बुधवार, 11 अप्रैल 2007

हम तुम गंगू हैं.. हिन्दू नाहीं..

मैं ब्राह्मण हूँ..कान्यकुब्जी हूँ.. पुरुष हूँ.. भैया हूँ.. कन्पुरिया हूँ.. इलाहबादी हूँ.. अब मुम्बईकर भी हूँ.. हिन्दू नहीं हूँ.. मैंने गीता पढ़ी है.. रामायण पढ़ी है.. महाभारत और श्रीमद भागवत भी अलट पलट के देखा है कई दफ़े.. हिन्दू कहीं नहीं मिलता.. धर्म की किताबों की बाहर की दुनिया में हर जगह हिन्दू का हल्ला है.. कुछ विरोध में कुछ समर्थन में गला फाड़ रहे हैं.. कहाँ से आया ये हिन्दू.. कहते हैं कि सिन्धु के स का लोप हो कर ह हो गया.. जी वही सिन्धु जो पाकिस्तान में है.. जिससे उल्हास नगर वाली सिन्धी असोसिएशन और आडवाणी जी का गहरा ताल्लुक है.. ये लोग पाकिस्तान के सिन्द प्रान्त से विस्थापित हुये लोग है.. मगर पाकिस्तान के उस सिन्द प्रान्त और वो सिन्द नदी जो हमारे कब्ज़े वाले कश्मीर में भी ठीक से हो के नहीं बहती.. उस के प्रति हम इतना सेन्टी काहे हैं कि उसके स की जगह ह रख कर हम मुहर्रम वाले अंदाज़ में छाती पीटने और मरने मारने की बातें करने लगते हैं.. क्या उस नदी का उद्गम किसी गरम पानी के सोते से है जो उस के नाम में से स हटा कर ह रखने के बावजूद भी इतनी गरमी शेष रहती है कि करोड़ो करोड़ लोग बेमियादी बेमौसम बुखार में तपते रहते हैं.. कुछ तो बात है..
लेकिन इतनी भी नहीं कि मेरे आस्तिक संशय और सशंकित आस्था को अपनी ऐसी धार में बहा ले जाय जिसमें मैं तीन बार डुबकी मार के हर हर गंगे भी नहीं कर सकता.. माफ़ करें भाई मैं अपने आपको बाहर वालों के दिये हुये नाम से पुकारने को तैयार नहीं हूँ.. और सच बात तो ये है कि असली हिन्दू तो वो लोग हैं जिनके साथ हमारा देश तीन खुलेआम लड़ाईयां लड़ चुका है...और एक छिपी व लम्बी लड़ाई आज भी लड़ रहा है.. वही जो सिन्द में नहाते धोते हैं.. उसका पानी पीते हैं.. उसके पानी से उपजा अनाज खाते हैं.. सिन्धु घाटी की सभ्यता के उत्तराधिकारी तो वो हैं.. हमारे पास तो इस भौगौलिक प्रदेश की दूसरी बड़ी नदी की सभ्यता है.. अपनी मैली गंगा.. और गंगा किनारे की सभ्यता.. और हमारे सनातन धर्म में सारी महिमा तो गंगा की है.. त काहे बरे सिन्द के पाछे हलकान हुइ रहे हो.. तनि होस में आव मनई.. हम तुम गंगू हैं.. हिन्दू नाहीं..



प्रेरणा पुरुष: बड़के लिखवैया उदै परगास

14 टिप्‍पणियां:

RC Mishra ने कहा…

सही कह्या हो...

संजय बेंगाणी ने कहा…

सही कहा गंगू भाई.

चौपटस्वामी ने कहा…

मुंह से ज्यादा बड़ा कौर ले लिये अभय भाई उदैप्रकाशी जादू बिखेरने के चक्कर में.

सभ्यता और संस्कृति का प्रसार का अब अइसन भौगोलिक खिलवाड़न से प्रमापित और परिभाषित करबे करेंगे हम .ऋग्वेद वहीं रचा गया सिंधु के समीप और सरस्वती के किनारे . ताज़ा वैज्ञानिक तथ्य कहत हैं कि राम का जन्म भी वहीं हुआ रहा अफ़गानिस्तान में. गंगा तब एतना महत्वपूर्ण नदी ना हुआ करती थी गंगू भाई .

Atul Sharma ने कहा…

मेरे शहर के पास नर्मदा, चम्बल और क्षिप्रा नही बहती हैं। इसलिए बैं नर्मदू, चम्बलू, और क्षिप्रू हूँ। अच्छा है गंगूजी।
इससे एक कहावत याद आती है शायद आपने सुनी हो-कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली। दरअसल गांगेय तैलंग बिगड़ कर गंगू तेली हो गया।
आप इस गंगू को अपने गंगू से संदर्भित न करें, भई गंगू सुनकर यह कहावत याद आ गई।

अभय तिवारी ने कहा…

चौपट स्वामी जी .. आप शास्त्रीय धारा में बहने वाले तैराक जान पड़ते हैं.. आप की बातों में तथ्य भी है और तथ्य की दुनिया में कल्पना का पीड़न भी..ऋगवेद सिन्धु के किनारे तो नहीं सरस्वती के किनारे रचा गया ऐसी मान्यता ज़रूर है..(शायद इसीलिये आप समीप कह रहे हैं) नदी सूक्त में जितना आदर सिन्धु के प्रति है उतना ही गंगा के प्रति.. परन्तु जैसा आदर सरस्वती के प्रति है वैसा सिन्धु के प्रति नहीं.. ऋगवेद के बाद धार्मिक ग्रन्थों में सिन्धु का उल्लेख उत्तरोत्तर क्षीण होता जाता है.. और गंगा की महिमा बढ़ती जाती है..गंगा का मह्त्व सिन्धु से कम है आपकी ये आपत्ति कमज़ोर है.. रही बात भौगोलिक प्रसार और राम की अयोध्या के ताज़ा वैज्ञानिक तथ्यों की.. आपसे अनुरोध है कि प्रख्यात मर्क्सवादी विचारक रामविलास शर्मा जी की पुस्तक 'पश्चिमी एशिया और ऋगवेद' का अध्ययन करें.. लाभ होगा..

अनामदास ने कहा…

भई गंगू हो या नंगू , वह भी हिंदू की ही तरह नाकाम शब्द होगा.पाँच हज़ार वर्षों में निरंतर बढ़ती,बदलती,दूसरों से मिलती-घुलती,लड़ती-लाड़ करती करोड़ों की आबादी के लिए कोई एक पारिभाषिक शब्द कहाँ से आएग जो सटीक हो.सिंधु के निकट न रहने वाले भी अपने हिंदू मान लेते हैं वैसे ही गंगू भी मान सकते हैं. मध्य प्रदेश वाले नर्मदू तो नहीं होना चाहेंगे? जो भी हो छेड़ी सही है...ब्लॉग का आनंद बनारस के भांग वाला होना चाहिए, विजया पीजिए, बुद्धिविलास कीजिए.
साधुवाद

चौपटस्वामी ने कहा…

अभय भाई,
यह आपको गलत साबित करने के मकसद से 'तथ्य की दुनिया में कल्पना का पीड़न' नहीं है . इसके पीछे वैदिक इतिहास का थोड़ा बहुत स्वान्तः सुखाय अध्ययन है .

ऋग्वेद की नदी स्तुति में जिन सात नदियों का जिक्र है क्रमशः वे हैं : सिंधु , सरस्वती,वितस्ता(झेलम), शतुद्रि(झेलम), विपाशा(व्यास),परुष्णी(रावी) और अस्किनी(चिनाब). तो यह था ऋग्वैदिक काल का सप्तसैन्धव इलाका . ऋग्वेद के दसवें मंडल का ७५ वां सूक्त सिंधु की महिमा का ही गायन है .

सरस्वती और दृषद्वती के बीच का इलाका ब्रह्मावर्त था. सरस्वती का जिक्र करते समय तो ऋग्वैदिक ऋषि भावविभोर ही हो उठता है और 'अम्बितमे, नदीतमे, देवीतमे' जैसे सुपरलेटिव्ज़ द्वारा उसकी अभ्यर्थना के गीत गाता है . पर गंगा का ऐसा जिक्र नहीं है. इसके ठोस कारण हैं . यह सब हो रहा था सप्त-सैन्धव में -- दक्षिणी अफ़गानिस्तान में. ऋग्वेद का बहुलांश वहीं लिखा गया . तब तक आर्य गंगा-यमुना के दोआबे तक नहीं पहुंचे थे.
और वहां पहुंचने में उन्हें लगे लगभग ७-८ सौ साल . और जब वे वहां पहुंचे तो उत्तर-वैदिक काल के ऋषि ने गंगा की अभ्यर्थना में गीत लिखना शुरु किया .

जब आप इन तथ्यों को भुलाते हैं तो कालक्रम टूट जाता है और बीच की सात-आठ शताब्दियां छूट जाती हैं .ऋग्वेद के बाद के साहित्य में सिंधु का ज़िक्र इसीलिये कम है और गंगा का इसीलिए ज्यादा क्योंकि तब तक आर्य गंगा-यमुना के दोआबे में आ चुके थे,गंगा उनके जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी थी और वे वहीं बैठ कर रचना कर रहे थे .

रामविलास जी की पुस्तक 'पश्चिम एशिया और ऋग्वेद मैंने पढ़ रखी है.उनकी 'हिंदी जाति की अवधारणा' के समर्थन में भी लगातार बहस चलाता रहा हूं.यहां शायद यह बताना भी अनुचित न हो कि रामविलास जी का हमारे परिवार के साथ सुदीर्घ संबंध रहा है.

हां! आपको ज़रूर एक (नई? प्रकाशन वर्ष २०००) किताब पढ़ने की राय दूंगा जिसका नाम है : 'द वैदिक पीपुल: देयर हिस्ट्री एण्ड ज्योग्राफी', इसके लेखक हैं सुप्रसिद्ध ऐस्ट्रोफिज़िसिस्ट राजेश कोचर और यह ओरिएण्ट लोंगमैन से छपी है . नई उद्भावनाएं हैं और रामविलास जी के बाद का अध्ययन है . पढ़ कर लाभ होगा .

अभय तिवारी ने कहा…

सर्व प्रथम तो ये कि आप विषय पर पूरे स्वामित्व के साथ बात रखते हैं..जो प्रंशसनीय है..और आपके नाम के अनुरूप है..दो तीन बातें हैं स्वामीजी..एक तो ये कि जिस सप्त सिंधु का ज़िक्र आप कर रहे हैं उसका क्षेत्र पाकिस्तानी पंजाब हिन्दुस्तानी पंजाब कश्मीर और पाकिस्तानी सिन्ध और अपना राजस्थान जहाँ से हो के सरस्वती बहती थी और शायद गुजरात..यानी कि इस क्षेत्र में पेशावर भी ना आयेगा..फिर आप बार बार अफ़्ग़ानिस्तान पर क्यों इतना बल दे रहे हैं..दक्षिणी अफ़्ग़ानिस्तान मतलब कि कान्धार जो सप्तसिन्धु क्षेत्र से कम से कम पाँच सौ किलोमीटर दूर होगा..ये क्या राज़ है स्पष्ट करें..
दूसरी बात आप काल विभाजन के बारे में इतने स्पष्ट कैसे हैं .. हज़ार क्यों नहीं.. और दो सौ क्यों नहीं.. सात आठ सौ ही क्यों.. समझ नहीं आया..

बाकी बात में तो हमारी आप की सहमति है..राजेश कोचर की पुस्तक मैंने नहीं पढ़ी है.. मैं जुगाड़ करके पढ़ता हूँ..

और आपके परिवार के बारे में और बतायें.. आशा है वह आपकी तरह चौपट न होगा.. इस मज़ाक को अन्यथा न लीजियेगा..

अभय तिवारी ने कहा…

वैसे आपने कोचर की किताब के नयेपन पर ज़ोर दिया है ऐसा क्यों..? रामविलासजी की किताब १९९४ में प्रकाशित हुई पहली बार..६ वर्ष में किसी वैज्ञानिक खोज से ऐतिहासिक अनुसंधान पर गहरा प्रभाव पढ़ने जैसी कोई बात तो नहीं ही कह रहे होंगे आप..फिर ?

बेनामी ने कहा…

hindi to hain

बेनामी ने कहा…

hindu n sahi hindi to hain

बेनामी ने कहा…

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अभय तिवारी ने कहा…

मैं तो कहता हूँ हिन्दी का भी नाम बदल कर गन्दी.. माफ़ करें.. गंगी किया जाय और हिन्दोस्तान का नाम बदल कर गंगूस्तान..

प्रियंकर ने कहा…

प्रिय भाई!
सप्तसिंधु तो वही है जो आप कह रहे हैं और जो मैं कह रहा हूं और यह हम अपने अब तक अध्ययन के आधार पर ही कह रहे हैं.

पर इधर के शोध इस सीमा को और पीछे ले जा रहे हैं.राजेश कोचर तो इसे लगभग भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर ही ठेले दे रहे हैं . उनके अनुसार ऋग्वेद का बहुलांश तब लिखा गया जब आर्य भारत आने के पूर्व(सप्त-सैन्धव और गंगा के मैदानी इलाके में प्रवेश के पहले) अफ़गानिस्तान की हेलमंड नदी के आस-पास रह रहे थे . उनका तर्क है कि ऋग्वेद की ऋचाएं अफ़गानिस्तान के भौगोलिक संदर्भों से भरी पड़ी हैं. अवेस्ता में जिस नदी 'हरहवैती' का ज़िक्र है वह भाषाशास्त्रीय और ध्वन्यात्मक आधारों पर 'सरस्वती' नदी ही ठहरती है. वह यही अफ़गानिस्तान की हेलमंड नदी है . वे वैदिक देवता 'सोम' को अवेस्ता के 'हाओम' का समतुल्य मानते हैं . वे अफ़गानिस्तान की 'हरयू' नदी को राम के जन्मस्थान से जुड़ी 'सरयू' नदी के रूप में संकेतित करते हैं . वैसे भी आर्यों का पश्चिम एशिया से सम्बंध तो जगजाहिर है.

रही बात काल-विभाजन की तो यह मेरा किया हुआ नहीं है. अधिकांश इतिहासकार वैदिक युग को मोटामोटी १७०० से ५०० बीसी के बीच मानते है . १७०० से १००० या ८०० ईसा पूर्व तक पूर्व-वैदिक या ऋग्वैदिक काल तथा १००० या ८०० ईसा पूर्व से ५०० ईसा पूर्व तक उत्तर-वैदिक काल . सो इसमें मेरा कोई योगदान नहीं है. यह तो वही है जो इतिहास ग्रंथो में मिलता है . ७-८ सौ का पांच-छह सौ हो सकता है पर १००० या २०० नहीं जैसा आपने संकेत किया है. ऋग्वैदिक काल यानी आर्यों के दक्षिणी अफ़गानिस्तान या सप्त-सिंधु में निवास का समय और उत्तर-वैदिक काल यानी उनका गंगा-यमुना के अन्तर्वेदी इलाके में अधिवास .

आप जैसे प्रबुद्ध व्यक्ति की सहमति भी सर-माथे और असहमति भी. जब आपसे मिलूंगा तो अपने बारे में भी बात करूंगा और अपने परिवार के बारे में भी . चौपट तो वह है ही.चौपट न होता तो पढने-लिखने के नाशुक्रे काम में लगता.और बहुतेरे भलेरे काम हैं करने को .

मैंने कहां किताब के नएपन पर जोर दिया है बल्कि मैने तो नए के आगे खुद ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है . हां उद्भावनाएं ज़रूर नई हैं . तिस पर एक सुप्रसिद्ध खगोल-भौतिकीविद का अध्ययन है जिसके पीछे भाषावैज्ञानिक,साहित्यिक,नैचुरल हिस्ट्री,पुरातत्व,प्रौद्योगिकीय-इतिहास, जियोमॉर्फोलॉजी और खगोल से सम्बंधित साक्ष्यों का विश्लेषण है तो इसे हंसी में भी नहीं उड़ाया जा सकता. मैंने भी इसे बड़े अविश्वास भाव से पढना शुरु किया था पर प्रभावित हुआ .अभय भाई अब मानविकी में विज्ञान की तरह तो कोई नई खोज होती नहीं है.हां कुछ अतिरिक्त साक्ष्यों के सहारे नया 'पर्सपैक्टिव' या 'इंटरप्रेटेशन' होता है जो विद्वानों का समर्थन मिलने पर सही माना जाने लगता है पर साथ-साथ भविष्य में किसी न किसी के द्वारा गलत ठहराए जाने की गुंजाइश भी बनी रहती है.

'पहचान' या 'आइडेन्टिटी' गंभीर विचार और तर्क-वितर्क का जटिल विषय तो हो सकता है पर यह मखौल और उपहास का विषय न हो तो ही अच्छा . अगर मैं आपके समक्ष अपनी बात सलीके से रख पाया तो अपने को भाग्यशाली समझूंगा .

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