शनिवार, 11 जनवरी 2014

हम पर है

फूल खिले हैं।
खुशबू आ रही है।
आनन्द उपलब्ध है।
लेना- न लेना,
हम पर है।

शाम हो रही है।
आसमां रंगीन है।
देखें या देख कर भी न देखें,
हम पर है।

ईश्वर सब जगह है।
सब समय है।
आनन्द बहा रहा है।
शांति उड़ेल रहा है।
नशा लुटा रहा है।
मस्त होना- न होना,
हम पर है।

***

3 टिप्‍पणियां:

दीपक बाबा ने कहा…

सत्य कथन ही कविता है.

सुंदर.

Misra Raahul ने कहा…

काफी उम्दा प्रस्तुति.....
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (12-01-2014) को "वो 18 किमी का सफर...रविवारीय चर्चा मंच....चर्चा अंक:1490" पर भी रहेगी...!!!
- मिश्रा राहुल

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सच कहा, सब दिया है और दी है इच्छा भी।

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