ओय लकी ओय और देव डी से दिल्ली का जो पुनरन्वेषण हुआ है सुधीर मिश्रा की फ़िल्म भी उसी आधार पर बहुत कस कर अपने आप को टिकाए हुए है। स्थानीयता में धंसे हुए लोकेशन्स, चरित्र और संवाद ही फ़िल्म का बलवान पहलू है। इरफ़ान, सौरभ शुक्ला, यशपाल, सुशान्त, अरुणोदय, प्रशान्त, विपिन सब ने अपना किरदार बख़ूबी निभाया है। चित्रांगदा के बारे में क्या कहा जाय? इतने सारे प्रतिभावान अभिनेताओं के बीच उन्होने इतना तो सीख लिया होता कि अगर सीन में गिटार बजाना हो तो कम से कम कुछ कौर्ड्स की ग्रिप ही सीख लें!
सुधीर मिश्रा ने प्रेम की मजबूरियों को दिखाने के लिए की है सारी मशक्कत। सीन छोटे-छोटे और तीखे हैं। संवाद चुलबुले हैं। सीधे आख्यान को तोड़कर वे काल में आगे-पीछे भी सैर कराते हैं दर्शक को। भरपूर कोशिश की है उन्होने कि एक रफ़्तार बनी रहे फ़िल्म में। एक हद तक बनी भी रहती है। लेकिन एक घण्टे के बाद मुझे बेचैनी होने लगी। कहानी में कोई ग्राफ़ ही नहीं है। सब कुछ एक ही ऊँचाई पर बना रहता है शुरु से लेकर आख़िर तक। अंत तो इतना अधिक खिंचा हुआ और बोझिल है कि कई लोग उठ कर चले गए। शायद एक दर्जन क्लाइमेक्सेज़ और आधा दरजन एपीलौग्स हैं। और उसके बाद फ़िल्म आईरौनिक टेल से सुखान्त हो जाती है। आम तौर फ़िल्मी अश्लीलताओं को लेकर मैं काफ़ी सहिष्णु हूँ, पर इस फ़िल्म का आख़िरी दृश्य मेरे लिए असह हो गया।
पूरी फ़िल्म में कोई दृश्य, कोई चरित्र, कोई बात ऐसी नहीं जो मेरे दिल में गहरे उतर सकी। प्रेम की तथाकथित मजबूरियों की कहानी में एक बार भी प्रेम की भावना पर्दे से उतरकर मेरे दिल की दिशा में नहीं आई। चित्रांगदा तो काठ हैं मगर इरफ़ान तो क़ाबिल एक्टर हैं। मगर नहीं, कोई एहसास, कोई सुरसुरी, कोई भावना, कोई जज़्बात, दुनिया की किसी भी भाषा में अनूदित होकर कोई फ़ीलिंग.. नहीं, कुछ नहीं। अगर थोड़ी बहुत कोमलता नज़र आती है तो अरुणोदय और अदिति (शायद यही नाम है) की प्रेमप्रकरण में। बस! अफ़सोस है, सुधीर मिश्रा के पके हुए बालों को देखकर मैं उनसे उतनी ही पकी हुई फ़िल्म की उम्मीद कर रहा था! मेरे अफ़सोस पर एक मित्र का कहना है कि अफ़सोस काहे का.. पकाया न उन्होने! :)