शनिवार, 7 अप्रैल 2007

जो नहीं बनना चाहतीं राखी सावंत

पिछले दिनों गुरुदेव का स्त्री पर जो लेख आप पढते रहे .. उस पर ऐसा समझा गया कि मैं अपनी बाते गुरुदेव से कहलवा रहा हूँ.. मैं ऐसा कहूँगा कि मैंने जो पहले भी कहा वो गुरुदेव के विचारों से प्रभावित हो कर कहा फिर अपनी बात ठीक ठीक न रख पाने के कारण गुरुदेव को ही आपके सामने पेश कर दिया.. गुरुदेव के पूरे लेख में दो तीन बाते मुख्य तौर पर निकल कर आईं..
१] एक तो स्त्री का स्वभाव पुरुष से अलग है.. उसका स्वभाव कोमल और उदार है.. वह ग्रहणशील है व प्रकृति की तरह समाज में उसकी भूमिका समावेशी है..
२} पुरुष वाह्य रूप से स्त्री से ज़्यादा बलवान है.. और उसने स्त्री जाति को काफ़ी समय से दबा कर रखा है और समाज को अपने गुणों के अनुकूल ढाला है.. इस तरह से पैदा हुआ समाज असंतुलित है और बार बार विनाश होता रहा है आज भी उसी मार्ग पर है..
३] एक मानवीय समाज बनाए के लिये स्त्रैण गुणों को और स्त्री को समाज की अग्रणी भूमिका में आना होगा और वह आयेगी..

नोटपैड वाली सुजाता जी ने और घुघूती बासूती जी ने स्त्री को इस तरह से डिफ़ाइन करने के प्रयास पर भी सवाल खड़ा किया है.. पर मेरा मत यह है कि यहाँ गुरुदेव की मंशा स्त्री को परिभाषित कर उसे एक खास भूमिका में क़ैद कर देने की नहीं है.. बल्कि स्त्री के स्वरूप पर बात करते हुये उन्होने सभ्यता सम्बंधी बड़े प्रश्न उठायें हैं.. स्त्री शोषण के मूल में छिपे तत्वों का अनावरण किया है.. घुघूती बासूती जी ने कहा कि उन पर बाइबिल का प्रभाव है.. आप की बात अंशतः सही है चूँकि गुरुदेव अमेरिका की बहुसंख्यक क्रिश्चियन श्रोताओं से मुखातिब हैं इसलिये उन्होने एक दो जगह बाइबिल के उद्धरण दिये हैं .. इसके अलावा उनके विचार काफ़ी मौलिक है..

सुजाता जी ने बिलकुल ठीक बताया कि अभी का समाज ऐसा है जिसमें स्त्री होना पीड़ा और शर्म का दूसरा नाम हो गया है.. उसके जननांगों का उपहास होता है.. वह बलत्कृत होती है.. गर्भ में ही मार जाती है.. और इस पर मेरा मत यह है कि परिणाम स्वरूप कुछ स्त्रियाँ अपने अन्दर के ऐसे व्यक्तित्व के विकास के प्रति ज़्यादा सचेत हो रही है जो लिंग निरपेक्ष हैं.. और अपने नैसर्गिक स्त्रैण गुणों को नकार रही है..

अन्त में बस इतना कहूँगा कि हमें नहीं चाहिये वो समाज जो एक स्त्री के अन्दर की किरन बेदी और सानिया मिर्जा और राखी सावंत को दमित करता हो.. ऐसा समाज स्त्री विरोधी और मानव विरोधी है.. साथ साथ ही हमें ऐसे समाज से भी सावधान रहना चाहिये जो सुषमा, रेखा और अतिया जैसी हज़ारों हज़ार आम स्त्रियों को अपने आप से शर्मसार करता हो क्यों कि वो नहीं बनना चाहती किरन बेदी, सानिया मिर्ज़ा और राखी सावंत .. वे किसी को अपना पति चुन कर और उसके साथ छोटे छोटे मौलिक मनुष्यों की रचना और उनके पोषण में ही खुश रहना चाहती हैं.. उन्हे रसोई में तकलीफ़ नहीं होती और वही उनकी दुनिया है.. वे दोनों ही समाज स्त्री विरोधी हैं एक वो जो उन्हे धकेल के रसोई के अन्दर बंद करता है.. और दूसरा वह जो उन्हे धकेल के रसोई से बाहर कर मैकडोनाल्ड के रास्ते पर खड़ा कर देता है.. और उन्हे बना देता है अपने विशाल बाज़ार का सिर्फ़ एक मज़दूर.. .

3 टिप्‍पणियां:

Tarun ने कहा…

वे किसी को अपना पति चुन कर और उसके साथ छोटे छोटे मौलिक मनुष्यों की रचना और उनके पोषण में ही खुश रहना चाहती हैं.. उन्हे रसोई में तकलीफ़ नहीं होती और वही उनकी दुनिया है

अभयजी,
ऐसा इसलिये क्योंकि बचपन से ऐसी बातें उन्हें घुट्टी की तरह पिलायी जाती है इसलिये बडे होने पर उन्हें लगता है वो इसीलिये बनी हैं। भारतीय समाज का एक वर्ग शायद चाहता ही नही है कि भारतीय स्त्रियां स्वालंबी और आत्मनिर्भर हो, वो इनकी कमाई पर ऐश कर सकता है, उनकी कमाई पर दारू पीकर उन्ही की पिटाई कर सकता है।

एक दूसरा वर्ग है जो चाहता तो है कि उनकी पत्नियां काम करे पैसा घर पर लाये लेकिन साथ में वो ये भी आशा करता है कि जब घर पहुँचे तो वो उन्हें खाना बनाकर भी खिलाये। कितने भारतीय पुरूष अपनी पत्नियों का घर के काम में हाथ बटांते हैं। भारतीय समाज इन दोनों वर्ग के लोगों से भरा है हमें तो ऐसा ही लगता है।

अरुण अरोरा ने कहा…

भईये भाभी से इस की शुरुआत करो (राखी सांवत बनाने की) फ़िर हमे खबर करना घर पे रोटी मिल रही है कया

अभय तिवारी ने कहा…

आप ठीक कह रहे हैं तरुण जी..लेकिन घुट्टी दूसरे प्रकार की भी पिलाई जा सकती है.. जैसे एक मार्क्सवाद की घुट्टी होती है.. एक धार्मिक कट्टरता की घुट्टी होती है..एक घुट्टी को दूसरे से बदल देने से कोई लाभ ना होगा..वांछित ये है कि सभी अपने जीवन के विषय में एक स्वतंत्र विचार रख सके, एक स्वतंत्र फ़ैसला ले सकें..दूसरी बात.. घुट्टी के प्रभाव में ही सही.. अगर कोई टी वी पर सास बहू देखना चाहता है..और धकेल कर सिमोन द बौवा को पढने पर मजबूर किया जाय..या धकेल कर करियर वूमन बनने पर बाध्य किया जाय तो ये भी तो एक प्रकार की तानाशाही हो गई.. कौन जानता है कि सत्य क्या है..किसी को भी अपने सत्य पर इतना भरोसा हो जाय कि वो उसे दूसरों के गलों के नीचे जबरिया ठूँसने लगे तब तो उस सत्य के साथ कुछ समस्या है.. मेरा मतलब एक ऐसी व्यवस्था के विरोध से है जो आपको अपने जीवन के फ़ैसले करने की आज़ादी नहीं देती और एक खास तरह के जीवन को तर्क से सही सिद्ध करके उसे रैपर में लपेट कर पेश करती है.. जबकि आप के पास उसे लौटाने का विकल्प भी नहीं है.. बार बार मैं सफ़ाई देता हूँ फिर फिर करियर वूमन विरोधी समझा जाता हूँ..

भाई अरुण आप क्या कह रहे हैं.. मुझे नहीं समझ पड़ा.. मैं आपकी भाभी यानी अपनी पत्नी को राखी सावंत बनाऊँ..? क्यों..? मैं किसे राखी सावंत बनने की वकालत कर रहा हूँ?

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