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बुधवार, 28 नवंबर 2007

क्योंकि हमारे पास दिमाग़ हैं!!!

यह घटना एक स्पोर्ट्स स्टेडियम में घटी.

आठ बच्चे एक दौड़ में भाग लेने के लिए ट्रैक पर तैयार खड़े थे.

रेडी! स्टेडी! धाँय!

एक खिलौना पिस्तौल के धमाके के साथ सभी आठों लड़कियाँ दौड़ने लगीं.

बमुश्किल वे दस पन्द्रह कदम ही दौड़े होंगे कि उनमें से सबसे छोटी फ़िसली और गिर गई, चोट लगी और दर्द के मारे रोने लगी.

जब बाक़ी सात लड़कियों ने ये रोना सुना, तो वे रुक गईं, एक पल को ठिठकी फिर मुड़ीं और गिरी हुई बच्ची के पास वापस लौट आईं.उनमें से एक ने झुक कर गिरी हुई बच्ची को उठाया, चूमा और प्यार से पूछा, ‘दर्द कम हो गया न’. सातों बच्चियों ने गिरी हुई बच्ची को उठाया, चुप कराया, उन में से दो ने गिरी हुई बच्ची को अच्छे से पकड़ा और सातों हाथ पकड़ कर विजय रेखा तक चलते चले गए.









अधिकारीगण सन्न थे. स्टेडियम, बैठे हुए हज़ारों लोगों की तालियों से गूँज रहा था. कई लोगों की आँखें नम हो कर शायद ईश्वर को भी छू रही थीं.

जी हाँ. यह हैदराबाद में हुआ, हाल ही में.

यह प्रतियोगिता राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थान द्वारा आयोजित की गई थी.

प्रतियोगिता में भाग लेने वाले सभी बच्चे स्पैस्टिक हैं. जी, मानसिक चुनौतियों से ग्रस्त.

उन्होने दुनिया को क्या सीख दी?

सामूहिकता?
मानवता?
आपस में बराबरी?

सफल लोग उनकी मदद करते हैं जो सीखने में धीमे हैं, ताकि वे पिछड़ न जायँ. यह सच में एक बड़ा सन्देश है.. इसे फैलायें!


हम ऐसा कभी नहीं कर सकते क्योंकि हमारे पास दिमाग़ हैं!!!!

(इस प्रेरक प्रसंग का मैंने अनुवाद भर ही किया है अंग्रेज़ी से.. जिसे कपिलदेव शर्मा ने मेल में भेजते हुए आदेश दिया कि पब्लिश दिस.. ज़ाहिर है मैं आदेश टाल नहीं सका.. )
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