रविवार, 19 अगस्त 2007

रहने के प्रसंग में कहीं एक घर था

कविता क्या है?.. इस पर लोग लगातार बतियाते ही रहे हैं.. कला मूलतः जीवन की पुनर्रचना है.. जीवन को देख समझ कर उसके बारे में जो राय बनती है वह कला/कविता में झलकती है.. फिर कविता को देख समझ कर जो राय बनती है.. वह आलोचना में झलकती है.. एक तरह से वह जीवन की पुनर्रचना की पुनर्रचना है..

पिछले दिनों मोहल्ले पर छपी एक कविता को लेकर 'कविता क्या है' पर खूब ज़ोर-आज़माईश हुई.. मेरी एक दो कौड़ी की टिप्पणी और उस पर प्रियंकर भाई के बचाव से अविनाश मियाँ दुखी भी हुए..बात आई-गई हुई.. कुछ रोज़ पहले प्रमोदजी ने अपने टाँड़ पर दफ़नाई हुई कुछ पुस्तकों को दुबारा जीवन दिया.. उसमें से एक को मुझे भी पढ़ने की रुचि हुई..अशोक वाजपेयी की कवि कह गया है.. घर ले आ कर पलटा तो उसमें कुछ कवियों पर दिलचस्प विश्लेषण पढ़ने को मिला.. मेरे प्रिय लेखक और कवि विनोद कुमार शुक्ल के बारे में कुछ बेहद हसीन बातें वाजपेयी जी ने लिखी हैं.. जो 'कविता क्या है' पर भी एक राय बनाने में मदद करती हैं.. देखें..

एक बेहद सामान्य स्थिति के बखान को विनोद कुमार शुक्ल बहुत शांति और बिना किसी नाटकीयता के ऐसा मोड़ दे देते हैं कि कुछ अप्रत्याशित सामने आ जाता है, पर वह फिर सामान्य की ओर चले जाते हैं। सामान्य और असामान्य के बीच एक द्वंदात्मक सम्बन्ध उनके यहाँ बराबर मिलता है, लेकिन कभी भी फ़ैंटेसी और यथार्थ के बीच एक महीन अंतर से अधिक कुछ नहीं होता। दिलचस्प यह है कि फ़ैंटेसी किसी तरह के इच्छित विश्वास या क्षतिपूर्ति की इच्छा का संस्करण नहीं बनती। विनोद कुमार शुक्ल फ़ैंटेसी औए सामान्य के ऐसे तीव्रीकरण को कि वह असामान्य लगेकभी चौंकाने के लिए इस्तेमाल नहीं करते। उनका काव्यशास्त्र चौंकाने का है ही नहीं: वह विचलित करने का है, हमारे समय की ऐसी सचाई दिखाने समझने का है, जो अन्यथा अदृश्य रहती है और जिसे कविता में देखना कहीं गहरे विचलित होना है।

कविता का काम जहाँ चीज़ों के बीच नए सम्बन्ध खोजना है, वहाँ चीज़ों को उनकी स्वतंत्र सत्ता में देखना भी है। अगर विनोद कुमार शुक्ल को 'गरीब का लड़का प्रतीकों के बाबा-सूट में कहीं जाने को तैयार दिखाई पड़ता है तो यह एक और प्रमाण उनके उस आग्रह का है जिसमें वह एक चीज़ को ठीक उसी चीज़ के रूप में निषेध करते हैं। चीज़ों और उनके सम्बन्धों के प्रति यह सम्मान ही उन्हे गरीब लड़के को गरीबी का उदाहरण मानने की आसान प्रवृत्ति से मुक्त रखता है। हिन्दी में हर चीज़ को किसी दूसरी चीज़ का प्रतीक मानने की इतनी भयानक रूढ़ि है कि चीज़ों और उनकी स्वतंत्रता के प्रति आदर और संवेदनशीलता का यह पुनर्वास मूल्यवान और कुछ मायनों में ऐतिहासिक है।

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विनोद कुमार शुक्ल की कविता एक ठोस, जाना पहचाना लेकिन अप्रत्याशित और विचलित करने वाला संसार हमारे लिए खोजती-रचती चलती है जो प्रामाणिकता और व्यापकता रखते हुए भी उनका है, अद्वितीय है और उदाहरण होने से बचा हुआ है। वह निश्चय ही हमारा भी है लेकिन अपनी पूरी सघनता, निर्ममता, वस्तुपरकता और ऐंद्रिकता के साथ एक संसार है, इस-उसका उदाहरण नहीं।

यहाँ पढ़िये 'अतिरिक्त नहीं' में संकलित एक कविता--



रहने के प्रसंग में कहीं एक घर था

रहने के प्रसंग में कहीं एक घर था

उसी तरह प्यास के प्रसंग में उसमें

एक छोटे घडे़ में पानी भरा था

बहुत दिन से बचा था के कारण

घड़ा पुराना हो चुका था

पता नहीं क्या था के कारण

कुछ था जो याद नहीं आ रहा था

जो याद आ रहा था वह इतना था

कि उसके प्रसंग भी बहुत थे

आसपास था, दूर था

बीते हुए रात दिन का समय हो चुका था

बीतने वाले रात दिन का समय था

सब तरफ़ जीवन था

संसार के प्रसंग में घड़ा छोटा था

कोई किसी के घर पानी पीने आ सकता है

इसलिए छोटे घड़े के बदले

बड़े घड़े होने का एक प्रसंग था।


'अतिरिक्त नहीं ': वाणी प्रकाशन द्वारा २००० में प्रकाशित; मूल्य १२५/-

अशोक वाजपेयी की पुस्तक 'कवि कह गया है' का प्रकाशन भारतीय ज्ञानपीठ ने किया है; मूल्य ५५/-


11 टिप्‍पणियां:

Pramod Singh ने कहा…

ओह.. ठुमक-दहक-महक की कैसी करुणामयी निराली चाल का कवि.. कितना तो कहता जाता है..

बोधिसत्व ने कहा…

कविता क्या है यह कभी भी न खतम होनेवाली बात है। जिसमें मन रमे वही करिए। क्योंकि निर्मल आनन्द में ही जीवन है।

अजित वडनेरकर ने कहा…

बोधिभाई ने सही कहा....कभी न खत्म होने वाली बात.....सुकुलजी की अच्छी कविता पढवाने के लिए शुक्रिया....

अविनाश ने कहा…

आपके मानक के हिसाब से इसमें न लय है न छंद, ये कविता कैसे हुई? हिंदी मंगू-चंदू की कविता को हम भले कविता कह दें, आप क्‍यूं कहेंगे? इसी जगत में अपने कहे पर ग़ौर करें।

अविनाश ने कहा…

आपके बनाये मानक के हिसाब से तो ये भी कविता न हुई? हिंदी में मंगू-चंदू के लिखे को हम भले कविता कह दें, आप क्‍यूं कह रहे हैं? अपने पुराने बयान का तो थोड़ा खयाल कीजिए, भाई!

अभय तिवारी ने कहा…

प्रिय अविनाश,
मेरा पुराना बयान जिसे आप बार बार याद दिला रहे हैं.. वो आप की एक 'कविता' पर किया गया था.. उसे आप की पोस्ट से कॉपी कर के यहाँ पेस्ट कर रहा हूँ..

अभय तिवारी said...

ठीक है.. मगर इसे कविता मत कहो अविनाश.. कविता के दायरे अनुभूतियों और संवेदनाओं के लिए सुरक्षित रहने दो.. संगीत तो पहले ही गया कविता से .. अब बकिया भी बुहार दोगे तो बचेगा क्या.. (अब ये मत कहना कि श्रोत्रिय की कविता में संगीत है)..
ये गद्य है.. इसे गद्य की तरह लिखो.. तोड़ तोड़ कर नहीं.. तो क्या फ़रक पड़ेगा.. ? और अगर कविता हुई तो तब भी पहचानी जाएगी..

मैं ऊपर के बयान में मूल तौर पर अनुभूति और संवेदना की बात कर रहा हूँ.. आप लय और छंद का हवाला दे रहे हैं.. क्योंकि मैं कविता से संगीत की विदाई का दुख व्यक्त कर रहा हूँ.. विनोद जी की यह कविता छंद में भले न हो.. पर कुछ लय तो छिपी है इसमें..

मुझे छंदबद्ध कविताएँ पसन्द हैं.. जैसे आप के द्वारा छापी गई गान्हीजी पर मैं बाग बाग हो गया था.. पर इसका अर्थ यह न निकालें कि मैं संगीत, छंद और लय के आधार पा कविता को पसन्द या नापसन्द करता हूँ.. नहीं तो लोहे का स्वाद क्यों पसन्द करूँगा.. मेरा आग्रह कविता की मूल अन्तर्वस्तु अनुभूति और संवेदना पर है.. और अशोक जी की बात तो है ही..

उम्मीद है मैं अपनी बात सफ़ाई से रख पाया हूँ..

अविनाश ने कहा…

माफ़ कीजिएगा, आपलोग कविता में कला और कारीगरी के पुजारी हैं बंधुगण! संवेदना और अनुभूति इस पूजा से कोसों दूर है!

बोधिसत्व ने कहा…

अविनाश जी
बिना कला और कारीगरी के यानी सिर्फ संवेदना और अनुभूति से कोई कविता नहीं लिखी जा सकती। अगर आप कला और कारीगरी से रहित किसी कविता का हवाला दें अविनाश जी तो बात समझी जा सकती है।
कलावादी होना एक बात है तो कला विरोधी होना भी वैसी ही बात होगी। मैं नहीं समझता कि बिना रूप के अंतर्वस्तु और बिना अंतर्वस्तु के रूप कहीं भी और कहीं भी ठहर सकता है। मैं उद्धरणों में बहुत यकीन नहीं करता लेकिन डॉ. राम विलास शर्मा जी का एक कथन दोहराना चाहूँगा-कोई कवि केवल विचारबोध के सहारे कविता नहीं कर सकता राजनीतिक कार्यकर्ता भी केवल विचारधारा के सहारे संघर्ष में देर तक नहीं टिका तह सकता। टिके रहने के लिए भावशक्ति चाहिए। कविता लिखने के लिए विचारबोध के साथ ही भावबोध भी चाहिए।
अविनाश जी कुछ लोग इस भावबोध को भी कला बाद से जोड़ दोते हैं।
कुछ लोगों का यह तक मानना है कि कविता लिखने से अधिक विलासी और कलावादी उद्यम कोई और हो ही नहीं सकता। चाहे तो कविता का दायरा साहित्य तक फैला सकते हैं।

Mired Mirage ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता है । पढ़वाने के लिए धन्यवाद ।
घुघूती बासूती

Udan Tashtari ने कहा…

रहने के प्रसंग में कहीं एक घर था.....

--बहुत अच्छा लगा इस कविता को पढ़कर. इसी संग्रह से कुछ और भी कभी प्रस्तुत करें. अच्छा लगेगा.

प्रियंकर ने कहा…

अभय और अविनाश -- कविता के दो आस्वादक -- बोध के दो अलग-अलग छोर थामे हुए हैं . भाई बोधिसत्व बीच में खड़े होकर दोनों का एक-एक हाथ थामें और कविता की कड़ी पूरी करें . कविता के दिन वैसे ही अच्छे नहीं चल रहे हैं . जनता में बड़े 'कन्फ़्यूज़' करने वाले संकेत जा रहे हैं .

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