इज़राईली नज़रिया
फ़िलिस्तीनी नज़रिया
और हमास का पक्ष
जून २००७ में गज़ा पट्टी में छिड़े एक अन्दरूनी संघर्ष में ११८ मौतें हुईं और उसके बाद दिवंगत नेता यासिर अराफ़ात के दल 'फ़तेह' को पूरी तरह से उखाड़ कर 'हमास' गज़ा पट्टी का एकछत्र शासक हो गया। इस संघर्ष के पहले फ़तेह और हमास, फ़िलिस्तीन में आम चुनावों के बाद क़ायम हुई एक मिली-जुली सरकार चला रहे थे। हमास का मानना है कि फ़तेह वाले भ्रष्ट, पतित और इज़राईल के एजेन्ट हैं। जबकि हमास के बारे में आम राय ये है कि वह एक आतंकवादी संगठन है। हमास के हिंसक सत्तापलट के बाद इज़राईल ने गज़ा पट्टी की जो नाकाबन्दी कर रखी है वो अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा इसी आधार पर स्वीकृत है।
नीचे के विडियो में फ़तेह वाले चुहों की शकल में चित्रित किए गए हैं जो इस्लामी जीवन और शरिया की धज्जियां उड़ा रहे हैं और हमास को इस्लाम की रक्षा में उठ खड़े हुए शेर के बतौर दिखाया गया है।
अभी हाल में इज़राईल ने फ़्लोटिला नामक नावों के बेड़े पर हमला कर के उस गज़ा पट्टी में राहत सामग्री पहुँचाने से रोक दिया, जिस की नाकाबन्दी वह पिछले तीन सालों से किए हुए है। इस कार्यवाही में पोत पर मौजूद ९ फ़िलिस्तीनी हमदर्द* मारे गए और कई अन्य घायल हो गए। जिसके कारण इज़राईल की चौतरफ़ा निन्दा हो रही है और सही हो रही है। ९ लोगों की मौत किसी भी बहाने से न्यायसंगत नहीं ठहराई जा सकती, वो अन्याय और अत्याचार ही रहेगी।
इज़राईल के बचाव में कुछ विद्वानों का कहना है कि इस फ़्लोटिला अभियान का मक़सद सिर्फ़ इज़राईल को बदनाम करना था। वे जानते थे कि इज़राईल कोई कड़ा क़दम ज़रूर उठाएगा जिसे रिकार्ड करने के लिए दुनिया भर के पत्रकार पोत पर मौजूद थे। उनका तर्क था कि यदि इज़राईल उन्हे नहीं रोकता है तो इलाक़े में उसकी सत्ता, जिसकी हुंकारी वह ६२ वर्ष से भर रहा है, ढह जाती है; और अगर रोकता है तो उसकी छवि और बदतर हो जाती है। ये बात तार्किक लगती है। इस मामले से पहले से ही दाग़दार इज़राईल की और बहुत भद्द हो गई है क्योंकि उसने इलाक़े पर अपनी सत्ता की पकड़ ढीली करने के मुक़ाबले अपनी छवि की धूमिलता का सौदा मंज़ूर कर लिया।
* टीवी पर ख़बरों में जो एक विडियो दिखाया गया जिसमें हेलीकौप्टर से उतरते इज़राईली सैनिकों पर फ़िलीस्तीनी हमदर्द लाठियों से हमला करते नज़र आए। उसे देखने के बाद मैं उन्हे ठीक-ठीक शांति कार्यकर्ता नहीं कह पा रहा हूँ। शांति के कार्यकर्ता लाठी ले के हिंसा करें ये हमारी गाँधीवादी नैतिकता में अट नहीं पाता।
इज़राईल-फ़िलीस्तीन के इतिहास पर मेरे द्वारा लिखी श्रंखला को यहाँ पर पढ़ें..
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