं। उठकर बाहर गई तो पता चला कि उस दमपति को अटेंडेंट ने लगभग धकेल कर गाड़ी के भीतर चलता कर दिया। किसी और कोच की तरफ़। 

 क़ानूनन ग़लती उस दम्पति की थी। वे पहले दर्ज़े में चढ़ने के अधिकारी नहीं थे। पर क्या इस ग़लती में सरकार की कोई नैतिक ज़िम्मेदारी नहीं थी? आम आदमी न तो ऊँचे दर्ज़े का किराया वहन कर सकता है और न ही अपनी यात्राओं को पहले से योजनाबद्ध कर सकने का नियंत्रण अपने जीवन पर रखता है- तो क्या सरकार उसे जनरल दर्ज़े में मुर्ग़ियों की तरह भरने के लिए अभिशप्त बनाए रखेगी। अभी तो उनजानवरों के 'एनीमल राइट्स' की बातें उठने लगीं हैं। जनरल डब्बे में सफ़र करने वाले आदमी के 'ह्यूमन राइट्स' का कोई मसला बनता है क्या? या उसे अपनी गरिमा के साथ सफ़र करने का कोई हक़ नहीं? या तो वो एक लम्बी लड़ाई के बाद आलू-प्याज़ की तरह जनरल डब्बे की बोरी में बंद हो जाए- जहाँ पेशाब करने के बाथरूम तक सफ़र भी एक बड़ा संघर्ष है- और या फिर किसी ऊँचे दर्ज़े के अटेंडेंट के हाथों अपने सम्मान का सौदा करे। और न जाने क्यों शांति को यक़ीन है कि ये सिर्फ़ सरकार के पास पैसों की तंगी और रेलवे के ठसाठस भरे टाइमटेबल का मसला नहीं है। इस हालात के पीछे काली खाल में गोरी आत्मा वाले शासक वर्ग की आम आदमी के प्रति एक गहरी उदासीनता और उपेक्षा की भावना है।  

*** 

(20 फ़रवरी को दैनिक भास्कर में छपी) 

सोमवार, 19 मार्च 2012

भूतपूर्व विद्रोही



बहुत सारे आंकड़ों के बीच सर खपाते हुए शांति ने बजते हुए फ़ोन को देखा। उस पर दस नम्बर का एक आंकड़ा था। एक अनजान आंकड़ा। उसे तवज्जो दे- न दे की दुविधा के बीच शांति ने फ़ोन ले ही लिया।  
हलो?
हलो शांति.. मैं रणवीर बोल रहा हूँ.. 
येस? 
अरे भई.. मैं रणवीर सिंह बोल रहा हूँ..
रणवीर सिंह? शांति के ज़ेहन में ये नाम कुलबुलाने लगा। वो तो रणवीर सिंह नाम के एक ही शख़्स को जानती थी। भारतीय क्रांतिकारी दल के नेता रणवीर सिंह! कॉलेज के ज़माने में जो चंद लोग उसके लिए आदर्श हुआ करते थे.. रणवीर भाई का स्थान उनमें कहीं शिखर के नज़दीक़ था। 
रणवीर भाई?! 
..हाँ.. कैसी हो! 
अच्छी हूँ.. आप कैसे हैं रणवीर भाई? 
ठीक हूँ.. तुम्हारे शहर में आया था.. सोचा मुलाक़ात करता चलूँ.. 
रणवीर भाई को उसी शाम लौट जाना था इसलिए शांति ने उन्हे दफ़्तर में ही बुला लिया। उनके आने तक शांति उन्ही के बारे में सोचती रही। उस दौर में समाज में बड़ी उथल-पुथल हो रही थी। रणवीर भाई का दल समाज के आमूल-चूल बदलाव चाहता था और इसके लिए समाज के हाशिए पर पड़े हुए वर्गों की गोलबंदी में यक़ीन रखता था। शहर के मध्यवर्ग में तो उनकी मौजूदगी नाममात्र की थी पर शहर के सारे कॉलेजों के विद्यार्थियों के बीच उनके दल की ज़बरदस्त लोकप्रियता थी। अधिकत कॉलेजों के चुनाव में भारतीय क्रांतिकारी दल के ही प्रत्याशी जीतते थे। और उसका प्रमुख कारण रणवीर भाई थे। उनका व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था कि जो भी एक बार उनसे मिल लेता, प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। लम्बा क़द, साँवला रंग, तेजस्वी मुखमुद्रा और अंगारे की तरह चमकती हुई आँखें। उनसे नज़रें मिलाना सूरज से आँखे चार करने से कम नहीं था। और उनसे बात करना जैसे किसी लाइब्रेरी में दाख़िल होना था। सभी क़ायल थे उनकी मेधा के। उनके बारे में मशहूर था कि वे जब चाहें आई ए एस हो जाएं। पर उनकी नैतिक नज़र में उनका निजी हित विराट मानवता के हित के आगे कुछ भी नहीं था। शांति भी उनकी आदर्शवादी राजनीति और सम्मोहक शख़्सियत से बहुत मुतास्सिर रही। उनके दल की सदस्य कभी नहीं बनी पर एक सक्रिय हमदर्द के रूप में जब मौक़ा मिले उनकी गतिविधियों में शामिल होती रही। 

रणवीर भाई ने तीन बजे आने को कहा था। शांति कुछ काम पहले निबटाकर और कुछ काम उनसे मुलाक़ात के बाद के लिए छोड़कर तीन बजे से ही उनका इंतज़ार करने लगी। रणवीर भाई वक़्त के बेहद पाबन्द थे। पर जब चार बजे गए तो शांति को लगा कि शायद वे नहीं आएंगे। और शांति अपने आँकड़ों की दुनिया में लौट गई। 
हलो शांति! 
शांति ने सर उठाकर देखा। पहचान तो लिया कि रणवीर भाई ही थे.. पर काफ़ी बदले हुए से। पहले सी छरहरी काया नहीं थी, पेट निकल आया था। 
रणवीर भाई ..मुझे तो लगा आप अब नहीं आयेंगे.. 
माफ़ करना.. देर हो गई.. 
आइये! बैठिए!! 
गर्मी होने लगी.. थोड़ा पानी पिऊंगा.. 
जी.. ज़रूर!! 
रणवीर भाई की बाल-दाढ़ी भी काफ़ी पक गई थे। दाढ़ी उस दौर में भी होती थी पर कपड़ों की उन्होने कभी परवाह नहीं की। वे अक्सर एक ही जोड़ी पैंट-कमीज़ हफ़्तों डाँटे रहते- वैसी ही गुंजली और मैली। पर उससे उनकी कशिश पर कुछ फ़र्क़ न पड़ता। एक चमक थी तब जो हर देखने वाली को चौंधियाए रहती। शांति ने देखा कि उनके कपड़े धुले और इस्त्री किए हुए थे पर चेहरे की चमक लापता थी। शांति ने डरते-डरते उनकी आँखों की सिम्त नज़र फेरी - वहाँ एक अजब सी धुंधली हताशा और उदासी डेरा डाले थी। ये क्या हो गया रणवीर भाई को? वो आदमी कहाँ है जिसकी आँखों मे देखने से लोग झुलस जाते थे? शांति उनसे पूछना तो बहुत कुछ चाहती थी- आदर्श, व्यवस्था और विप्लव की बाबत -पर न जाने क्यों साहस न कर सकी। जैसे किसी के घाव की ओर देखने से झिझकते हैं लोग..  
कितने सालों बाद देख रही हूँ आप को.. 
एक ज़माना बीत गया.. 
आपने शादी नहीं की.. ?
की तो.. आठ साल हो गए..
अच्छा? किससे? मै जानती हूँ उन्हे?
नहीं आप नहीं जानती.. उनका नाम शैला है..
 क्या करती हैं शैला जी?
आजकल बहुत बीमार रहती हैं.. 
क्या हुआ उन्हे.. 
एक नहीं तमाम बीमारियां है.. पिछले आठ साल में कम से कम तीन साल तो उन्होने अस्पताल के बिस्तर पर बिताए हैं.. 
अरे!!  
.. क्या करें..!?  
तो कैसे मैनेज करते हैं आप.. 
आसान नहीं है.. कुछ दोस्त हैं जो मदद करते हैं.. आप तो जानती हैं बाज़ारीकरण के इस दौर में स्वास्थ्य में कमोडिटी बन चुका है.. और मुफ़लिस को सेहत भी नसीब नहीं..  
ये कहते हुए रणवीर भाई की आँखें और मुरझा गईं। उन्हे इस हालत में देखकर शांति के भीतर कुछ बिलखने सा लगा। देर तक मद्धम सुरों में बात करने और दफ़्तर बंद होने के बाद ही शांति और रणवीर भाई वहाँ से निकले। शांति उन्हे स्टेशन तक छोड़ने गई। और जाने से पहले उनके हाथ में एक चेक थमा दिया- शैला जी के इलाज के लिए। रणवीर भाई ने चेक पर एक निगाह डाली और एक खिसयायी मुस्कराहट के साथ उसे जेब में सरका लिया। लौटते हुए शांति ने सोचा कि जिस आसानी से उसने शैला जी के इलाज के लिए इम्दाद दे दी.. क्या उसी आसानी से रणवीर भाई का भी इलाज मुमकिन है? जिस रोग ने उनकी आँखों की चमक और चेहरे का तेज हर लिया, उसका क्या?  एक क्रांतिकारी का सबसे आकर्षक पहलू होता है जीवन के प्रति उसका सघन और उदात्त नज़रिया। उसके ढह जाने के बाद रणवीर भाई निहायत खोखले नज़र आए थे शांति को। 

घर लौटने के बाद भी रणवीर भाई उसके साथ ही बने रहे..  ढेरों तकलीफ़ देने वाल सवाल छटपटाते रहे उसके भीतर.. रणवीर भाई ऐसे क्यों हो गए? ये उनकी राजनीति का दोष था या उनकी कोई व्यक्तिगत कमज़ोरी थी? या हर आदर्शवादी विद्रोही की यही नियति होती है? क्यों हमारे समाज में आदर्शों पर चलने वाली डगर इतनी कांटो भरी और कठोर होती है..? क्या आम आदमी का जीवन जीते हुए गहरा सामाजिक बदलाव करना मुमकिन है ही नहीं?  क्यों यौवन के कुछ वर्षों के बाद  आदर्शों की डगर चलना नामुमकिन हो जाता है.. या फिर आदर्श सिर्फ़ यौवन का ही शग़ल है? 

*** 

(इस  इतवार दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुई) 

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

स्मृति




पहचाना? शांति ने पूछा।
शांति साफ़ देख पा रही थी कि शब्बो देर तक उस मुस्कराते चेहरे से मिलती-जुलती कोई शकल अपनी स्मृतियों की गठरी में टटोलती रही। कुछ बहुत भारी पल गुज़रे। शब्बो के लिए समय जैसे लिथड़ने लगा। वो चेहरा किसी ख़ुशनुमा जवाब के इन्तज़ार में मुसकराता ही रहा। हर एक गुज़रते पल के साथ शब्बो के चेहरे पर एक अपराधबोध सा उभरता आ रहा था। न पहचानना सरासर बदतमीज़ी और बेअदबी है। अपनी शर्म में शब्बो ने चेहरे पर एक झूठी मुस्कराहट ओढ़ ली.. और तुक्के फेंकने लगी..
स्कूल में थे न..?
'थे तो.. पर नाम याद नहीं आ रहा न? 
'त्च्च..!! ..सचमुच याद नहीं आ रहा..!'  
'मैं जानती थी.. तू भूल जाएगी मुझे..!' अनजान चेहरे पर थोड़ी उदासी फैल गई। 
इसके पहले कि उदासी और पैर फैलाये शांति ने मामले को अपनी गिरफ़्त में ले लिया।  
'सुमन है रे शब्बो!' शांति ने शब्बो को याद दिलाने की कोशिश की..'याद नहीं है टेन्थ सी..हम तीनों साथ थे..मेरे बगल के घर में रहती थी.. कितनी बार साथ चाट खाई है हमने.. कितनी एम्बीज़ बॉरो की थी उससे.. सब भूल गई?'
'और दीदी की शादी में जीजा जी के जूते छिपाने की लीडरशिप भी तूने ही की थी..' सुमन ने याद दिलाया। 
'और फिर 'मेरे हाथों में नौ-नौ चूड़ियां' पर नाचकर सबके होश भी उड़ा दिए थे', शांति ने जोड़ा। 
इतना बताने के बाद भी शब्बो के ज़ेहन में कोई कुलबुलाहट नहीं हुई। उसके चेहरे से ऐसा लग रहा था कि जैसे किसी और के बारे में चर्चा हो रही हो या फिर उसके किसी ऐसे पूर्वजन्म की बातें जिनकी उसे कोई याद नहीं है। मगर ये सारे भाव दबा देने की पूरी कोशिश की झलक भी उसके चेहरे से हल्की-हल्की ज़ाहिर हो ही जा रही थी। 
'अब आया याद?, शांति ने उसका हाथ पकड़ कर झकझोरा। 
'ह..हाँ..' शब्बो अपने झूठ पर जारी रही, 'याद है.. याद है.. पर आजकल न जाने मेरी याददाश्त को क्या हो गया है.. आजकल तो कुछ भी भूल जाती हूँ.. दूधवाले और वाचमैन का नाम तो सभी भूलते होंगे पर मैं तो हीरो-हीरोइन का नाम भी भूलने लगी हूँ.. मरियम नकल करती है मेरी- अरे वो कौन सी फ़िल्म थी.. जिसमें वो गाना था.. अरे वो जो हसीन सा हीरो है उस की तो फ़िल्म थी.. अरे वही जो अपनी ज़ुल्फ़ें अदा से झटकता रहता है..' 
'अच्छा.. ये हाल हो गया तुम्हारा!?' सुमन ने हमदर्दी से पूछा? 

शांति जानती थी कि शब्बो अपनी झेंप मिटाने के लिए बहुत कुछ बढ़ा-चढ़ाकर बता रही थी। पर शब्बो झूठ भी नहीं बोल रही थी। शांति और शब्बो बचपन की दोस्त हैं। स्कूल से एक दूसरे के साथ हैं। स्कूल- कालेज की तमाम बातें और क़िस्से जो शांति को चमकीले उजाले की स्पष्टता के साथ याद हैं, शब्बो के ज़ेहन से परमानेंटली डिलीट हो चुके हैं। बेचारी शब्बो! ऐसी स्मृति है उसकी कि बार-बार दोस्तों के बीच शर्मिन्दा होना पड़ता है उसे। सुमन के सामने वाली यह हालत पहली बार नहीं हुई है। जब भी कभी पुराने दोस्त मिलते हैं तो ऐसी ही हालत बार-बार पैदा होती है। जो असहजता सुमन को भूल जाने से शब्बो में जनमी थी - शब्बो को उसे भी भूलते देर नहीं लगी। दो-चार बातों के बाद शब्बो अपने रंग में वापस लौट आई। शांति को शब्बो के इस गुण पर बड़ी हैरानी होती और कभी-कभी रश्क भी होता! शांति कभी कुछ नहीं भूलती। उसे सब कुछ सब समय याद रहता है। 

सुमन चली गई, शब्बो भी। खाना-पीना करके, सबकुछ समेट कर शांति सो गई। देर रात अचानक उसकी नींद खुल गई। अजीब एहसास था एक तरफ़ गला कुछ सा सूख रहा था और वहीं पैर गल से रहे थे। गला तर करने के लिए रजाई से निकलने का यकायक मन नहीं किया शांति का। चुपचाप वहीं पड़ी रही। पूरे आलम में सन्नाटा था। बस बग़ल में अजय की सांस की आवाज़ और एक कुत्ता कहीं दूर भौंक रहा था लगातार। और कहीं कोई और आवाज़ नहीं थी। बस एक नियमित अन्तराल के बाद उस कुत्ते की भौंकने की आवाज़ आती जा रही थी-  भौं-भौं.. भौं-भौं.. भौं-भौं। 

शांति ने चाहा फिर सो जाए पर एक बात जो वो कभी भूली नहीं, उसके ज़ेहन में घूमती जा रही थी- गर्मी थी.. छुट्टियां थीं.. दोपहर थी.. माँ को हलका सा बुख़ार था। चिपचिपाते लम्बे उबाऊ दिनों के बहुत इन्तज़ार के बाद बादल घुमड़े और फिर गड़गड़ाकर मेह बरसने लगा। नन्ही शांति उत्साह से झूम उठी और चीख़ी- माँ देखो बारिश हो रही है! माँ ने कराह कर उसे बरज दिया- अच्छा है पर तू बाहर मत जाना! शांति के सारे उत्साह पर पानी फिर गया- क्यों माँ? माँ को बोलने में कष्ट हो रहा था। वो कहना चाहती थी कि पहली बारिश में भीगने से त्वचा के रोग हो सकते हैं, पर नहीं कहा। बस डाँटकर चुप करा दिया। शांति चुप तो हो गई पर मानी नहीं। हौले से दरवाज़ा खोलकर बारिश में देर तक नहाती रही। और जब बदन में शिअरन होने लगी तो उसी तरह हौले घर में दाखिल हुई। देखा माँ कहाँ है- माँ वहीं अपने बिस्तर पर लेटी हुई थी। नन्ही शांति बाथरूम में जाकर कपड़े बदलने लगी। दो मिनट बाद किसी के रपटकर गिरने का शब्द हुआ। जब शांति बाहर आई तो देखा कि माँ अपने कमरे के बाहर फ़र्श पर गिरी पड़ी है। जहाँ शांति ने रुककर माँ को चुपके से देखा था, वहीं पर शांति के बदन से गिरकर जमा हुए पानी पर माँ फ़िसल गई थी। और तब से अक्सर शांति की स्मृति में रात-बिरात फ़िसलती रहती है।   

ऐसी ही कितनी दुख, क्षोभ, पश्चाताप और अपमान की बातें हैं जो उसे रातों में सोने नहीं देतीं। ऐसे ही देर रात में कूदकर उसकी नींद की राह अवरुद्ध कर देती हैं। शांति ने बहुत चाहा कि फिर सो जाए पर माँ के चेहरे का वो कष्ट और अवसाद उसकी आत्मा में और बिछौने में काँटे की तरह गड़ता रहा। कुत्ता अभी भी भौंक रहा था, उसी नियमितता से- भौं-भौं.. भौं-भौं.. भौं-भौं। न जाने वो कोई बात भूल गया था या उसे कोई बात याद आ रही थी। 

*** 

(१५ जनवरी को दैनिक भास्कर में छपी) 
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