गुरुवार, 23 अगस्त 2007

सभ्यता की निशानियाँ

आजकल गाँधीजी की पुस्तक 'हिन्द स्वराज' पढ़ रहा हूँ। सृजन शिल्पी ने अपने लेख में इस किताब के एक अंश का उद्धरण दिया था। उसे देखने के बाद किताब पढ़ने की इच्छा हुई, और दूसरे ही रोज़ मेरे वरिष्ठ मित्र कमल स्वरूप के यहाँ एक साथ दो-दो प्रतियाँ दृष्टिगोचर हुईं। स्वाभाविक रूप से एक साधिकार अधिग्रहीत कर ली गई। कुछ दिलचस्प बातें पढ़ने को मिल रही हैं। यूरोपीय सभ्यता के बारे में गाँधी जी लिखते हैं

इस सभ्यता की सही पहचान तो यह है कि लोग बाहरी दुनिया की खोजों में और शरीर के सुख में धन्यता---सार्थकता और पुरुषार्थ मानते हैं। इसकी कुछ मिसालें लें। सौ साल पहले यूरोप के लोग जैसे घरों में रहते थे उनसे ज़्यादा अच्छे घरों में आज वे रहते हैं; यह सभ्यता की निशानी मानी जाती है। इसमें शरीर सुख की बात है। इसके पहले लोग चमड़े के कपड़े पहनते थे और भालों का इस्तेमाल करते थे। अब वे लम्बे पतलून पहनते हैं और शरीर को सजाने के लिए तरह-तरह के कपड़े बनवाते हैं; और भाले के बदले एक के बाद एक पाँच गोलियाँ छोड़ सके ऐसी चक्करवाली बन्दूक इस्तेमाल करते हैं। यह सभ्यता की निशानी है।

..पहले लोग जब लड़ना चाहते थे तो एक-दूसरे का शरीर-बल आजमाते थे। आज तो तोप के एक गोले से हजारों जानें ली जा सकती हैं। यह सभ्यता की निशानी है। पहले लोग खुली हवा में अपने को ठीक लगे उतना काम स्वतंत्रता से करते थे। अब हजारों आदमी अपने गुजारे के लिए इकट्ठा हो कर बड़े कारखानों में काम करते हैं। उनकी हालत जानवर से भी बदतर हो गई है। उन्हे सीसे वगैरा के कारखाने में जान को जोखिम में डालकर काम करना पड़ता है। इसका लाभ पैसेदार लोगों को मिलता है। पहले लोगों को मारपीट कर गुलाम बनाया जाता था; आज लोगों को पैसे का और भोग का लालच दे कर गुलाम बनाया जाता है। पहले जैसे रोग नहीं थे वैसे रोग आजकल लोगों में पैदा हो गए हैं और उसके साथ डॉक्टर खोज करने लगे हैं कि इन्हे कैसे मिटाए जाएँ। ऐसा करने से अस्पताल बढ़े हैं। यह सभ्यता की निशानी मानी जाती है।..

..शरीर का सुख कैसे मिले यही आज की सभ्यता ढू़ढ़ती है; और वही देने की कोशिश करती है। परंतु वह सुख भी नहीं मिल पाता।..

..यह सभ्यता ऐसी है कि अगर हम धीरज धर के बैठे रहेंगे, तो सभ्यता की चपेट में आए हुए लोग खुद की जलाई हुई आग में जल मरेंगे। पैग़म्बर मोहम्मद साहब की सीख के मुताबिक यह शैतानी सभ्यता है। हिन्दू धर्म इसे निरा कलजुग कहता है।


ये विचार गाँधी जी ने चालीस वर्ष की वय में १९०९ में लिखे और कुछ लोगों की इस कल्पना के बावजूद कि शायद वे इसमें कुछ संशोधन करना चाहेंगे, वे अंत तक इन विचारों पर क़ायम रहे। इन्ही विचारों के आधार पर अपना पूरा जीवन जिया और उसकी शिक्षा भी देते रहे। एक-आध अपवाद को छोड़ दें तो इस देश में और बाहर के देशों में भी, गाँधी जी के विचार और उन पर आधारित उनका जीवन सभी को, गहरे तौर पर प्रभावित करता रहा है। पूरा देश उन्हे बापू यूँ ही तो नहीं कहने लगा था।

तो फिर हमारा देश, हमारा समाज गाँधी जी के इन विचारों को नज़र-अन्दाज़ करके ऐसा क्यों बन गया जैसा कि यह अब है? नेहरू जी लोकप्रियता में गाँधी जी के कहीं अगल-बगल भी नहीं ठहरते होंगे, तो फिर कैसे वे 'हमारे भारत' को 'अपने सपनों के भारत' में ढालते चले गए? गाँधी जी पर इतनी श्रद्धा के बावजूद आज उनके विचार का कोई पुछवैया कहीं क्यों नहीं दिखता? अगर गाँधी जी इतना अच्छा-अच्छा सोचने और उस सोच का जीवंत उदाहरण बनने के बावजूद इस दुनिया को नहीं बदल पाए, तो फिर कैसे बदलती है दुनिया?


11 टिप्‍पणियां:

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

"गाँधी जी पर इतनी श्रद्धा के बावजूद आज उनके विचार का कोई पुछवैया कहीं क्यों नहीं दिखता? अगर गाँधी जी इतना अच्छा-अच्छा सोचने और उस सोच का जीवंत उदाहरण बनने के बावजूद इस दुनिया को नहीं बदल पाए, तो फिर कैसे बदलती है दुनिया?"

शायद लोगों के मन में दिखावे की श्रद्धा है. दिखावे की श्रद्धा भगवान् के प्रति भी देखी जा सकती है. दुनिया को बदलने के लिए विचार नहीं बने, लेकिन मनुष्य को बदलने के लिए विचार पूरी दुनिया में हैं. हम अगर ख़ुद के अन्दर बदलाव लाएंगे, तभी दुनिया बदल सकती है. लेकिन ख़ुद के अन्दर बदलाव लाने की प्रक्रिया शायद इस बात से शुरू होती है कि; हम माने कि हमारे अन्दर बदलाव की जरूरत है. और ये बात स्वीकार करने में दिखावे की श्रद्धा रखने वाला मनुष्य तैयार नहीं होगा.

जब अदना सा मनुष्य ख़ुद को नही बदल सकता, तो इतनी बड़ी दुनिया को क्या बदलेगा.

Gyandutt Pandey ने कहा…

"तो फिर हमारा देश, हमारा समाज गाँधी जी के इन विचारों को नज़र-अन्दाज़ करके ऐसा क्यों बन गया जैसा कि यह अब है?"

परेशान मत होइये. और विचार हैं वे 10-20-50 तक खल्लास हो जायेगे पर गांधीजी हजारों साल प्रासंगिक रहेंगे. वही शायद मार्क्स के साथ भी हो - पर मैं पक्का नहीं हूं.

Pramod Singh ने कहा…

ओह, फिर? कैसे बदलेगी दुनिया! या नहीं बदलेगी? हम (माने मैं) क्‍या करें!

चंद्रभूषण ने कहा…

हिंद स्वराज पढ़ने में अच्छी लगती है लेकिन जिस तरह इसमें गांधी भारतीय और पश्चिमी सभ्यता की तुलना करते हैं उसका कोई सिर-पैर मेरी समझ में नहीं आता। क्या शरीर के सुख के लिए काम करना अकेले आधुनिक पश्चिमी सभ्यता की पहचान है? क्या एक हजार साल से भी ज्यादा समय तक दुनिया भर में भारतीय समाज को ही भोग-विलास का मानदंड और आत्मिक पतन की पराकाष्ठा नहीं समझा जाता रहा? जिस सभ्यता में भगवान को पूरी तरह राजा के साथ आइडेंटिफाई किया जाता रहा हो- राजा जैसी पोशाक पहने भगवान राजा की ही तरह अपनी जैजैकार कराते हों और अपने पूजा स्थलों में निचले तबके के लोगों को घुसने तक न देते हों, उनके छूने भर से अपवित्र हो जाते हों- वहां आत्मा के सुख वाली बात किसी समय सचमुच फलती-फूलती रही होगी, इसमें मुझे बहुत संदेह है। एक टेक्नोलॉजी को छोड़कर मुझे उन दोनों सभ्यताओं के बीच कोई फर्क नहीं समझ में आता, जिनके बीच बहस को हिंद स्वराज की कथावस्तु बनाया गया है। नेहरू ने इस किताब पर गांधी से बहस करते हुए सिर्फ एक सवाल उठाया था कि हिंद स्वराज से आपका तात्पर्य क्या ऐसे ग्राम स्वराजों के समुच्चय से है, जो जमींदारी प्रथा, जाति प्रथा, पिछड़ी तकनीक वाले पारंपरिक पेशों, महामारियों और छूत की बीमारियों में जकड़े हुए हों?

गौरतलब है कि गांधी ने इनमें से किसी भी चीज का व्यवहार में तो क्या सिद्धांत में भी कभी निषेध नहीं किया। वे अछूत प्रथा के विरुद्ध थे लेकिन जातिगत पेशों और जातीय उच्चता क्रम से उनका कोई विरोध नहीं था। जमींदारी के प्रति गांधी के नरम रुख के चलते 1936 के कांग्रेस अधिवेशन में काश्तकारों को मौरूसी हक दिए जाने का प्रस्ताव पारित होने के बाद देश के ज्यादातर मुस्लिम जमींदार मुस्लिम लीगी हो गए लेकिन इसके समानांतर सारे हिंदू जमींदार गांधी के शरणागत हुए और हिंदू महासभा के साथ-साथ कांग्रेस की भी दोहरी सदस्यता ग्रहण की। मेरे ख्याल से 1909 में जिस हिंद स्वराज की धारणा गांधी पेश करते हैं उसके आधार पर गठित भारतीय समाज एक भयावह समाज होता- कमोबेश पाकिस्तान के सिंध प्रांत जैसा, जहां आज भी आपको लाख-सवा लाख एकड़ के जमींदार मिलते हैं और वाजिब मजदूरी मांगने वाले खेत मजदूरों को पांवों में जंजीरें डालकर हवेलियों के अंधेरे बंद कमरों में कैद रखा जाता है। यूरोप और अमेरिका की नकल करते हुए आज हम जिस हालत में पहुंच गए हैं उससे असंतुष्ट होना स्वाभाविक है लेकिन इसकी काट अगर किसी रूमानी 'भारतीय सभ्यता' में खोजी जाती है तो उसे भी वैसी ही सख्त आलोचना की धार पर परखा जाना चाहिए, जिसपर हम अपनी मौजूदा सभ्यता को परख रहे हैं।

अभय तिवारी ने कहा…

चन्दू भाई..राजा को ईश्वर तुल्य मानने की परम्परा तो आप को हर कहीं मिल जायेगी.. और जिस सभ्यता के गुणों का विवरण गाँधीजी दे रहे हैं वे पुराने और नए का भेद है। क्योंकि इस संघर्ष में तो वे हिन्दू धर्म और इस्लाम को एक साथ ही रख रहे हैं औद्योगिक समाज के। नए में सिर्फ़ अच्छा अच्छा होगा और पुराने में बुरा ही बुरा, न ये सच है और न इसका उलटा। गाँधी जी का विरोध करते हुए हम उन गुणों का अनदेखा कर दें जो उनकी द्वारा समर्थित सभ्यता में हैं क्योंकि वे अछूतों के खिलाफ़ जम कर नहीं बोले या कोई दूसरा मसला, यह ठीक नहीं लगता मुझे।

यहाँ पर मैंने जो बाते उद्धरित की हैं उसमें से किस का विरोध करते हैं आप? मशीनगन, कारखानों का शोषण और प्रदूषण, लोभ और लालच के धोखे से कराई जाने वाली गुलामी.. किस के पक्ष में हैं आप?

सवाल यहाँ गाँधी जी और उनकी सोच नहीं है। सवाल यह है कि आप कितना भी अच्छा-अच्छा सोच लें। उस से दुनिया की गति को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। दुनिया बदलने की एक गति में अगर आप लिपट गए तो आप के विचार चढ़ जाएंगे.. वरना आप कहीं लुढ़कते घिसटते पाए जाएंगे। इस दॄष्टि से गाँधीजी को कितना ये गीत अर्पित किया जा सकता है.. दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल.. इस पर भी सोचना चाहिये।

अभय तिवारी ने कहा…

ऊपर की प्रतिक्रिया में तीसरी लाइन में ..औद्योगिक समाज के..के स्थान पर.. औद्योगिक समाज के खिलाफ़ पढ़ें..

ashutosh ने कहा…

achchh sochne se duniya nahi badaltee.wah apnee hee gati aur tark se badaltee hai.insaan itihaas ka khilauna bhar hai.mane manushya hone ya kuchh bhee hone ka koyee arth nahi hai. YAH GHOR AITIHAASIK NIYATIWAAD HAI. ACHCHHA SOCHNE SE DUNIYA NAHI BADALTEE. WAH BADALTEE HAI ACHCHHE AUR BURE KE BEECH VIVEK KARNE KA TARK AUR US TARK KE PRAMAN KHOJANE SE. Adhunik sabhyata me hazaron buraiyan hongee. par usme ek hee achchhayee hai ki wo samajhatee hai ki insaan kee koshishon se bhee duniya badaltee hai, use badalnaa chahiye aur ye ki wo bina badle nahi rah saktee.is badalne me sahi-galat hota rah saktaa hai, lekin aage aur badlaw ka rastaa bhee khula rahtaa hai. gandheeji khud bhee duniya ko badalna chahte the. lekin bhavishya ka koyee nayaa nakshaa ya sapnaa shayad unke paas nahi tha.puraanee sabhyataa kee ek romantic tasweer hee unke paas thee. isliye sraddhaa to unhone bahut kamaayee, lekin aise logo kee jamaat nahi jutaa paye jo unke sapne[?] ko saakaar karne ke liye jaan kee baazee lagaa den.marx ne kam se kam bhavishya ka ek aisaa sapnaa diyaa thaa jiske liyee lakho apnee jaan par khel gaye aur aage bhee khelte rahenge. sirf achchha sochne se kuchh nahi hoha.achchhe ko har baar naye sire se khojane kee jahmat uthanee padegee.aur uske liye jaan kee baazee lagaanee hogee. AUR YE JAAN KEE BAAZEE LAGAANE WALEE BAAT HAM BHAGAT SINGH KE SAATH KHUD GANDHIJI SE BHEE SEEKH SAKTE HAIN.

Isht Deo Sankrityaayan ने कहा…

अभय भाई! चंदू जी की परवाह न करें. बस एक काम करें, गांधीजी को खुले मन से पढ़ें और आगे पढते जाएँ. संभव हो तो इन्हें पढते समय दिमाग हमेशा साथ रखिएगा. हालांकि गांधीजी को पढते समय और उसके बाद भी सबसे ज्यादा कष्ट दिमाग ही देता है. बहरहाल एक सलाह है, गांधीजी के बाद यशपाल की दो किताबें पढ़ लीजिएगा. एक - गांधीवाद की शव परिक्षा और दूसरी सिंहावलोकन. फिर आपको ठीक-ठीक मालूम हो जाएगा कि उन्हें राष्ट्रपिता क्यों कहा जाता है. हालांकि मैं समझाता हूँ कि आप ये किताबें पढ़ चुके होंगे. फिर भी आप ऐसे प्रभावित हो राहे हैं? हैरत है.

चंद्रभूषण ने कहा…

प्यारे भाई अभय, गांधी जी के तीनों पश्चिमी गुरुओं में से थोरो और इमर्सन को मैंने नहीं पढ़ा। तॉल्स्तॉय के तीन-चार उपन्यास, दस-पंद्रह कहानियां और पांच-सात निबंध पढ़े होंगे। पश्चिम की शैतानी औद्योगिक सभ्यता की आलोचना के मामले में तॉल्स्तॉय के मूल तर्क गांधी वाले हैं- या बेहतर होगा कि इसका उलट समझा जाए। अगर आपको कहीं तॉल्स्तॉय के सभ्यता विमर्श पर कोई वस्तुपरक विश्लेषण मिले तो मुझे बताएं। हिंद स्वराज का सम्मोहन सन् 1993 में उसे पढ़ने के बाद मुझपर भी उतना ही था जितना आज आप पर है लेकिन तब मेरी उम्र कच्ची थी और आज आपकी पक्की है। अगर अब भी आपने उकसाना जारी रखा तो शायद मुझे फिर से पढ़ना पड़े- किताब घर पे रक्खी है..

Isht Deo Sankrityaayan ने कहा…

चंदू भाई ! छोडे भी. आप किस बकवास में फंस रहे हैं. कोई जरूरी है कि एक मित्र टाइम बरबाद कर रहा हो तो सारे लोग बरबाद करने लगें. लगता है पोलित ब्यूरो की तरह अभय को भी कांग्रेसियों ने कुछ खिला-पिला दिया है.

अभय तिवारी ने कहा…

आशुतोष जी.. आप की जान की बाज़ी वाली बात सही है..
इष्टदेवजी.. आप की द्वारा सुझाई दोनों किताबों को मैंने नहीं पढ़ा है.. दिमाग साथ रखने की आप की सलाह को ध्यान में रखूँगा..
चन्दू भाई.. २००९ में इस किताब की सौ साल पूरे होने पर किताब की व्यापक समीक्षा और उस बहाने अपने इस समाज का गहरे विश्लेषण का विचार बढ़िया है.. आप भी लगे हाथ किताब पढ़ ही डालें.. ताल्स्ताय और तेक्नोब्रैट्स के बारे में मैं पता करता हूँ..
दुबारा इष्ट्देव जी..मेरा तो ख्याल है आप भी इस बकवास में फँस जाय.. दिमाग साथ में रखना मत भूलियेगा.. गाँधी के बारे में बात करके टाइम बरबाद होगा.. ऐसा क्यों सोचते हैं? अभी बहुत समय तक इस देश में वह एक सन्दर्भ बने रहेंगे..कोई अपने पिता को लाख नफ़रत करे.. पर बिना उसे समझे-सुल्झाए अपने जीवन को सुधार नहीं सकता.. गाँधी हमारी पुरानी सभ्यता के सशक्त प्रतिनिधि हैं .. सही ही वे बापू हैं.. उन्हे नकार के आप अपना समय सार्थक करेंगे.. इस पर मुझे शक है..

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