रविवार, 18 मार्च 2007

ऋ से रिशि या ऋ से रुषि?

ऋ का सही उच्चारण आखिर क्या है.. यदि आप मेरी तरह उत्तर भारत से हैं तो आप इस अक्षर को रि की तरह पढ़ने के आदी हैं..और ऋषि को रिशि या रिसि उच्चारित करते हैं... (ष का मूर्धन्य उच्चारण हम आम तौर पर नहीं करते हैं, मेरी अपनी स्मृति में एक वरिष्ठ मित्र चितरंजन सिंह के सिवा मैंने किसी को ष का इतना साफ़ और सही उच्चारण करते नहीं सुना) इसके विपरीत महाराष्ट्र में इस ऋ अक्षर को रु की तरह उच्चारित करने की परिपाटी है.. ऋषि को रुशि..या रुषि...

तो कृति को क्रिति उच्चारित करें या क्रुति ?
ऋतु को रितु या रुतु ?
गृह को ग्रिह या ग्रुह ?

अब एक उत्तर भारतीय होने के नाते मैं अपने उच्चारण के पक्ष में अपभ्रंश या लोक भाषा के इस्तेमाल की दलीलें दे सकता हूँ..कि गृहस्थी लोक भाषा में गिरस्थी बन जाती है.. या मातृ बिगड़कर माई होता है.. भातृ भाई बन जाता है.. लेकिन महाराष्ट्र में मातृ माऊ भले ना हुआ हो पर भातृ भाऊ हो गया है.. इस विषय पर संस्कृत के अनेक ग्रंथों के रचयिता और वेदों के भाष्यकार श्रीपाद दामोदर सातवलेकर जी का मत जानने योग्य है..

स्वर उसको कहते हैं, जो एक ही आवाज़ में बहुत देर तक बोला जा सके- जैसे..

अ..आ.. इ..ई.. उ..ऊ.. ऋ..ॠ.. लॄ..लॄ..
(
आखिरी दो स्वरों की चर्चा यहाँ नहीं कर रहा हूँ)


उत्तर भारत के लोग इनका (ऋ का) उच्चारण "री " करते, यह बहुत ही अशुद्ध है। कभी ऐसा उच्चारण नहीं करना चाहिये। "री" में र ई ऐसे दो वर्ण मूर्धा और तालु स्थान के हैं। "ऋ" यह केवल मूर्धा स्थान का शुद्ध स्वर है। केवल मूर्धा स्थान के शुद्ध स्वर का उच्चारण मूर्धा और तालु स्थान दो वर्ण मिलाकर करना अशुद्ध है और उच्चारण की दृष्टि से बड़ी भारी ग़लती है।

ऋ का उच्चारण - धर्म शब्द बहुत लम्बा बोला जाय और ध और म के बीच का रकार बहुत बार बोला जाय तो उसमें से एक रकार के आधे के बराबर है। इस प्रकार जो ऋ बोला जा सकता है, वह एक जैसा लम्बा बोला जा सकता है। छोटे लड़के आनन्द से अपनी जिह्वा को हिला कर इस प्रकार ऋकार बोलते हैं। (स्कूटर या बाइक चलाने का अभिनय करते हुए..vrooom जैसी कुछ ध्वनि)

जो लोग इसका उच्चारण री करते हैं, उनको ध्यान देना चाहिये कि री लम्बी बोलने पर केवल ई लम्बी रहती है। जो कि तालु स्थान की है। इस प्रकार ऋ का यह री उच्चारण सर्वथैव अशुद्ध है। पूर्व स्थान में कहा गया कि जिनका लम्बा उच्चारण हो सकता है, वे स्वर कहलाते हैं। गवैये लोग स्वरों का ही आलाप कर सकते हैं व्यञ्जनों का नहीं, क्योंकि व्यञ्जनों का लम्बा उच्चारण नहीं होता।

सातवलेकर जी की यह शिक्षा उनकी "संस्कृत स्वयं शिक्षक" नामक पुस्तक से उद्धृत है.. जिसको पढ़ने के बाद मैं वर्षों के अभ्यास के कारण बोलता अभी भी रिशि ही हूँ .. पर हर बार यह स्मरण करते हुये कि मैं ग़लत बोल रहा हूँ।

6 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

अभय भाई
जानकर ख़ुशी हुई कि फ़ारसी के बाद अब आप संस्कृत (संस्क्रूत)पर भी हाथ आज़मा रहे हैं. लिंग्विस्टिक्स जिसका 'लिंग' भी मैं नहीं जानता,मेरा प्रिय विषय है. बहरहाल, अच्छा लगा पढ़कर.
अनामदास

संजय बेंगाणी ने कहा…

"स्वर उसको कहते हैं, जो एक ही आवाज़ में बहुत देर तक बोला जा सके"

यह सिद्धांत जानकर अच्छा लगा.


कभी ऋ का सही उच्चारण रिकोर्ड कर नेट पर रखें ताकि पता चल सके.

ravish ने कहा…

निर्मल जी
मैं भी ठीक नहीं बोल पाया । रिशि ही निकल रहा है । क्या किया जाए । पर इन मुद्दों पर और लिखिये । मैं जानना चाहता हूं । अच्छा प्रयास है ।
ष का क्या हो इसके बारे में भी लिखिये ।
रवीश कुमार
कस्बा से

अजित वडनेरकर ने कहा…

अच्छा विमर्श है अभय जी।
वैसे रि और रू दोनों ही ध्वनियां सही हैं, ऐसा मैने पढ़ा है। मराठीभाषी होने के नाते ऋ के रू उच्चारण से तो मैं यूं भी परिचित हूं मगर उत्तर भारतीय रि भी सही जान पड़ती है।

Pratik ने कहा…

काफ़ी पहले मैंने किसी संस्कृतज्ञ विद्वान की एक किताब पढ़ी थी। उसमें उन्होंने कई युक्तियों से सिद्ध किया था कि ऋ का उच्चारण "र्" है यानी कि आधा र।

बेनामी ने कहा…

हुम्,"स्वर उसको कहते हैं, जो एक ही आवाज़ में बहुत देर तक बोला जा सके" इस सिद्धान्त पर सहमति नहीं है | वस्तुतः सस्कृत व्याकरण के अनुसार "स्वयं राजन्ते इति स्वराः" जो किसी अन्य वर्ण की सहायता के विना बोले जा सकते हैं वे स्वर हैंं |

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