बुधवार, 12 सितंबर 2007

समझौते की गुहार

नवाज़ शरीफ़ को उलटे पाँव लौटा दिया गया। सात साल बाद वतन लौट के आए थे। सोचा था कि मुल्क की बदलती हुई फ़िज़ा का कुछ फ़ाएदा उठायेंगे। लेकिन जनरल मुशर्रफ़ के तो हाथ-पाँव फूल गए; न उनसे निगलते बना न उगलते। चुपचाप शरीफ़ को जेद्दा के उड़ान में पार्सल बना कर रवाना कर दिया। अब कहा जा रहा है कि मियाँ साहिब ने वादाखिलाफ़ी की है लिहाज़ा उन्हे अब सऊदी से बाहर ही नहीं निकलने दिया जाएगा। ये वादाखिलाफ़ी का सन्दर्भ सन २००० में मुशर्रफ़ और नवाज़शरीफ़ के बीच हुए एक समझौते का है, जिसमें नवाज़ शरीफ़ ने एक दस्तावेज़ पर दस्तखत किए हैं कि हुए इस समझौते के दस साल बाद तक न तो वे पाकिस्तान लौटेंगे और न सियासत करेंगे।

नवाज़ शरीफ़ ने यह समझौता किन हालात में किया, ज़रा उसका भी मुआयना कर लिया जाय। एक फ़ौजी डिक्टेटर ने उन की गद्दी हथिया ली। पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट से क़ानून की मुहर भी लगवा ली। हाईजैकिंग, टैक्स-चोरी, घोटाला और दहशतगर्दी के इल्ज़ामों में उन्हे दो-चार उम्रक़ैद की सजा भी हो गई। तब सऊदी अरब की बीच-बचाव की अदालत में इन सजाओं को 'इस समझौते' के तहत जलावतन में तब्दील कर दिया गया। इस पर शरीफ़ साहिब के दिल में जनरल के लिए गुस्सा तो बहुत रहा होगा, पर शायद कहीं शुक्रगुज़ार भी रहें हो। जनरल मुशर्रफ़ से पहले के फ़ौजी हुक्मरान जनरल ज़िया ने तो भुट्टो साहिब को सू-ए-दार भेज दिया था।

आज पूरा वेस्टर्न मीडिया(अपना सीएनएन-आईबीएन भी, आखिर वो भी तो सीएनएन ही है) मियाँ साहिब के ऊपर इसी समझौते के हवाले से उँगली उठा रहा है। कि उन्होने वादाखिलाफ़ी की है, बहुत ग़लत काम किया है। इस पूरे खेल में जनरल साहिब के साथ, सऊदी अरब तो है ही, पीछे से अमरीका की भी हामी है। उसकी मंशा पाकिस्तान में जम्हूरियत के नाटक को नई शक़्ल देने की है, जिसमें जनरल बनें तो रहे मगर बेनज़ीर के पहलू में। बाक़ी दुनिया के लिए आगे का पाकिस्तानी जम्हूरी जलवा ये जोड़ी दिखाए।

मगर पाकिस्तान की अवाम का सोचिए ज़रा! माना जा रहा है कि मियाँ साहिब इस वक़्त पाकिस्तान के सबसे मक़बूल लीडर हैं। उनकी सुप्रीम कोर्ट उनके साथ है मगर उन्हे पाकिस्तान में घुसने भी नहीं दिया जा रहा। और पाकिस्तान की तक़दीर का फ़ैसला अमरीका, सऊदी अरब, बेनज़ीर भुट्टो और जनरल साहिब मिल कर रहे हैं। इसे अंग्रेज़ी में कहते हैं सो मच फ़ॉर फ़्रीडम एंड डेमोक्रेसी!

कहा ये भी जा रहा है कि इस पूरे मामले में सब का नुक़्सान हुआ है सिवाय सऊदी अरब के। उसने इस्लामी दुनिया के आपसी झगड़ों में समझौते कराने और पूरी ईमानदारी से निभाने वाले अपने किरदार को एक बार फिर साबित कर के अपनी साख को बढ़ाया है।

इस पूरे एपीसोड में मुझे एक ही बात समझ आई कि समझौते कभी बराबरी के नहीं होते। एकाधे इस्तिसना को छोड़ दें तो वे कमज़ोर की ओर से अपनी हार का इक़रारनामा होते हैं और आइन्दा भी हारे हुए ही बने रहने का वाएदा।

2 टिप्‍पणियां:

Sanjeet Tripathi ने कहा…

आपकी यह समझ वाली बात हमारी भी समझदानी में वैसे ही घुसी है जैसे आपकी समझ में!

Gyandutt Pandey ने कहा…

चलो, कभी तो अभय से सहमत हो ही लें! :)

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