मंगलवार, 21 अगस्त 2007

विजेताओं की हिंसा का बर्बर इतिहास

इतिहासकार अखिलेश मितल अपने कॉलम में लिखते हैं कि अंग्रेज़ी शब्द बारबेरियन को नए सिरे से परिभाषित करने की ज़रूरत है। शब्दकोष में इसका अर्थ असभ्य, जंगली और बदतमीज़ है और अपनी परिभाषा से ये सिर्फ़ गैर-रोमन, गैर-ग्रीक, गैर-ईसाई आदि पर लागू होता हैं। कुछ प्रसिद्ध या कुख्यात बारबेरियन के नाम होंगे-- पहली सदी में हुआ अटिला नामक हूण हमलावर, तेरहवीं सदी का मंगोल चंगेज़ खान, चौदहवीं सदी का तैमूर लंग। तीनों गैर-यूरोपीय, एशियाई।

तेज़ी से एकरस होती दुनिया में बारबेरियन के अर्थ में वे सभी लोग आ जाने चाहिये जो हिंसा का अतिरेक करते हैं। उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में, यूरोपीय हमलावरों द्वारा वहाँ के मूल निवासी या अबॉर्जिनी लोगों का जो संहार किया गया, वह। दूसरे विश्वयुद्ध में ज्यू और जिप्सी लोगों का हिटलर ने जो क़त्लेआम किया, वह। १८५७/५८ में ब्रिटिश सेना ने लाखों भारतीयों को जो मौत के घाट उतारा, वह। (मेरे इतिहासकार मित्र अमरेश मिश्रा बताते हैं कि मारे गए लोगों की संख्या एक करोड़ के करीब थी। और १८५७/५८ के बाद के रिकॉर्ड्स से पता चलता है कि अंग्रेज़ों को काम करने के लिए मज़दूर नहीं मिलते थे। बड़ी तादाद में जवान आबादी का सफ़ाया हो गया था। बचने वालों में ज़्यादातर औरतें, बच्चे और बूढ़े थे।) और अमरीका द्वारा जापान पर परमाणु बम हमले से लाखों लोगों की हत्या, वह। इन सब घटनाओं को भी बारबेरियन व्यवहार क्यों नहीं माना जाना चाहिये? क्या इसलिये कि वे गैर-रोमन, गैर-ग्रीक, गैर-ईसाई और गैर-यूरोपी हिंसा के उदाहरण नहीं हैं?

अटिला, चंगेज़, और तैमूर के पहले एक और व्यक्ति विश्वविजय पर निकला था। मैसेडोनिया का सुन्दर राजकुमार सिकन्दर महान। सिकन्दर और उसकी सेना द्वारा की गई किसी हिंसक अतिरेक की चर्चा क्यों नहीं होती? क्या इसलिए कि जिनका लिखा इतिहास हम पढ़्ते रहे हैं, उनके लिए सिकन्दर उनका गौरव है, उनका आदर्श-पुरुष है? ईरान, समरकन्द और भारत के उसके विजय-अभियान की राह में जिन राज्यों ने घुटने टेक दिये, वे दास, मवेशी और सोना आदि देकर मुक्त हो गए। लेकिन जिन्होने प्रतिरोध करने की जुर्रत की, वे रौंद दिए गए। ईरान में पर्सपोलिस और मध्य एशिया में समरकन्द को यह नुकसान उठाना पड़ा। शहर को जलाकर खाक किया गया और शहरियों को गुलाम बना दिया गया।ये क्यों मान लिया जाय कि ये हिंसा अटिला, चंगेज़ और तैमूर द्वारा की गई हिंसा के मुकाबले सभ्य रही होगी?

पुरु ही एक अकेला शासक था जिसे प्रतिरोध के बावजूद बख्श दिया गया। सिकन्दर के व्यवहार में इस अपवाद के कारण कुछ इतिहासकारों का मानना है कि लड़ाई में सिकन्दर की जीत नहीं हुई बल्कि मामला बराबरी पर छूटा तभी उसे संधि करनी पड़ी। बाकी की कहानी तो कहती ही है कि सिकन्दर ने पुरु के साथ वैसा व्यवहार किया जैसा कि एक राजा को दूसरे राजा के साथ करना चाहिये। मगर हमने तो पढ़ा है कि पुरु हार गया था और उसे बाँध कर सिकन्दर के सामने लाया गया। और ये तो सिकन्दर की उदारता और बड़प्पन था कि उसने पुरु का राज्य वापस दे दिया। सवाल है कि अगर सिकन्दर का हृदय ऐसा ही उदार था तो वह विश्व विजय पर निकला ही क्यों? व्यर्थ की हिंसा और हाय-हत्या में पड़ा ही क्यों?

कहानी में कुछ तो लोचा है। आखिर ये कहानी विजेताओं ने लिखी है। विजेताओं का इतिहास में विजेता सर्वगुणसम्पन्न होता है, और विरोधी निपट मूर्ख, खल, दुष्ट.. राक्षस। देखिये हमारे राजा राम और कृष्ण सर्वगुणसम्पन्न हैं। वे इतने सही हैं कि वे भगवान हैं। जबकि उनके विरोधी नीच अधम और पापी, धरती का बोझ हैं। (श्रद्धालु भाई/बहन मुझे माफ़ करें, मैं भी भगवान राम के भजन सुनकर आनन्दित होता हूँ, मगर ये भी तो एक पहलू है।)

दूसरी तरफ़ चंगेज़ और तैमूर जिन्हे हम खलनायक मानते हैं। किन्ही इतिहासों में वे नायक हैं। पाकिस्तान के इतिहास में गज़नी और गोरी महानायक हैं। हमारे यहाँ वे सारे पाप की जड़। हम तो पराजित हारे हुए लोग थे। विजेताओं के लिखे इतिहास को पढ़ते रहे, सच मान कर चलते रहे। पर लिखे हुए इतिहास से भी अलग एक जातीय स्मृति होती है। वह किसी भी इतिहास को नकार व्यक्ति के मानस पर काबिज़ रहती है। जैसे ही हमें अपनी गुलामी के जुए से मुक्ति मिली। हमने अपनी पराजयों का बदला लेना शुरु कर दिया। उनसे जो हमारी लगातार 'पराजय के जीते जागते सबूत' थे। और उनसे जो हमारी 'पराजय के स्थापत्य में सबूत' थे। उन्हे दबाने के लिए, गिराने के लिए अब हम लिख रहे हैं एक 'अपना इतिहास', एक 'नया इतिहास'। वह इतिहास जो हम लिखना चाहते थे मगर हज़ार साल तक लिख नहीं सके। क्योंकि हम पराजित लोग थे और अब हम पराजित लोगों की आत्मग्लानि में डूबे लोग हैं।

पराजित लोगों की इस आत्मग्लानि के हालिया दर्शन मैंने एक हाल में देखी एक पुरानी फ़िल्म में किए जरमनी ईयर ज़ीरो। दूसरे विश्व युद्ध के बाद के जरमनी की तस्वीर। अगर आप डी वी डी लायब्रेरी में या नेट पर दूसरे विश्व युद्ध से सम्बन्धित फ़िल्मों की खोज करें तो आप को सैकड़ों ऐसी फ़िल्में मिलेंगी जिसमें जरमनों द्वारा यहूदियों पर अत्याचार की कहानियाँ सुनाई-दिखाई गई हैं। मगर जरमनी के लोगों ने युद्ध के बाद क्या विनाश और कठिन समय देखा, इस पर मुश्किल से ही कोई फ़िल्म मिले। मैंने खुद ऐसी यह पहली फ़िल्म देखी है। जबकि कन्सनट्रेशन कैम्प्स के बारे में बीसियों देख चुका है, और अब उनको देखने से ऊब भी गया हूँ। दुनिया की आबादी में दाल में नमक के बराबर यहूदी हैं, पर अपनी अत्याचार की कहानी का डंका उन्होने पूरे संसार में पीट रखा है। ईरान के राष्ट्रपति अहमदीनेज़ाद तो इतना तंग आ गए कि उन्होने कहना शुरु कर दिया कि ये होलोकास्ट-फोलोकास्ट सब झूठ है, ऐसा कुछ हुआ ही नहीं। सब बनाई हुई कहानियाँ हैं। (ये तो कुछ ज़्यादा हो गया प्रेसीडेन्ट साब!)

मगर मेरा कहना है कि यहूदी ये सब कर सके, क्योंकि वे विजेता हैं। क्योंकि अमरीका को नियंत्रित करने वाला पूँजीपति वर्ग का बड़ा हिस्सा यहूदी धर्म से ताल्लुक रखता है। और इसीलिए अमरीका अरब-इस्राइल विवाद में इस्राइल का लगातार पक्ष लिए जाता है। अमरीका दुनिया का सबसे 'सभ्य' देश है इसलिए उनके द्वारा लिखे जा रहे इतिहास में अतिरेक नहीं होगा, और इराक, अफ़ग़ानिस्तान और अन्य जगहों पर अमरीकी सेनाएं जो सेवाकार्य कर रही हैं, उसके आतंक इतिहास में पारदर्शिता के साथ दर्ज होंगे, यह सोचना बचकाना होगा।


अगर विजेताओं का इतिहास सच नहीं है? और पराजितों का आरोपित इतिहास भी सच नहीं? तो सच क्या है? सच क्या है, यह इतनी आसानी से बताया नहीं जा सकता। यह इतना सीधा सवाल नहीं है, जितना नज़र आता है।

4 टिप्‍पणियां:

संजय तिवारी ने कहा…

विजेता इतिहास लिखता है और हम उसे ही सत्य मान लेते हैं. अमरीका के संदर्भ में "सभ्य" शब्द का का प्रयोग सारी कहानी कह देता है. इराक में, अफगानिस्तान में सब जगह आक्रमणकारी ही इतिहास लिख रहे हैं और उसकी सत्यापित प्रति फोटोकापी करवाकर पूरी दुनिया में बांट रहे हैं.
आपने बहुत अच्छा विषय लिया है. इस कड़ी में थोड़ा कुछ और लिखा जाएगा तो ई-मीडिया को फायदा होगा.

Shastri JC Philip ने कहा…

आज हिन्दुस्तान में जो इतिहास, भूगौल, सामाजिक दृष्टिकोण पढाया जा रहा है इस में से अधिकतर हमारे देश के लुटेरे फिरंगियों ने लिखा था. इसके द्वारा उन्होंने अपने आप को महान एवं अन्य लोगों को निम्न श्रेणी का दर्शाया है.

जैसा कि संजय ने कहा है "इस कड़ी में थोड़ा कुछ और लिखा जाएगा तो ई-मीडिया को फायदा होगा."

-- शास्त्री जे सी फिलिप

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info

Gyandutt Pandey ने कहा…

इस पोस्ट से पहले मैने यह पढ़ी और उसपर टिप्पणी की. क्या सन्योग है कि सच और झूठ का मसला दोनो में है. और सच या झूठ निरपेक्ष नहीं लग रहे.

अजित वडनेरकर ने कहा…

सीधे सवालों के सीधे जवाब कई बार इतिहास भी नहीं देता. बढ़िया है.

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