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रविवार, 8 नवंबर 2009

वसुधैव कुटुम्बकम?

दुनिया भर में फैले हुए प्रवासी भारतीय हिन्दुओं को यदि उन देशों के बहुसंख्यक लोग गोमांस खाने पर मजबूर करने लगे तो उन्हे कैसा लगेगा। यदि वो अपनी मरजी से ऐसा करते हैं तो किसी को कोई आपत्ति क्यों होगी लेकिन यदि उन पर यह बाध्य कर दिया जाय कि यदि उस देश में रहना होगा तो गोमांसाहारी बनना होगा तो उन को कैसा महसूस होगा और आप को कैसा महसूस होगा? *

भारत में मुसलमान तेरह चौदह सौ साल से रह रहे हैं। कोई भारतीय मुसलमान विदेशी नहीं है, इस भूमि पर उसका भी इतना ही हक़ है जितना कि किसी और का। वे अपने वतन को किस तरह से प्यार करेंगे और किस तरह उसका प्रदर्शन करेंगे यह तय करने वाला कोई और नहीं वे खुद होंगे। यदि कोई दीनी तंजीम यह तय करती है कि यह गीत उनके धर्म के आड़े आता है और वे वन्दे मातरम का गान नहीं करना चाहते तो इसमें किसी को ऐतराज़ कैसा?

यह गीत देशभक्ति का कोई पैमाना नहीं है। देशभक्ति की आड़ में देशवासियों से नफ़रत करना यह कैसी नीति है? इस गीत को गाने से या न गाने से देश का क्या हानि-लाभ हो जा रहा है? यह कोई मुद्दा ही नहीं है। इस बात पर विवाद करना वितण्डा खड़ा करना और साम्प्रदायिक भावनाओं को भड़काने की साज़िश है।

हर धार्मिक व्यक्ति साम्प्रदायिक नहीं होता, जैसे कि हर साम्प्रदायिक व्यक्ति धार्मिक नहीं होता (आडवाणी जी इस का सबसे बड़ा प्रमाण हैं)।

वसुधैव कुटुम्बकम का नारा देने वाले पहले देश के लोगों के साथ कुटुम्ब के सदस्यों के तौर पर सम्मान करना सीखें, ये हिटलरी नीति छोड़ें और विचारों और मान्यताओं के वैविध्य के लिए जगह बनाएं।

(जन गण मन और वन्दे मातरम पर यहाँ और पढ़ें!)

* यह प्रवासी का उदाहरण इसलिए दिया है कि वे भारत में बहुसंख्यक और किसी भी अन्य देश में पहले प्रवासी है फिर अल्पसंख्यक।
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