मंगलवार, 25 दिसंबर 2007

ब्रह्माण्ड का सहज स्वभाव?

ऐसा माना जा सकता है कि हमारी पृथ्वी इस सृष्टि में एक अनोखी रचना है.. कम से कम अपने सौर मण्डल में तो है ही। यहाँ पर जीवन की वह अनिवार्यता मौजूद है जो और कहीं नहीं है- पानी! मगर दूसरी तरफ़ हम मनुष्यों की निवास स्थली यह ग्रह की संरचना में कुछ भी अनोखा नहीं है। यह भी उन्ही ९२ तत्वों से मिल कर बना है जिस से कि शेष सृष्टि।

पृथ्वी पर जीवन शुरु होने के बारे में दो सम्भावनाएं सोची जा सकती हैं - एक तो एक बेहद ही सूक्ष्म गणितीय सम्भावना जो विभिन्न तत्वों को सही समय पर एक साथ ले आती है और जिस से जीवन की शुरुआत हो जाती है और दूसरे यह कि यह पूरा संसार ऐसे नियमों से संचालित है जो अनुकूलता मिलते ही जीवन को जन्म देने के लिए प्रतिबद्ध है। ब्रह्माण्ड में सब कहीं पाए जाने वाले ये तत्व खुद ब खुद ऐसी संरचना तैयार करने में समर्थ हैं जिन्हें हम जीवन- प्रक्रिया के अभिन्न अंग के रूप में पहचानते हैं।

मज़े की बात ये है कि जीवन के इन पूर्वगामी तत्वों को किसी पृथ्वी जैसे ग्रह की भी ज़रूरत नहीं। जीवन निर्माण के यह मौलिक पिण्ड पूरे ब्रह्माण्ड में स्टेलर डस्ट के रूप में मौजूद हैं। डी एन ए के अन्दर मौजूद न्यूकिलाई एसिड, फ़ैटी एसिड्स और अमीनो एसिड जैसी संरचनाएं आप को कहाँ से मिल सकती हैं? पेड़- पौधों और जीव-जन्तुओं के शरीर के कोशिकाओं में.. ऐसा सहज तौर पर समझा जाता है। मगर यही संरचनाएं अगर हमें एक आकाशीय पिण्ड के भग्नावशेष पर मिलें तो?!!?

मर्चिसन ऑस्ट्रेलिया में लगभग ३० वर्ष पहले मिले मीटिरायट पर ऐसे ही प्रमाण मिले हैं। इस तथ्य के साथ अब यह दूसरा तथ्य भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि ४.२ से ३.८ बिलियन वर्ष पहले पृथ्वी पर एस्टेरॉयड की बारिश हुई और उसके तुरंत बाद ही जीवन की प्रक्रिया शुरु हो गई। क्या यह महज़ एक संयोग था.. या इस ब्रह्माण्ड का सहज स्वभाव!?

अगर इस मीटिरायट पर मिले अमीनो एसिड्स आदि का स्रोत सचमुच पृथ्वी से बाहर है तो इस का क्या अर्थ है? क्या यह कि पृथ्वी जैसा वातावरण ब्रह्माण्ड में कहीं भी बन जाने पर वहीं पृथ्वी जैसे जीवन की शुरुआत हो जाएगी? या हो चुकी है.. अनन्त ब्रह्माण्डो के अनन्त सौर मण्डलों के अनन्त ग्रहों में समांतर जीवन पल रहा है?

अपने दिमाग़ को बचाएं !


नेट पर टहलते हुए ‘कारगर दिमाग़ की दस आदतें पढ़ने को मिलीं. वैसे दिमाग़ी आदते न हों तो ही अच्छा है. इसलिए मुझे शीर्षक से कुछ ऐतराज़ है पर सुझाव बुरे नहीं हैं. मुझे तो काफ़ी ठीक-ठाक लगे.. आप देखें..





१.दिमाग़ का इस्तेमाल करें. रखे-रखे सड़ सकता है, उपयोग से स्वस्थ रहता है.

२. अपने खान-पान का ख्याल करें. वैसे तो दिमाग़ आप के पूरे वजन का केवल २% होता है.. पर २०% ऑक्सीज़न और भोजन का इस्तेमाल करता है.

३. कसरत करें. शारीरिक व्यायाम दिमाग़ को भी स्वस्थ रखता है.

४.चिंता और तनाव से बचें. वे पुराने न्यूरॉन्स की हत्या करते हैं और नए न्यूरॉन्स के बनने में बाधा बनते हैं.

५. नई चुनौतियों से लड़ते रहें. दिमाग़ का यही औचित्य है.

६.’शिक्षा पूरी हो जाने पर भी कुछ न कुछ सीखते रहें, कुछ नया जानते रहें.

७.घूमें फिरें, नई जगहों और नए वातावरण में ढलने और नए फ़ैसले लेते हुए दिमाग़ का इस्तेमाल करें.

८. अपने फ़ैसले, अपनी ग़लतियाँ खुद करें. और उनसे सीखें. दूसरों के हाथ की कठपुतली न बनें.

९. नए दोस्त बनाएं और दोस्तियाँ निभाएं.

१०.हँसे और अपने भीतर के अनोखे हास्यरस को पहचानें.

अगर ये बातें सही हैं तो हमारा दिमाग़ या तो खराब हो चुका है या खराब होने के करीब है. कई बिन्दु हमें पराजित कर मुँह चिढ़ा रहे हैं.. ४ और १० तो कुछ ज़्यादा ही!

मूल लेख यहाँ देखें.

सोमवार, 24 दिसंबर 2007

चश्मा प्रगतिशील है!

पिछले कई दिनों से ब्लॉगिंग से दूर रहा। पूरे एक हफ़्ते.. शुरु के दो चार दिन तो कम से कम देख रहा था कि क्या लिखा जा रहा है.. एक दो टिप्पणियाँ भी करता रहा.. पर तीन चार रोज़ से तो वो भी बंद हो गया। धंधे में लगा हुआ था.. अब अपना धंधा ऐसा है जो ब्लॉगिंग के साथ टकराता है। दोनों में सोचने और लिखने की ज़रूरत पड़ती है.. दस-बारह घंटे लैपटॉप लेकर बैठने के बाद ताज़ादम होने के लिए कुछ ऐसा करने को जी चाहता है जिसमें सोचना और लिखने के विभाग काम न करते हों। इसलिए हफ़्ते भर न कुछ लिख पाया और न ही मित्रों का लिखा पढ़ पाया।

हाँ इस बीच मूँछे बढ़ गईं और चश्मा बदल गया.. ये नया चश्मा फ़्लैशबैक जैसा है.. पर इसमें कुछ एकदम नया है.. पिछले चार-छै महीनों से दूर और पास के चश्मे बदलते-बदलते थक रहा था। तो बाइ-फ़ोकल ले लिया गया.. जी, ये चश्मा बाइ-फ़ोकल है.. पर बिना किसी विभाजन के.. मुझे बताया गया कि इसे प्रोग्रेसिव कहते हैं। थोड़ा मँहगा ज़रूर है.. पर सुविधा जनक है। और सबसे बड़ी बात प्रगतिशील है.. मोदी जी गुजरात में फिर से भारी बहुमत से जीत गए हैं इसका मतलब ये थोड़ी है कि प्रगतिशीलता की दुकान बंद हो गई.. :) चालू है जी.. हम खुद माल खरीद कर प्रसन्न-मन हैं।

आज सुबह एक ज्ञानवर्धक साइट से परिचय हुआ। यहाँ पर मानव शरीर की विभिन्न प्रणालियों के बारे में विस्तृत जानकारी पा सकते हैं। दो चार पन्नों के बाद रजिस्टर करने के लिए कहते हैं.. रुचि बने तो हों जायँ.. मुफ़्त है। पर जानकारिय़ाँ काम की हैं..

रजिस्ट्रेशन फ़ॉर्म में देखा प्रोफ़ेशन के खाने में सिर्फ़ डॉक्टर्स के विकल्प थे.. सिर्फ़ एक अदर था जिस में मैंने अपनी गिनती करवा दी.. बोधि भाई को थोड़ा पढ़ना पड़ेगा कि कौन सा विकल्प चुनें! :)
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