शनिवार, 26 मई 2007

आइये करें 'अच्छी-अच्छी बातें'

"पंडिज्जी, आपको क्या हो रहा है, बिल्लू और गोलाइयों से दाल-भात में घुस जाते हैं। फिर घी का छौंक लगाकर कुछ बापू आसाराम की प्रवचनाईयों में घुस जाते हैं। प्लीज कुछ इंटरेस्टिंग सी घटिया बातें करें , अच्छी-अच्छी बातें तो हम श्रद्धा, आस्था चैनल पर सुन ही रहे हैं ना।"

'बस करुणा' पर आई बेनाम की इस टिप्पणी से मुझे लगा कि शायद मुझे अपनी बात को और सफ़ाई से कहने की ज़रूरत है.. और जवाब इतना लम्बा भी हो गया कि उसे अलग से एक प्रविष्टि के तौर पर छाप रहा हूँ..

मित्र बेनाम आप चाहते हैं कि मैं अच्छी-अच्छी बातों को ऐसे बहरुपियों के हवाले कर के छोड़ दूँ.. जो तरह तरह के भेस बना कर अपने भक्तों को महापुरुषों की झांकी दिखाते हैं.. और जिसके फलस्वरुप हमारे देश की आशु-आहत जनता कई रोज़ तक एक प्रदेश को हिलाये रखती है.. ऐसे ही लोग आश्रमों के नाम पर ज़मीन हड़पते हैं और फिर ऐसे घोटालों का समाचार भी दबवा देते हैं.. भक्ति योग के प्रवचन देते हैं, जगतगुरु कहलाते हैं और बलात्कार के आरोप में त्रिनिदाद में पकड़े जाते हैं.. ऐसी महापुरुषों के श्री मुख से अच्छी-अच्छी बातों को सुनने से अच्छा है.. हम आप ही उसकी आपस में चर्चा करें.. हमें पता है कि न आप महापुरुष है न मैं.. तो हम बात को उसके तत्व से तौलेंगे.. बोलने वाले के क़द से नहीं..

मेरा सुझाव है कि आप भी कुछ गोलाइयों जैसी घटिया बातों के साथ साथ कुछ अच्छी अच्छी बाते भी करें.. देश तो दलालों के हाथ जा ही चुका है.. संसद(सत्ता) में प्रवेश करने का रास्ता बन्दूक की नली से हो के जाता है.. चेयरमैन माओ की इस बात को आजकल सभी लोग मानते हैं.. धर्म का ठेका मवालियों के हाथ में है.. नैतिकता पाखण्डियों की रखैल है.. कलाकार सनसनी बेचकर बिक जाने वालों का दूसरा नाम है.. और आम आदमी आम खाने लायक भी नहीं रह गया है.. आप मुझसे क्या उम्मीद करते हैं.. मैं हमेशा अपना संतुलन बनाये रखूँ और एक ही सुर में बात करूँ? ..मैं आपको बरदाश्त करने की करुणा अपने भीतर जगाना चाहता हूँ.. आप मुझे सहने की करूणा उगाइये..

शायद 'बस करूणा' में मेरी बात साफ़ तौर पर आप तक पहुँची नहीं.. मौलाना रूमी कृत मसनवी में मौजूद एक क़िस्से को वारसी बन्धुओं ने अपनी 'अल्ला हू' नामक क़व्वाली के भीतर जगह दी है.. ये अनुवाद किस शायर ने अंजाम दिया है यह जानकारी मेरे पास नहीं है..आप क़िस्से का लुत्फ़ उठाइये..

एक चरवाहा किसी जंगल में था
या महेकामिल कोई बादल में था( पूरा चाँद)


यादे मौला में हमेशा मस्त था
आस्मां उसकी ज़मीं पर बस्त था ( बसता था)


याद करते करते थक जाता था जब
काँप उठता दर्द से बाज़याफ़्ता तब(फिर से याद कर)

सर उठा कर अपना सू ए आस्मां
अर्ज़ की मालिक खुदा ए दो जहां

तू मेरी कुटिया में क्यों आता नहीं
क्या मेरा जंगल तुझे भाता नहीं

आ उतर आ अर्श से घर में मेरे(आसमां से)
पाँव धो धो कर पियूँगा मैं तेरे

रात दिन झूला झुलाउँगा तेरा
सुबह उठ कर मुँह धुलाउँगा तेरा

भीख दर दर माँग कर मैं लाउँगा
मैं तुझे पहले खिला कर खाउँगा

तो कर रहा था वो यूँ ही शोरोफ़ुगां(दुहाई)
हज़रते मूसा भी आ निकले वहाँ

डाँट कर बोले अरे बकता है क्या
नूरे मतलफ़ को मुक़य्यद कर दिया( असीम ईश्वरीय सत्ता को शर्तों में क़ैद कर दिया)

किस क़दर कमबख्त तू नादान है
क्या खुदा तेरी तरह इंसान है

तू ज़ुरूर इस कुफ़्र का फल पायेगा
गै़रत ए हक़ से अभी जल जायेगा

कर चुके मूसा जब उसको दिलहज़ीन
वहीं आई हज़रते हक़ से वहई( आकाशवाणी)

क्या किया मूसा तूने ये क्या किया
कर दिया बंदे को मौला से जुदा

तुझको भेजा जोड़ने के वास्ते
तू नहीं था तोड़ने के वास्ते

अरे होश वालों का तरीक़ा और है
दिलजलों का और ही कुछ तौर है


करुणा का अभाव मूसा जैसे ईश्वरीय संदेश के वाहक को भी बहका सकता है.. हम आप तो क्या है..

कुछ लोग का करुण भाव अपने तक ही सीमित होता है..उनके बारे में क्या कहूँ.. कुछ की करुणा सिर्फ़ सधर्मियों यानी जिनसे उनकी वैचारिक एकता है.. उनके प्रति रहती है.. शेष का वो गला काट लेना चाहते हैं.. पर वो करुणा नहीं साम्प्रदायिकता है.. विधर्मियों के प्रति, जिनसे आपका वैचारिक वैषम्य है.. उनके प्रति करुणा ही सच्ची करुणा है.. उनके साथ एकता के सूत्र जोड़ पाना ही सच्चा धर्म..

8 टिप्‍पणियां:

काकेश ने कहा…

आप भई घटिया बात करें या अच्छी हम तो हाजरी लगाने आयेंगे ही ...और जब जैसा मन होगा बोलेंगे भी ...अब ये आप को आपको बेनाम पाठक को बुरा लगे तो लगे....

dhurvirodhi ने कहा…

अभय जी; कुछ तो लोग कहेंगे, जाने दीजिये (वैसे आधे बेनाम तो हम भी हैं चलो आज आपको गरिया लें)
आपका पहले यहां प्यारा सा राजा बबुआ जैसा फोटो हुआ करता था पर अब ये हालिया सूरत! ये क्या हाल बना रखा है भाई?

क्या मुम्बई का पानी इता बेकार है?

अतुल शर्मा ने कहा…

किस्सा हमने अपने पास लिख लिया है। लोगों की क्या कहें? आप लिखे हम पढ़ते जाएँगे।
हाँ हाल की सूरत से तो हम डर ही गए थे। ये क्या हालत बना रखी है :)

Sanjeeva Tiwari ने कहा…

वाह ! क्या खूब ! तिवारी जी, लिखते रहे . . . .
सन्जीव, तिवारी वाद का एक सदस्य

Nasiruddin ने कहा…

अभय जी अद्भुत कविता है। अनुवाद जिसका भी है लाजवाब है। इस कविता के बाद किसी टिप्पणी की गुंजाइश नहीं बचती। हां... अगर इससे हम थोडी सीख ले लें तो ...

Bodhi ने कहा…

soorat par na jao bhayi sirat par hi raho achcha rahega.
bhayi mera ek nivedan pahle hi din se kar aur kah raha hoon ki benam ko bhool jao aur ye man lo ki vo hai hi nahin.
rahi karuna ki bat to hinsa ke bajar me karuna ki bat kuch longo ko betuki lag sakti hai
aise longo ka kya karege. behatar hai ki bach bacha ke nikal liya jaye
kabir ya rahim ko yad karte huye\
kah rahim kaise nibhe ber-ker ko sang
ve dolat ras aapno unake fatht ang
bhayi
aap ko padha kar humesha kuch naya milta hai lage rahe aur
date rahen bas

Tarun ने कहा…

अब किस ने क्या कहा हमें तो नही पता लेकिन आप ये गीत सुनिये - कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना, छोड़ो बेकार की बातों में कहीं...

Farid Khan ने कहा…

"हम बातों को उसके तत्व से तौलेंगे व्यक्ति के कद से नहीं ...."

आपकी इस बात से मुझे अनायास ही ये भान हुआ कि हम व्यक्ति पूजा या भक्ति करने वाले लोग हैं.

...कोई अच्छा लगता है तो उसकी हर बात अच्छी लगने लगती है...कोई बुरा लगता है तो उसकी अच्छी बातें भी हमेशा ही बुरी लगती हैं .

... भावुक लोग हैं हम लोग..और चार्ली चैपलिन के शब्दों में भावुक लोग मूर्ख होते हैं...हम परम्परागत रूप से किसी भी बात को तर्क की कसौटी पर नहीं तौलते...और भावना में बह कर कोई ना कोई ध्वंस कर बैठते हैं...

पिछले १५-१७ सालों से पूरे भारत में ही लोगों की भावानाओं को काफ़ी ठेस पहुंचने लगी है....और कितना ध्वंस हुआ और कितने लोग मारे गए ये किसी से छिपा नहीं है....व्यक्ति यदि खुद को इस स्थिति से निकालना चाहता है तो ...ये प्रयोग कारगर है.
"मै आपको सहन करने की कोशिश कर रहा हूं आप मुझे सहन करने की करुणा पैदा कीजिए."

धन्यवाद.

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