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बुधवार, 30 जून 2010

सर में खिड़की

यहूदी लोग सर के पिछले हिस्से को टोपी से ढके रखते हैं। दूसरी अन्य बातों के अलावा, यहूदियों की इस रवायत को मुसलमानों ने जस का तस अपनाया हुआ है। यहूदी उस को किप्पा कहते हैं और मुस्लिमों में इस को नमाज़ी टोपी के नाम से जाना जाता है। हालांकि मुस्लिमों की नमाज़ी टोपी आजकल पूरे सर को ढकने वाली कहलाने लगी हैं ।गिरजाघरों में पादरी भी कुछ मिलती-जुलती ही टोपी पहने रहते हैं। वैटिकन वाले पोप को देखिये न!

इसी तरह पुराने सनातन धर्म में भी, सर को कभी भी पूरी तरह न मूँडने के निर्देश थे।  सर के ऊपरी पिछले हिस्से पर गाय के खुर के आकार जितनी जगह पर बढ़े हुए बालों को शिखा कहा जाता। जिसे लोग आनुष्ठानिक नियमानुसार गाँठ मार कर रखते या कभी-कभी विष्णुगुप्त कौटिल्य की तरह किसी के सर्वनाश के लिए खोले रखने की शपथ ले लेते। आजकल शिखा का दिखना बंद हो गया मगर सौ-पचास बरस पहले तक वो शिखा ब्राह्मणों की ऐसी पहचान थी कि एक चील और एक मैना का नाम उनकी सर में बालों के ख़ास बनावट के चलते ब्राह्मणी काइट व ब्राह्मणी मैना पड़ गया।  है क्या ऐसा सर के उस पिछले हिस्से में? 

कभी देखा है कैच छूट जाने पर खिलाड़ी सर के उसी स्थान को दोनों हाथ से ढक लेते हैं? जैसे जापानी फ़ुटबालर ने पेनाल्टी किक मिस की तो उसी जगह सर पकड़ लिया। क्या निकला जा रहा होता है वहाँ से जिसे हाथ लगा कर ढाँप लिया जाता है?  कहते हैं ब्रह्म रंध्र का स्थान भी वहीं कहीं है? और सहस्र चक्र का भी स्थान कपाल के भीतर ही बताते हैं।

शम्स तबरेज़ी ने जब भरे बाज़ार में रूमी का गधा रोक लिया और उनसे पूछा कि बता, मुहम्मद बड़ा कि बिस्तामी, तो  रूमी उस वक़्त तो गश खाकर गिर पड़े मगर बाद में बताया कि इस का जवाब सोचते हुए उनके दिमाग़ में एक खिड़की खुली, उस से धुआँ निकला और अर्श की तरफ़ चला गया। क्या वह खिड़की सर के इसी पिछले हिस्से से खुली थी? 

एक व्याख्या है यहाँ पर।
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