शुक्रवार, 24 अगस्त 2007

ट्रान्सलेटर्स आर ट्रेटर्स

ट्रान्सलेटर्स आर ट्रेटर्स.. ट्रान्सलेटर्स आर ट्रेटर्स.. ट्रान्सलेटर्स आर ट्रेटर्स.. किसी ने कहा था.. और जैसा कि आप देख ही रहे हैं बहुत ज़ोर देकर कहा था। चाहता तो था मगर इसी डर से इसका अनुवाद नहीं कर पाया। आज डी एन ए के एडिट पेज पर फ़ारूख ढोंडी का एक आलेख है। अंग्रेज़ी भाषा के बदसूरत इस्तेमाल पर आपत्तियाँ जताई हैं। न तो मुझे उनकी लिखी कोई फ़िल्म आज तक पसन्द आई और न यह आलेख। एक काम की बात दे गए फिर भी मुझे-- येवजेनी येव्तुशेन्को का एक कथन; "अनुवाद की फ़ितरत औरतों की तरह की है, अगर उसमें निष्ठा है तो सौन्दर्य नहीं है और सौन्दर्य है तो निष्ठा नहीं है।"

ये बात स्त्रियों के बारे में गलत ज़रूर है.. मगर अनुवाद के बारे में यह सौ प्रतिशत सच है। ये बात मैं अनुभव से जानता हूँ। रूमी को मूल फ़ारसी से अनुवाद करने की मेरी जुंग के पीछे कुछ निष्ठा वाला मामला भी था। और जिन्होने मेरा रूमी का अनुवाद पढ़ा है, वे जानते हैं कि उसमें कितना सौन्दर्य है। यहाँ पर दिये गए लिंक का अर्थ यह बिलकुल नहीं है कि जिन्होने नहीं पढ़ा है वे दौडकर जाकर पढ़ लें। वह लेख में एक और लिंक देने के लिए है, ऐसा ही समझें। मैं कबूल कर रहा हूँ कि रूमी के काव्य के मेरे द्वारा किए अनुवाद में सौन्दर्य गायब है.. वो काठ है.. क्योंकि उसमें निष्ठा कूट-कूट के भरी है (ऐसी मेरी खामखयाली है, कोई अच्छा फ़ारसी का जानकार मेरे इस कथन के लिए मुझे लथेड़-लथेड़ के मार सकता है, अग्रिम माफ़ी)।

इतने सब के बावजूद मेरे अन्दर का अनुवादक हमेशा जागा रहता है। उसकी एक वजह यह भी है कि मूल पाठ को बिना समझे आप उसका अनुवाद नहीं कर सकते। और मेरा अनुवादक उन्ही चीज़ों को अनुवाद करने के लिए किलकता रहता है, जिनके आगे मेरा मस्तक भाँय-भाँय करने लगता है। फिर भी ये ज़िद है कि हम तीरे नज़र देखेंगे, ज़ख्मे जिगर देखेंगे।

कुछ किताबें जिनका अनुवाद मैं करना चाहता रहा हूँ.. उनमें रूमी की दीवाने शम्स, मसनवी और फ़ीही मा फ़ीही हैं। फ़ीही मा फ़ीही अब सबसे ज़्यादा आसान लग रही है, क्योंकि वह मूल फ़ारसी में उपलब्ध नहीं है, अंग्रेज़ी में है। पश्चिमी दर्शन को पत्थर-हजम-चूरन की शकल में फँकाने वाली स्वीडिश लेखक जोस्टीन गार्डर की किताब सोफीज़ वर्ल्ड और अंत में फ़्रेडरिक नीत्शे की पुस्तक बियॉन्ड गुड एंड ईविल। आखिरी किताब के बारें में विशेष बात यह है कि जब भी उसे पढ़ने के लिए उठाता हूँ, काँखने लगता हूँ; तीन पेज भी एकाग्रता से कभी नहीं पढ़ पाया, मगर दिल के अरमानों का क्या कहना।


इसी किताब के चौथे अध्याय से चंद विनोद-विलास (Epigrams and Interludes) आपकी पेशेनज़र है:

--हम अपने भगवान के प्रति सबसे अधिक बेईमान है; उसे गुनाह भी नहीं करने देते।

--प्रेम में एकनिष्ठता असभ्यता है; क्योंकि यह दूसरों की कीमत पर है। भगवान में एकनिष्ठता भी।

--शांति के दौर में लड़ाकू अपने आप पर हमला बोल देता है।


5 टिप्‍पणियां:

अनामदास ने कहा…

मैं अपने अनुभव से जानता हूँ कि सही अनुवाद सुंदर नहीं होता और सुंदर अनुवाद कई बार सच्चा नहीं होता, इसीलिए बहुत सारे लोगों ने भावानुवाद की बात कही, शब्दों का नहीं बल्कि भावों का अनुवाद होना चाहिए, लेकिन जब भावानुवाद करने बैठें तो पता चलता है कि यह और जटिल काम है.

Raviratlami ने कहा…

यू आर राइट. हंड्रेड एंड वन परसेंट.

एक ट्रांसलेटर ही ट्रांसलेटर का दर्द समझ सकता है. लिनक्स ट्रांसलेशन में और अभी जीवी पर और यदा कदा अन्यत्र - हमेशा डर रहता है कि जो कहा गया है वो सही उसी रूप में अनूदित हो रहा भी है या नहीं - फ़ाइल का फाइल हो रहा है , संचिका हो रहा है या रेती (घिसने वाला औजार )तत्काल तो कुछ पता नहीं चलता :)

Pramod Singh ने कहा…

ट्रांसलेटर्स आर ट्रेटर्स मुझे खामख़्वाह का अतिवादी और नाटकीय स्‍टेटमेंट लगता है. ऐसी प्रतिक्रिया पश्चिम से ही आ सकती है जहां 'टेक्‍स्‍ट' के तरजुमे को लेकर अतिशय संवेदना व चिन्‍ता दिखाई पड़ती है. हमारी हिंदी में अनुवाद को लेकर वैसी कोई गंभीरता नहीं, न ही 'अनुवादक' की अलग से कोई 'पहचान' होती है.

सन् साठ तक ऐसे ढेरों अनुवाद देखने को मिलते थे जो विशुद्ध भावानुवाद होते थे, और उनसे किसी को एतराज़ नहीं होता था. अब वह परम्‍परा नहीं रही, लेकिन अनुवादों का स्‍तर फिर दो कौड़ी का होता है. ज़्यादातर लिटरल ट्रांसलेशन.. जिसका सिर समझ में आये न पैर. कविता का अनुवाद ज़रूर मुश्किल काम है, मगर गद्य के साथ आमतौर पर ऐसी दिक़्क़त क्‍यों होनी चाहिए, मेरी समझ में बात नहीं आती, अगरचे ज़ि‍म्‍मेदार व्‍यक्ति से और मय आर्थिक इज़्ज़त के यह काम करवाया जाये. समस्‍या है हिंदी प्रकाशन के क्षेत्र में 'टेक्‍स्‍ट' के प्रति न वैसा आदर है, न स्‍नेह. अनुवाद मोस्‍टली 'मुंशीगिरी' की मानसिकता से करवाये जाते हैं. यह मानसिकता कभी बदले तो शायद हिंदी का अच्‍छे अनुवादों से भी वास्‍ता पड़े. जैसे इटली में नबोकोव के अनुवादों के ही लिए नतालिया गिन्‍सबर्ग, अंग्रेज़ी में कल्विनो को परिचित करवाने के लिए विलियम वीबर, व रूसी में शेक्‍सपीयर के तरजु़मे के लिए पास्‍तेरनाक को पढ़कर पाठक धन्‍य होते रहे हैं.

अनूप् शुक्ल ने कहा…

कविता का कविता में भावानुवाद् करना मुश्किल् काम् है। लेकिन् गद्य् का भावानुवाद् तमाम् लोगों ने किया है। यह् निर्भर् करता है कि करने वाले की समझ् का स्तर् क्या है, उसका समर्पण् कितना है। 'आदि विद्रोही' जो कि हावर्ड् फ़्रास्ट् की किताब् है का हिंदी अनुवाद् अमृतराय् ने किया है। वह् मेरी सबसे पसंदीदा किताबों में है। आप समय् निकालिये, डूब् के करिये अनुवाद् और् इस् बात् को गलत् साबित् कर् दीजिये कि अनुवादक् गद्दार् होते हैं।:)

MAN KI BAAT ने कहा…

अनुवाद मूल से हमेशा भिन्न ही होगा । कितने भी गहरे क्यों न जाएँ पर हर भाषा की अपनी पैठ है!

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