इधर कुछ रोज़ से पतनशीलता को लेकर बहुत लड़िया रहे हैं सभी.. सालों तक लात भी बहुत लगाई गई है उसे। हमारे वही शायर जिन्हे हम सर-आँखों पर बिठाते हैं उनको काँट-छाँट कर मनमाफ़िक शरीफ़ (पढ़िये प्रगतिशील) बनाने का काम किया गया है।
मीर साहब की सादगी और सोज़ मशहूर है पर वे घोषित तौर पर अम्रदपरस्त (लौंडेबाज़) भी थे, ये बात बाद के विक्टोरियन नैतिकता से प्रगतिशील हो गए लोग खा गए, पचा गए और पादा तक नहीं।
सरदार जाफ़री खुद बताते हैं कि कैसे उन्होने मीर के दीवान (राजकमल से प्रकाशित) का संपादन करते हुए वासनामय और यौन सम्बन्धी अश्लीलता भरे सभी शेर खारिज़ कर दिए। अब किसे फ़ुर्सत कि बैठ कर मीर के कुल्लियात में से सारे पतनशील शेर छाँटे..? मुझ जैसे कुछ लोगों को है वैसे!
कुल्लियात तो हाथ नहीं लगा अभी मगर कहीं और से मीर के ये दो शेर बरामद हुए हैं.. मुलाहिज़ा फ़रमाएं..
कैफ़ियत अत्तार के लौंडे में बहुत हैं
इस नुस्खे की कोई न रही हमको दवा याद
मीर क्या सादे हैं बीमार हुए जिसके सबब
उसी अत्तार के लड़के से दवा लेते हैं
(अत्तार: हकीम)