बुधवार, 18 अप्रैल 2007

३६५ दिन का मौन ?

वर्जीनिया टैक यूनिवर्सिटी मे एक कोरियाई छात्र ने अंधाधुंध फायरिंग की.. नतीजतन ३३ लोग मारे गये.. जीतू जी के पास से प्रस्ताव आया है एक अनजान सूत्र से.. कि ३० अप्रैल के रोज़ पूरे ब्लॉग जगत को बंद रखा जाय कोई कुछ ना बोले.. माफ़ करें ये बात मेरे गले नहीं उतरती.. जीतू जी की नेकनीयती पर किसी को शक़ नहीं है.. मगर जिन्होने इस मौन प्रस्ताव का सूत्रपात किया है.. ना जाने कौन लोग हैं.. ना जाने क्या उनकी राजनीति है क्या राजनैतिक मंशा है.. क्यों इस मामले को दुनिया भर में होने वाली हिंसा से जोड़ा जा रहा है.. निश्चित ही ये हिंसा का मामला है.. पर अमरीका की सदारत में होने वाली दुनिया भर की हिंसा की दूसरी परिघटनाओं से अलग है..

मेरा ख्याल है कि इस मामले को बाकी मामलों से अलग करके देखा जाना चाहिये.. एक स्तर पर सब हिंसा एक ही है..मरने वालो का खून हर मामले में लाल ही होता है.. पर यहाँ मारने वाला कौन है.. एक व्यक्ति.. अपनी किसी मनोदशा से प्रेरित हो कर उसने ये जघन्य कृत्य किया.. ये ठीक है कि उस मनोदशा के बीज समाज में ही है.. पर बड़े स्तर पर की जाने वाली सुनियोजित राजनैतिक हिंसा पर तो हम विरोध का कोई सामूहिक कदम ना उठायें .. और एक आदमी के दुष्कत्य पर पूरा ब्लॉग जगत मौन साध ले.. बिना निशाने के इस राजनैतिक हथियार का क्या अर्थ है.. किसके खिलाफ़ है ये पहलकदमी.. कुछ अमूर्त नहीं हो जा रहा है ये दु:ख और संवेदना का प्रदर्शन.. वो भी तब जबकि आज १२७ लोग मारे गये इराक़ के एक सीरियल बम धमाकों में.. ऐसी हिंसा के लिये जो लोग ज़िम्मेदार हैं उनके विरोध में हम कभी इस तरह सामूहिक रूप से बोलेंगे या एक दिन का नहीं ३६५ दिन का मौन धारण करेंगे.. हमारे भीतर के असंतोष को एक फ़र्ज़ी मंच नहीं.. विरोध का एक सच्चा मंच चाहिये..

जो हुआ दु:खद हुआ..पर हमारे अपने देश में ही इतनी ढेरों ढेर मुसीबतें समस्याएं और आपदाएं हैं और उसमें बाकी दुनिया की भी जोड़ दें.. और हम प्रत्येक पर मौन रहें तो ब्लॉग लिखने के अवसर कम आयेंगे.. मेरी निजी राय ये है कि हमें मौन रहने की नहीं खुल के बोलने की ज़रूरत है.. अभी भी हम तमाम मुद्दों पर विवाद के भय से मौन साधना उचित समझते हैं..

बाकी जो आम सहमति बने..

11 टिप्‍पणियां:

अफ़लातून ने कहा…

अभयजी के विचारों से सहमति है ।

बेनामी ने कहा…

इराक़ में आज ही 120 से ज़्यादा लोग मारे गए हैं बम धमाकों में. उनके लिए भी तो दिल दुखना चाहिए. कितना रोएँगे...

Pramod Singh ने कहा…

अमरीका में घटी किसी भी घटना से हम आखिर इतना भावुक क्‍यों होने लगते हैं? फिर हर साल नृशंसता के ऐसे किस्‍से हो रहे हैं वहां, बस मरनेवालों की संख्‍या में फर्क आता है। गस वान सांट की एक कान पुरस्‍कृत फिल्‍म है 'एलीफेंट', स्‍कूल परिसर में दो लड़कों की अंधाधुंध फायरिंग की सत्‍यकथा पर आधारित। मायकल मूर ने 'बॉलिंग फॉर कॉलम्‍बाइन बनाई थी अमरीकी समाज के हथियारों से ओब्‍सेशन के थीम पर। सरकार ने वहां इस विषय में अबतक क्‍या किया है? स्‍कूल परिसरों व कैंपसों में बच्‍चे हथियार लेकर पहुंच रहे हैं ऐसे फार्स पर हम गुस्‍सा हों कि शोक मनायें? फिर यह तो व्‍यक्ति विशेष के मानसिक विकार का क्षेत्र है, उस अमरीकी बड़े सामाजिक विकार का कहां-कहां शोक मनायें और किस तरह का मौन धरें जो इराक को इतने वर्षों से आक्रांत किये है?

v9y ने कहा…

मेरी सहमति भी दर्ज की जाए.

kakesh ने कहा…

मेरी भी सहमति है . वैसे भी अपन कोई डेली तो लिखते नहीं हैं इसलिये इसका विरोध नही किया था... जब मन आया मौन रख लिया . लेकिन यदि हम गहराई से सोचें तो समझ आयेगा कि हम क्या करने जा रहे हैं . सिर्फ और सिर्फ पिछलग्गू बन रहे हैं . क्या कभी किसी मुद्दे पर हिन्दी चिट्ठा जगत मौन रखता है तो क्या बाकी दुनिया वाले उसे मानेंगे. और वहां तो केवल कुछ लोग मरे हैं वो भी सिर्फ एक व्यक्ति के पागलपन से इससे भी बड़े बड़े किस्से यहां होते हैं तब तो नहीं रखते हम मौन . क्या किसी ने मुम्बई बम धमाकों के समय मौन रखा था ?

Tarun ने कहा…

मौन रहने के कारण ही ये सब हुआ, अगर जनता से घुलता मिलता तो उसे अवसाद नही होता, अवसाद नही होता तो शायद ये घटना भी नही होती।

मौन रहने के कारण ही ये सब हुआ, अगर गन इतनी आसानी से उपलब्ध कराने के लिये विरोध हुए होते तो शायद ये नही होता।

लेकिन क्या कर सकते हैं, होनी तो होकर रहे अनहोनी ना होए। हमारी संवेदना उन ३३ लोगो के लिये भी है और उन १२३ (या १४०) लोगों के लिये भी।

Pratyaksha ने कहा…

सही कहा आपने

प्रियंकर ने कहा…

मौन मन की शुद्धि के लिए व्यक्तिगत रूप से करें.लिखना स्वान्तः सुखाय के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी है. प्रतिवाद कभी स्थगित नहीं होना चाहिए . गलत बात के विरोध का स्वर मंद नहीं पड़ना चाहिए . हां! यह ज़रूर है कि कभी-कभी ज्यादा हो-हल्ले और रोवा-रोहट के बाद जब शब्दों के पनारे पर पनारे बह रहे हों तो मौन रहने का मन होने लगता है .

बेनामी ने कहा…

मेरी भी सहमति दर्ज कीजिए। इस तरह का मौन किन्‍ही ज्‍यादा गंभीर और व्‍यापक मसलों पर उतनी ही गंभीरता के साथ विचार नहीं, बल्कि संवेदनशीलता की नौटंकी है। आपने बिल्‍कुल ठीक लिखा है।
मनीषा

Jitendra Chaudhary ने कहा…

अभय भाई,

भई मेरे को जो दिखा, सही समझ मे आया आपके सामने रखा, कोई जरुरी नही है कि सभी लोग मेरे विचारों से सहमत हो। आप अपने ब्लॉग पर लिखने ना लिखने के लिए स्वतंत्र है।

बस एक बात ही कहना चाहता था कि मृतकों को श्रद्दांजिली मौन रहकर ही दी जाती है। मै ३० तारीख को नही लिखूंगा बाकी लोग अपने स्तर पर स्वयंविवेक से निर्णय लें।

vimal verma ने कहा…

क्या भाई ,आपने बताया नही कि कितने दिन का मौन रखा है? मौन टूट्ने का इन्तज़ार है....

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