शनिवार, 25 अगस्त 2007

चकदे..

कई मित्रों की अभिभूत प्रतिक्रियाओं के बाद कल रात मैंने चकदे इंडिया देख ही ली.. सबसे पहले तो अजित भाई से एक गुजारिश.. पता कर सकें तो बताएं कि ये क्या है 'चक'..कहाँ से आ रहा है? सुना बहुत है-- ओय फट्टे चकदाँगे!! ओय चकदे फट्टे!! क्या होता है इसका सही अर्थ? फाड़ दो..फेंक दे..तोड़ दो.. मोड़ दो.. क्या?

ऐसे ही कई दूसरे पंजाबी शब्दों के आगे मैं बिलकुल लाचार हो जाता हूँ। जैसे एक और शब्द, जिसका इस्तेमाल मैंने एक गाने में सुना..'मुटियार'। मैंने अपने कई पंजाबी मित्रों से पता करने की कोशिश की। पर नाकाम रहा। फिर मेरे टीवी/फ़िल्मी गुरु लेख टण्डन ने बताया कि इसका अर्थ जवान होती लड़की/किशोरी होता है। लेख जी से मेरी बोलचाल बन्द है, उन्होने मुझसे चार एपीसोड लिखा के एक के पैसे दिलवाए। और फिर उलटा मुझी पर चढ़ गए कि तूने मेरा नाम खराब किया। मेरे मन का वही हाल हुआ जो सब्ज़ियों का गरम तवे पर पावभाजी की शक्ल लेते हुआ होता होगा। कुछ दिन मैं वह श्रद्धा-क्रोध, गर्व-ग्लानि, लज्जा-आक्रोश से क्षुब्ध भावीय-पावभाजी भकोसता रहा; फिर हाजमा खराब होने के डर से मैने उनसे बात न ही करने का फ़ैसला किया। उनसे मैं पूछने से रहा। आप में से किसी को पता हो तो ज़रूर बताएं।

चकदे पैसा-वसूल फ़िल्म है। कथानक ज़बर्दस्ती के ड्रामों में नहीं फँसता? कोई हीरो-हीरोइन नहीं, कोई रोमान्स, कोई गाने नहीं। फ़िल्म का हीरो भी कबीर खान नहीं, फ़िल्म की हीरो हैं वे लड़कियाँ जो खेल रही हैं एक मर्दवादी समाज में हॉकी। फ़िल्म में शाहरुख को सूत्र बनाकर फ़िल्म को उन्ही के गिर्द बुना गया है। पर फिर भी आप उन्हे याद नहीं रखते। आप याद रखते हैं बलबीर को, कोमल चौटाला को, और बिन्दिया नाइक को। कबीर खान को एक धर्म-निरपेक्ष देश के मुसलमान खिलाड़ी के तौर पर जो जिल्लत उठानी पड़ती है, वो आप को बुरी ज़रूर लगती है, मगर आप को आनन्द तब आता है जब पूरी टीम दिल्ली के ईवटीज़र्स की पिटाई करती है।

फ़िल्म आप को पकड़े रखती है। कथानक इधर उधर बहकता नहीं, बराबर मुद्दे पर बना रहता है। फ़िल्म पर डाइरेक्टर का नियंत्रण है। चरित्र-चित्रण सूक्ष्म होते हुए भी मोहक है खासकर लड़कियों का। कोई लड़की अदाबाज़ी नहीं करती मगर फिर भी आपको दिल से भा जाती हैं। संवाद चुटीले हैं। ये सब मेरी निजी राय है। मगर फ़िल्म की सफलता इस की ताईद कर रही है कि ऐसी ही कुछ राय और लोगों की भी है। हिन्दी फ़िल्मों के सन्दर्भ में ये बेहद गुदगुदा देने वाली सफलता है। दुआ करता हूँ कि ऐसी फ़िल्में और बनें और हमें व्यर्थ की मसालेबाज़ियों से छुटकारा मिले। लेकिन इसमें अभिभूत हो जाने जैसी भी कोई बात नहीं है। इसको इतने तक ही रखा जाय, कला और कलात्मकता के शिखर पर ना बिठा दिया जाय जैसा कि आजकल चलन हो गया है।

अगर अर्थ पता होता तो पूरे आत्मविश्वास से आखिर में इस नारे का कोई सार्थक उपयोग करता.. मगर सॉरी कह रहा हूँ.. दे दीजियेगा सॉरी!

7 टिप्‍पणियां:

Pramod Singh ने कहा…

चक दे, कु‍ड़ि‍यां (गुड़ि‍यां नहीं)!..
और दे दिया.. सारी!

अनूप् शुक्ल ने कहा…

सही है। आज् शाम् को ही टीम् के कुछ् सदस्यों के साथ् और् जफ़र इकबाल् के साथ् एक् कार्यक्रम् में रवीश् कुमार् का कार्यक्रम् भी देखा एनडीटीवी पर्। अच्छा लगा। सिनेमा देखकर् बहुत् अच्छा लगा।

Sanjeet Tripathi ने कहा…

वढ़िया जी!!

बेनामी ने कहा…

चक मतलब, उठाना

अजित वडनेरकर ने कहा…

जय हो अभयजी की...अजी फटे में कहां चकदे ?
आपने पहले ही धंधे से लगा रखा है मुझे !!! अभी तो उन्हीं में लगा हूं जिनमें आपने उलझाया है। बढिया है। करता हूं कोशिश । आनंदम् मंगलम् .....सबसे पहले तो फिल्म देखूंगा। आप जैसों की राय मेरे लिए काम की होगी वर्ना इल्लम-फिल्लम ?

Pratyaksha ने कहा…

चक दे माने 'बक अप' ।
चक दे फ़ट्टे , नभ दे कीली
सुबह जलंधर शाम ते दिल्ली

ये सुनते रहते थे टीवी पर रेडियो पर । अभी हाल में पूछा अपने पंजाबी मित्रों से । उम्मीद है सही बताया होगा ।

ashutosh ने कहा…

chak de mane palat de. tandoor me roti chaknee padtee hai. ek to yah film interwal par hee khatm ho jatee hai.uske baad film me n kuchh kahne ko bachtaa hai n dekhne ko.

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