मंगलवार, 20 मार्च 2007

दौड़कर पहुँचा चालीस से चौदह में..!

..उसने सिगरेट का एक गहरा कश खींच कर ढेर सारा धुआँ उगल दिया..
..फिर कुछ सोचते हुये धुयें के छल्ले बनाने लगा..
...पुल की तरफ़ एक आखिरी निगाह फेंककर उसने सिगरेट को जूते के नीचे मसला और मुड़कर जगत की साथ चला गया... चलते चलते ही विक्रान्त ने ट्रिपल फ़ाइव के पैक से एक और सिगरेट निकाली और होठों से लगा ली..

ऐसे न जाने कितने रूमानी वाक्यों की स्मृति मेरे दिमागों में बस चुकी थी जब मैंने १७ की उमर में सिगरेट पीना शुरु की...पापा नहीं पीते थे..फिर भी तनाव में रहते थे.. मामाजी पीते थे.. और मस्त रहते थे.. ऐसे मामूली तथ्य की भी शायद कुछ भूमिका रही हो.. पहले भाईसाब ने पीना शुरु किया.. हमारे लिये तो वो मस्ती और आज़ादी का पर्याय थे.. उनको पीते देख कर भी कभी मन नहीं मचला जब तक कि घर नहीं छोड़ा.. हॉस्टल की दुनिया की आज़ादी में आते ही पहले ही हफ़्ते में सिगरेट का आस्वादन कर लिया.. सिगरेट थी विल्स फ़िल्टर और क़ीमत थी शायद तीस पैसे.. अब तीन रुपये की मिलती है.. २३ साल में दस गुना वृद्धि..!

खैर.. पहला अनुभव कड़वा था.. आँखों से पानी आ गया.. साँसों में भारीपन.. और सर चकराया.. लेकिन इस कमज़ोरी को मैंने अपनी कमी समझा होगा.. जो सिगरेट की आज़ादी को सम्हाल नहीं पाई...तो पीता गया और पीता गया.. २३ साल तक पीता रहा..फिर पिछले हफ़्ते डॉक्टर ने धमकाया कि पेट का जटिल रोग कभी ठीक ना होगा अगर आप ऐसे ही असहयोग करते रहेंगे.. ये धमकी मुझे १२ मार्च को मिली.. घबरा कर मैंने धीरे धीरे छोड़ने की बात सोची.. और एक डायरी में हर पी जाने वाली सिगरेट को दर्ज करने लगा.. १३ तारीख को मैंने ग्यारह बार सिगरेट पी..आधी पूरी मिलाकर कुल साढ़े आठ.. १४ तारीख को आठ बार सिगरेट पी और आधी पूरी मिलाकर कुल छै.. १५ तारीख को मैंने तीन बार सिगरेट पी.. आधी पूरी मिलाकर कुल डेढ़...आज २० तारीख है.. मुझे पाँच दिन हो गये सिगरेट पिये हुये.. १५ तारीख को शाम पाँच बजे के बाद मैंने सिगरेट हाथ में भी नहीं ली है.. हाँ.. एक पेंसिल ज़रूर है जो हाथ और होठों पर खेलती रहती है..
डर के ही सही पर बिना किसी बाहरी दबाव के मैंने सिगरेट छोड़ दी है.. मेरे एक मित्र , जिन्हे सिगरेट छोड़े चार साल हो गये हैं, कहते हैं कि निकोटीन शरीर में ७२ घंटे तक रहता है.. और जब तक रहता है वह अपनी आपूर्ति के लिये शरीर को मजबूर करता है.. उसके बाद शरीर मुक्त हो चुका होता है.. मन में स्मृतियां हो सकती हैं सिगरेट की रूमानियत की..जो शहरी जीवन के खालीपन को भरने का एक ज़रिया भी तो बनती है.. कुछ नहीं करते हुये कम से कम आप धुआँ फूंकने का मुग़ाल्ता तो पाले रह सकते हैं.. मैंने ये मुग़ाल्ता छोड़ दिया.. अब जो चाहे उसे पाल सकता है.. अब मेरे अन्दर एक नई ऊर्जा है..मैं घर से कम निकलता हूँ.. कल जब निकला तो मुझे लगा कि मैं सड़क पर चल क्यों रहा हूँ.. मुझे दौड़ना चाहिये.. और मैं दौड़ने लगा.. ये भूल कर कि मैंने कुछ ही देर पहले खाना खाया है.. दौड़ते दौड़ते मुझे लगने लगा कि मेरे अन्दर एक चौदह बरस का बालक घुस गया है..बालकों की आदत होती है.. वो कहीं चल के नहीं जाते.. वो जहाँ जाते हैं दौड़ के जाते हैं.. मैं अपने आप से खुश हूँ.. मगर मेरे सारे वो मित्र जो सिगरेट पीते हैं .. मेरे इस उत्साह को देखकर बहुत खिसिया रहे हैं, खौरिया रहे हैं.. और मुझे कभी एक जगह से दूसरी जगह के बीच दौड़ के आते जाते समय पकड़ के कूटने की योजनाय़ें बना रहे हैं.. पर वे भूल रहे हैं.. कि वो चालीस के पार के हैं..उनके फेफड़ों में दम नहीं और मैं चौदह का हूँ.. उनको देखते ही दौड़ जाऊंगा..

9 टिप्‍पणियां:

Pramod Singh ने कहा…

तुम्‍हें कूटने की सोचा ही नहीं जायेगा, कूटा भी जायेगा। रवीश ने ऑलरेडी दिल्‍ली से गुंडे भेज दिये है, और मैं यहां बंबई में फेफड़ों में ताकत भरने की कोशिश में लगा हूं।

अविनाश ने कहा…

बहुत ख़ूब। आपके लिखने का अंदाज़ निराला है। हसरत करने लायक वाक्‍य विन्‍यास और प्रवाह। पर सबसे उम्‍दा, जो बात आप कहते हैं। सिगरेट मैंने ख़ूब पी है, और शराब भी। पर कभी एडिक्‍ट नहीं रहा। एडिक्‍शन की जो अपनी रूमानियत है, कभी उस पर लिखना चाहिए आपको। और उससे बाहर आने के बाद खालीपन और उमंग की जो कश्‍मकश है, उस पर भी कलम चलानी चाहिए। आमीन।

Pratyaksha ने कहा…

बहत्तर घंटे के बाद निकोटीन आपको अपनी माँग से मुक्त नहीं करता । इस मुगालते में न रहिये । कभी कभार क्यों कई बार ये कई महीनों बाद भी धर दबोचता है , दबे पाँव मौके को तलाशते हुये ,अचानक ।
(चौदह साला आहलाद बढिया चित्रित किया है ।)

बेनामी ने कहा…

मुबारक हो अभय, 14 साल का होने के लिए। आप तो मुझसे भी छोटे हो गए। बहुत सुंदर लिखा है।
मनीषा

आशीष श्रीवास्तव ने कहा…

अभय जी ,
बधाई इस निर्णय के लिये। हम उम्मीद करेंगे की आप इस निश्चय पर दृढ़ रहेंगे !

प्रियंकर ने कहा…

"संकल्प किया, दृढ़ उस पर नहीं रहे
तो सूर्य हवा जल तुम पर व्यर्थ बहे!"
- भवानी भाई

आशा करता हूं संकल्प मजबूत होगा और आप मार्क ट्वेन की तरह यह नहीं कहेंगे कि सिगरेट छोड़ना बहुत आसान काम है मैं सैकड़ों बार छोड़ चुका हूं .

manya ने कहा…

आपने लिखा अच्छा है.. निर्णय भी अच्छा लिया है.. बस इसे निभाइये और १४ साल के बने रहिये.. :)

SANJAY ने कहा…

Very Good Bhaiya!
You inspire me now like i had inspired you many many moons ago.

sanjay t. [ Bhaisaab mentioned in above account]

उडन तश्तरी ने कहा…

बढ़िया है. बधाई. मैं भी २२/२३ साल लगातार इस लत में पड़कर विगत तीन वर्षों से दूर हूँ. कभी तलब भी नहीं होती बल्कि अब नजदीक कोई सिगरेट पीता है तो तकलीफ जरुर होती है. :)

-बस अपने निश्चय पर अडिग रहें, शुभकामना.

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