गुरुवार, 26 अप्रैल 2007

कवि बोधिसत्व भी बने चिट्ठाकार

हिन्दी साहित्य और हिन्दी भाषाई समाज का तअल्लुक काफ़ी विछिन्न हो चला है । कारण जो भी हो, लोग पढ़ते नहीं है । इसलिये नहीं कि कवि और लेखक इस स्तर के नहीं कि उन्हे पढ़ा न जाय बल्कि इसलिये कि हिन्दी भाषा अपनी राजनैतिक व व्यावसायिक उपयोगिता खो चुकी है । किताब ही खरीदनी होगी तो लोग अंग्रेज़ी की खरीदेंगे । पर हिन्दी ब्लॉग की दुनिया बात अलग है.. यहाँ पर वही प्राणी विचरते हैं जिनका हिन्दी से अटूट प्रेम है । और इन हिन्दी प्रेमियों के बीच कविता प्रेमियों की संख्या खूब प्रबल है । आज मैं आप सब प्रेमी जनों के बीच हिन्दी के एक प्रतिष्ठित कवि को परिचित करने का आनन्द लेना चाहता हूँ । कवि हैं अखिलेश मिश्र बोधिसत्व और इनके ब्लॉग का नाम है विनय-पत्रिका । ये हमारे समुदाय का हिस्सा तो फ़रवरी में ही बन गये थे पर कुछ निजी कारणों के चलते सक्रिय न हो पाये और नारद में पंजीकरण भी नहीं कर पाये । पंजीकरण अभी भी होना है .. सोमवार का इंतज़ार कर रहे हैं (अब से नये चिट्ठों का पंजी करण सिर्फ़ सोमवार को ही होगा), पर सक्रिय हो गये हैं ।

बोधि और मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में सहपाठी रहे हैं । इनकी प्रतिभा के पाँव उसी पालने में पहचाने गये थे । तब से अब तक बड़े मुकाम तय किये हैं बोधि ने । तीन कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं -सिर्फ़ कवि नहीं (१९९२), हम जो नदियों का संगम हैं (२०००), और दुःख-तंत्र (२००४) और चार सम्मान प्राप्त कर चुके हैं । कई विश्वविद्यालयों और माध्यमिक पाठ्यक्रमों में इनकी कविता पढ़ी जाती है । फ़िलहाल मुम्बई में रिहाइश है और स्टार न्यूज़ में सलाहकार हैं । निजी तौर पर मुम्बई जैसे साहित्य विरोधी शहर में मेरे कुछ सहारों में बोधि भी हैं । बोधि की कविता के बारे में, मैं क्या कहूँ.. देश के सभी साहित्यिक हस्तियां इन्हे अपनी पीढ़ी के सबसे महत्वपूर्ण कवियों में मानती हैं । मैं एक इतर बात कहना चाहता हूँ जो वो हस्तियां नहीं जानती और नहीं कहती कि बोधिसत्व एक अद्भुत स्मृति के स्वामी हैं । जिस तरह से वो लगातार उद्धरण छोड़ते चलते हैं वो मेरे जैसे स्मृति शून्य व्यक्ति के लिये बेहद आतंकित करने वाला होता है । पर मैं अपने आपको इसी आश्वासन से बचाये रखता हूँ कि वे मेरे मित्र हैं नहीं तो कब का शर्म से गल कर बह गया होता । रामचरित मानस कुछ इस तरह से उन्हे ज़बानी याद है कि वो मुझे वेदपाठी ब्राह्मणों की परम्परा के लगने लगते हैं बावजूद इसके कि अभी अभी ही वे कुछ आरोपों और हमलों का भी शिकार हुये मोहल्ले में छपी उनकी कविता शांता को लेकर । मेरी इच्छा है कि वो अपनी कवितायें तो लिखते ही रहें साथ साथ अपनी इस प्रतिभा का उपयोग कुछ गद्य लेखन में भी करें ।

आप बोधि की एक कविता पढिये जो मेरी पसंद की इसलिये भी है कि वह हमारे शहर इलाहाबाद के बारे में है..

एक एक करके गिरते जाते हैं तरु,
होता जाता है सूना
वन का आँगन, उड़ते जाते हैं पत्ते
दुःख होता जाता है दूना।


घटती जाती है छाँह, मन होता
जाता है ऊना, हाल पूछना,
राह भूल कर आना जाना, बन्द हुआ
चूमना छूना ।


एक एक कर होते हैं उऋण, सोचते हैं
वहाँ उमड़ा आता है अब पावस,
होता है शुरु पत्तों की आँखों से
जल चूना ।

21 टिप्‍पणियां:

Pramod Singh ने कहा…

कवितायें, और खास तौर पर हिन्‍दी कवितायें मेरे पल्‍ले बहुत नहीं पड़तीं, तो उस पर मुंह नहीं खोलूंगा.. मगर बोधि को थोड़ा बहुत सुनते हुए जो बात मेरे दिमाग में उठती है वह ये कि बोधि को फुरसत व सुभीते में- माने यूनीकोड व इंटरनेट पर जल्‍दी से कब्‍जा जमाने के बाद- भोलानाथ तिवारी के 'शब्‍दों का जीवन' जैसी छोटी, रोचक चीजों का अपने ब्‍लॉग पर संचयन करने के बारे में विचार करना चाहिये। क्‍यों, बोधि, आइडिया कैसा है?..

अविनाश ने कहा…

बोधिसत्‍व जी के व्‍यक्तित्‍व के एक और आयाम से परिचय हुआ। काश, हम भी इलाहाबाद में हुए होते!

बेनामी ने कहा…

अपनी पिछली पोस्‍ट में हिंदी भाषा और किताबों का रोना रो रहे थे। कभी सोचा है, हिंदी की ये दुर्दशा क्‍यूं हैं। दूधनाथ जैसों के स्‍कूल और बोधिसत्‍व जैसे कवि-लेखकों के कारण ही, जो हमारी भाषा के नाम पर धब्‍बा हैं। हिंदी साहित्‍य का कल्‍याण करके अब ये ब्‍लॉग की दुनिया में भी आ धमके हैं।

बेनामी ने कहा…

बोधिसत्व जी का स्वागत है. उनसे उम्मीदें भी बहुत हैं. स्टार न्यूज़ में सलाहकार हैं यह बताकर आपने चौंका दिया, भूत-प्रेत, सनसनी, नाग-नागिन आदि की सलाह इनकी दी हुई तो नहीं लगती. कविता बहुत सुंदर है. और आए...
अनामदास

अभय तिवारी ने कहा…

भाई बेनाम.. हिन्दी की दुर्दशा का सारा ठीकरा बोधिसत्व के सर ही फोड़ देना, हिन्दी के रोगों के पड़ताल के गम्भीर प्रयास से बचना है..आप खुद कोई छुपे रुस्तम हैं.. ऐसे परदे से अपनी चिंता ज़ाहिर करने से ना होगा.. आइये मैदान में और बचाइये हिन्दी को.. और अच्छी बात ये है कि इस बार आप और बोधिसत्व के बीच कोई दूधनाथ नहीं बस ब्लॉग जगत का समतल मैदान (level playing field) है..

Neelima ने कहा…

सोमवार का इंतजार रहेगा हमें पर अब हमें कौन पढेगा ;)

बेनामी ने कहा…

अभय जी, नाम जानकर क्‍या करेंगे। हो सकता है, मैं बोधिसत्‍व के घर का ही कोई होऊं / घर की कोई होऊं, कोई बहुत सगा/सगी, बिल्‍कुल आसपास का/की। माफ कीजिए, हिंदी साहित्‍य की दुर्दशा का पूरा ठीकरा मैं बोधिसत्‍व के सिर पर नहीं फोड़ रहा हूं/रही हूं। सारी जिम्‍मेदारी उन महानुभाव की नहीं है, हिंदी की उस पूरी परंपरा की है, जिसने बोधिसत्‍व जैसों को पाला है, खाद-पानी दी है, चमचागिरी और पब्लिक रिलेशन के दम पर जहां लोग हमारी भाषा के महत्‍वपूर्ण कवि होते हैं, जहां नाम और पुरस्‍कारों की सेटिंग होती है, जात-बिरादरी में ब्‍याह के लिए लड़की खोजी जाती है, ब्राम्‍हण होने का दंभ पाला जाता है। शांता वाली कविता अच्‍छी है, लेकिन मैं पूछता हूं/पूछती हूं, हजारों साल पहले पैदा हुए राम की संवेदनशीलता को, जेंडर कॉन्‍शसनेस को गरियाने वाले इन आधुनिक कवियों की संवेदनशीलता के बारे में आपका क्‍या ख्‍याल है। सिर्फ बोधिसत्‍व ही नहीं, हिंदी कवि-लेखकों की पूरी की पूरी फौज के बारे में। किसी औरत को देखते ही जिनकी लार टपकने लगती है, उसकी कविता-कहानी छपवाने और साहित्‍य की दुनिया में उसका नाम करने के लिए बेचैन होने लगते हैं। एक बार अपनी आत्‍मा में झांककर देखें, स्त्रियों के प्रति खुद कितने स्‍वस्‍थ और संवेदनशील हैं, ये हिंदी के आधुनिक कविगण। अभय जी, माफ कीजिए, मैं आपको ज्‍यादा नहीं जानता/जानती, लेकिन इन लेखक आत्‍माओं को खूब जानता/जानती हूं। मुझे दुख है, अपनी भाषा के लिए, उन सारे विचारों और साहित्‍य के लिए जो मेरी भाषा में सृजित किया जा रहा है, उस पूरी परंपरा और इतिहास के लिए, जिसने बोधिसत्‍व जैसे हजारों लोग पैदा किए, अपने देश की उन तमाम स्त्रियों के लिए, जिनके बारे में कविता लिखने का दावा करने वाले एकांत में उनके साथ काल्‍पनिक संभोग करते हैं। मैं शोकसंतप्‍त हूं, आप भी इस शोक में भागी होइए।

mahashakti ने कहा…

स्‍वागत है।

अपने जनपद इलाहाबाद के बारे में पढ़ कर अच्‍छा लगा।

अभय तिवारी ने कहा…

प्रिय बेनाम.. हिन्दी परम्परा के विषय में आप के जो विचार हैं उस से मुझे कोइ गुरेज़ नहीं पर बोधिसत्व के बारे में आपने जो निजी टिप्पणी की है वो नितान्त अनावश्यक है.. कवि अपने समाज के विरोधाभासों और विसंगतियों का उतना ही विक्टिम होता है जितना कि कोई और.. उस से संत होने की उम्मीद करना दुराग्रह है..और कवि की गुणवत्ता का आकलन उसकी कविता से ही किया जाय तो बेहतर है.. मैं ये कहकर किसी पाखण्डी जीवन का अनुमोदन नहीं कर रहा .. लेकिन पाखण्ड के बेबुनियाद आरोप और इस प्रकार का कीचमर्दन साहित्य की किसी श्रेणी में नहीं गिने जाते.. ऐसे बातों के लिये किसी और मंच को तलाशें..

प्रिय प्रमेन्द्र.. मुझे ये कहते हुये अजीब सा लगता है कि जिस वर्ष तुम्हार जन्म हुआ उस वर्ष मैं उसी अर्थ शास्त्र विभाग में टहला करता था.. जहाँ बाद में तुम कूदे फाँदे.. अगली दफ़े जब इलाहाबाद आउँगा तो तुम्हारी रैगिंग करूंगा.. तुम्हारा सुपर सीनियर जो हूँ.. :)

saima ने कहा…

Bodhisatva ek ghatiya kavi.Moolatah pongapanthi.Maulikata se koson door.Jodtodkar akvita kee duniya mein.Inko jyada munh mat lagaiye.Inka sahityakarm Ashok Vajpayi,Swargiya SPM,aur DeviP Misraon ke ird gird.Sawdhan sawadhaaan!

बेनामी ने कहा…

Kya yah sanyog hai ki Bodhisatva kaa naam Akhilesh Mishra aur aapka naam Ambhay Tiwari:Mishra-Tiwari ki sangati mein Vinay-Patrika ya Nirmal-Anand.Ha ha ha jab bhi milo sukul se,hanso!kyonki tum bhi sukul ho.Rahi baat Ramjatan Sukul kee, to unke blog ka pata hai-www.om-shanti.blogspot.com

बेनामी ने कहा…

अभय जी, अगर मेरी टिप्‍पणियों से आपको दुख पहुंचा तो माफी चाहता हूं/चाहती हूं। हिंदी की इस स्थिति से आपकी निजी तौर पर सहमति है, जानकर कुछ राहत म‍हसूस हुई। जैसाकि मैंने बाद में भी कहा, मैं बोधिसत्‍व जी को निजी तौर पर इसके लिए जिम्‍मेदार नहीं मानता/मानती, और न ही एक कीच भरे समाज में कवि से संत होने की कोई उम्‍मीद ही पाल रहा हूं/रही हूं। लेकिन कोई अगर खुद ही अपने संत होने, महान संवेदनशील होने का दावा करने लगे, तो आप क्‍या करेंगे। राम की जेंडर कॉन्‍शसनेस पर सवाल उठाएगा तो आप नहीं कहेंगे, कि पहले अपनी देखो, फिर उनको गरियाना। हम सब उसी देश-काल की उपज हैं, इससे किसे इनकार है। फिलहाल ये भी तो सवाल हैं, और बहुत गहरे सवाल हैं। हिंदी के समस्‍त कविगण पुरस्‍कार, फैलोशिप, विदेश यात्राओं, महिलाओं को कवि-साहित्‍यकार बनवाने, हंस में उनकी कविता छपवाकर उन्‍हें उपकृत करने, मिश्र जी के चरण स्‍पर्श की रैकेटरिंग, मार्केटिंग में संलग्‍न हैं...... रहें। आपकी भाषा के इतिहास में ये सारी बातें दर्ज हो रही हैं। अपने समय से तो इन्‍होंने मुंह चुरा लिया, पुरस्‍कार बटोरते, हिंदी के प्रतिष्ठित कवि का दर्जा भी पा गए, लेकिन इतिहास से कैसे मुंह चुराएंगे। मैं पुन: कह रहा हूं/ रही हूं कि इन बातों को दुख तंत्र के लेखक पर व्‍यक्तिगत आक्षेप की तरह न लें। ये बात अलग है कि उनका दुख तंत्र बहुत नकली है। लेकिन ये कुछ ज्‍यादा बड़े सवाल हैं। आपकी निजी पीड़ा के लिए माफी चाहता हूं/ चाहती हूं।

धुरविरोधी ने कहा…

स्वागत है बोधिसत्व जी का इस चिठ्ठा कारी की दुनिया में.

अनूप शुक्ल ने कहा…

स्वागत है बोधिसत्वजी का!

महावीर ने कहा…

निर्मल-आनन्द पर श्री अखिलेश जी का परिचय देने के लिए धन्यवाद!
विनय-पत्रिका तो हिन्दी ब्लॉग-जगत के लिए सुंदर उपहार है।
आपने अपनी पसंद की अखिलेश 'बोधिसत्व' जी की जो कविता दी है, वह पाठकों के हृदयों को छू लेने में पूर्णतया सक्षम है।
बड़े सुंदर ढंग से परिचय देने के लिए एक बार फिर धन्यवाद।
महावीर शर्मा

Tarun ने कहा…

इसी पोस्ट से पता चला कि मुंबई साहित्य विरोधी है

Tarun ने कहा…

शांता वाली कविता आज ही पढ़ी, मुझे ऐसा कुछ तो नही लगा उसमें कि किसी को बुरा कहा हो, वैसे अपने को कविता की समझ बिल्कुल नही है। लेकिन शायद वो शांता का सच आज भी अपने देश में विधमान है जहाँ अभी भी कई लोग लड़की को बदनसीबी से ज्यादा कुछ नही मानते, कुछ कोख में ही मरवा डालते हैं।

प्रियंकर ने कहा…

भाई बोधिसत्त्व का स्वागत है.पर उनका ऐसा माल्यार्पण होगा अंदाज़ा नहीं था . लगता है उनके साथी-संगाथी और समकालीन/सहपाठी पहले से मौज़ूद हैं यहां .

Bodhi ने कहा…

मुझे लग रहा है कि मेर ब्लॉग-प्रवेश से कुछ को बेहद तकलीफ है,पर भाई अभी तो मैं आ गया हूँ और बैरंग लौटने का फिलहाल कोई इरादा नहीं है....मुझे भी रहने दो।
अभय का आभारी हूँ वे मुंबई में मुझ डूबते के लिए जलयान की तरह मिले....तिवारी और मिश्र का सवाल उठाकर बेनाम लोग अपनी जात और बौद्धिक औकात दिखा रहे हैं। क्या बेनाम हिंदी साहित्य का इतिहास जातिगत आधारों पर लिखना बनाना चाहता है.क्या मैं अपने घर में रखी पंडित और आचार्य नामों वाले तमाम लेखकों की किताबों को बेनाम की जातीय कुंठा भरी बातों से सहम कर हटा दूँ । क्या पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी और आचार्य राम चंद्र शुक्ल को आग लगा दूँ,बेनाम से पूछना चाहूँगा कि आखिर भारत के इतिहास में आज तक किसी भी हिंदी कवि लेखक पर किसी भी औरत के साथ बलात्कार का कोई आरोप क्यों नहीं है.और लार टपकाऊ लेखकों के पास ये औरतें जाती ही क्यों हैं और आप भी ऐसे लेखकों के खिलाफ अब तक चुप क्यों थे.जहाँ तक मुझे याद है मैने किसी औरत के साथ कोई असंवेदनशील व्यवहार नहीं किया है...
बेनाम से एक और निवेदन है...आप अपना परिचय न दें चलेगा...लेकिन अपना लिंग निर्धारण तो कर लें , देखिये इतना कुछ लिख रहा हूँ पर यह तय नहीं कर पा रहा हूँ कि आप आज के वैज्ञानिक युग में भी उभयलिंगी जीवन क्यों जी रहे या रही हैं....एक से छुटकारा पाकर अपनी कुंठाओं को थोड़ा तो कम कर ही सकते या सकती हैं ..
सायमा से इतना ही निवेदन है कि वे मुझे सिर्फ यह बता दें कि मेरी किस कविता के आधार पर मुझे घटियाँ और पोंगोपंथी कह रही हैं या ....अशोक वाजपेय़ी के साथ मै काम करता था, स्वर्गीय (एसपीएम)सत्य प्रकाश मिश्र मेरे गुरु थे आपका सौभाग्य होता कि आप को सत्य प्रकाश जैसे गुरु मिले होते,और देवी प्रासाद मिश्र से मेरा बस नमस्कार तक का ही संबंध है....हो सके तो आप अपने दुराग्रहों से सावधान रहे.....मुझसे भी रहें चलेगा.
प्रमोद भाई के सुझाव का स्वागत है....पर इस पर अभय कुछ लिख तो रहे थे.....
अंत में भाइयों बहनों और उभय लिंगियों......गप्प और छीछालेदर की कोशिश से हरगिज बचें....बहुत थूकने से जीभ अकड़ जाती है स्वाद और संवाद दोनो का मजा किरकिरा होता है... और जिस काम में मजा नहीं उसको करने का फायदा क्या

बेनामी ने कहा…

बोधि जी, अच्‍छा ही हुआ, आपने टिप्‍पणियों का जवाब दिया। जो जानते हैं, वो तो जानते ही हैं। न जानने वालों को अपने आप जवाब मिल गया। टिप्‍पणियों का आपने जो अर्थ समझा और जिस भाषा और अंदाज में उसका जवाब दिया, उसके बाद कुछ और बोलने की जरूरत ही नहीं रह जाती। वैसे मुबारक हो कि किसी हिंदी लेखक पर आज तक किसी महिला के साथ बलात्‍कार का आरोप नहीं लगा है। कितनी महान उपलब्धि है, प्रशस्ति पत्र बनवाकर ड्राइंग रूम में सजा लीजिए और हिंदी के अन्‍य लेखकों के घर भी भिजवा दीजिए। मेरे उभयलिंगी होने की चिंता आप न कीजिए। फिलहाल प्रशस्ति पत्र पर विचार कीजिए।

mahashakti ने कहा…

अभय तिवारी ने कहा...

प्रिय प्रमेन्द्र.. मुझे ये कहते हुये अजीब सा लगता है कि जिस वर्ष तुम्हार जन्म हुआ उस वर्ष मैं उसी अर्थ शास्त्र विभाग में टहला करता था.. जहाँ बाद में तुम कूदे फाँदे.. अगली दफ़े जब इलाहाबाद आउँगा तो तुम्हारी रैगिंग करूंगा.. तुम्हारा सुपर सीनियर जो हूँ.. :)


जरूर आपका हार्दिक स्‍वागत है। आपसे मिलकर काफी अच्‍छा लगेगा कि कोई इतना वुराना साथी जिस बेंच पर बैठकर प्‍ढा था मै भी उसी पर बैठ कर कभी अध्ययन किया हूँ।
भूलियेगा मत :)

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