गुरुवार, 22 मार्च 2007

पत्रकार ब्लॉगर और कान्सपिरेसी थ्योरी

अपने ब्लॉग पर बेजी ने पत्रकारों के ब्लॉगर बनने पर हैरानी ज़ाहिर की है और अपने संशयों को ज़बान दी है.. बेजी एक बहुत ही समझदार महिला हैं और मैं उनका बहुत सम्मान करता हूँ.. इसीलिये उनके शंकाओं को पूरी गम्भीरता से लेते हुये मैंने उनके ब्लॉग पर प्रतिक्रिया भी लिखी.. उसी प्रतिक्रिया को थोड़े से फेर बदल के साथ यहाँ चिपका रहा हूँ..


हो सकता है मेरी राय प्रमोद भाई से मेल खाये..क्योंकि वो मेरे दोस्त हैं और कई मसले ऐसे हैं जिस पर हम एक तरह से सोचते हैं और कई मसले ऐसे भी हैं जिस पर हमारी राय मुख्तलिफ़ हैं.. फिर रवीश कुमार से मेरा परिचय तक नहीं .. लेकिन उनके ज़्यादातर विचारों से मैं बराबर सहमत होता हूँ.. अविनाश से एक दफ़ा मिला हूँ.. पर उनसे कई मामलों में असहमतियां हो सकती हैं.. और बहुत सारी सहमति भी...लेकिन इस सहमति में कोई योजना नहीं है.. माफ़ करें बेजी पर आपकी बातों से कॉन्सपिरेसी थ्योरी की बू आ रही है.. मैं कॉन्सपिरेसी थ्योरी के खिलाफ़ नहीं हूँ.. कई जगह ऐसी है जहां पर लगातार कॉन्सपिरेसी होती रहती है हमारे खिलाफ़ पर हम चूँ तक नहीं करते.. राजनीति, व्यापार, बाज़ार, विज्ञापन.. संगठित तौर पर दूसरे लोगों को मूर्ख बना रहे हैं.. सब एक स्तर पर कॉन्सपिरेसी हैं.. कभी हमारा वोट लेने की.. कभी हमारी जेब काटने की.. कभी हमारे मनोजगत पर कब्ज़ा करने की.. ताकि उसे एक खास दिशा में मोड़ा जा सके.. इसलिये नहीं कि वही साध्य है..बल्कि इसलिये कि वो सिर्फ़ साधन है अपना माल बेचने का.. अगर मैं आपसे साम्प्रदायिकता पर बहस करूँगा तो इसलिये कि मैं आपकी राय इसी मसले पर बदलना चाह्ता हूँ.. लेकिन जब एक विज्ञापन में एक मुसलमान इस देश का नमक खाने की बात करता है तो वह इस बात का इस्तेमाल कर रहा है.. नमक बेचने के लिये.. ये कॉन्सपिरेसी है.. अगर मैं आपसे कहूँ कि ९/११ किसी आतंकवादी ने नहीं खुद अमेरिका ने योजना के तहत अंजाम दिया.. तो आप यक़ीन न कर पायेंगी.. जबकि वहाँ आपको हर किस्म की गंदी से गंदी कुचाल की कल्पना के लिये तैयार रहना चाहिये.. दुनिया के सबसे शातिर लोग सबसे ताक़तवर और खतरनाक खेल को खेल रहे हैं और हम उनसे नैतिक और मानवीय मूल्यों की उमीद करते हैं..और दूसरी ओर कुछ सामाजिक सरोकारों वाले लोग जो अखबारी दुनिया में आये तो थे अपने कुछ सरोकारों को ज़बान देने अपनी बात कहने के लिये मगर जिनके मुँह पर पट्टियां बाँध दी गईं हैं ताकि वो अपनी बात न कह सके.. और उन्हे आगे खड़ा कर के पीछे से बाज़ार अपनी बातों का टेप चला रहा है.. ये पत्रकार बाज़ार के द्वारा सताये गये हैं इसी लिये एक मंच मिलने पर ज़ोर ज़ोर से अपनी बात कह रहे हैं.. मैं पत्रकार नहीं हूं... पर मेरा दर्द भी लगभग वैसा ही है.. टेलेविज़न सीरियल्स की दुनिया के नियम कुछ अलग नहीं हैं..

2 टिप्‍पणियां:

Pramod Singh ने कहा…

अभय जी,
सदुपदेश के लिए आप यहां राह तकने की बजाय अज़दक जाएं, और अपनी सदिच्‍छायें दर्ज़ करें. सत्‍यनारायण की कथा आज वहां चल रही है.

ज्ञानदत्त पाण्डेय ने कहा…

अरे, पत्रकार लोग बाजार के सताये हैं - मैं तो समझता था कि वे लोग बाजार के क्रियेटर है. अखबार तो चबड़ चबड़ बोलता है. पत्रकार लोगों के मुंह पर पट्टियां हैं तो वहां चबड़ चबड़ (यानी आधी अधूरी जानकारी पर अथारिटेटिव बातचीत) कौन करता है?
... मैं तो पत्रकारों के गोल को बडा़ दम्भी समझता था. अच्छा हुआ आपको पढ़ा.

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