मंगलवार, 22 मई 2007

बिल्लू का बचपन ४

बिल्लू ने देखा सड़क के किनारे की ज़मीन सड़क से काफ़ी नीचे थी जैसे कोई बड़ा सा गढ्ढा हो.. और उस गढ्ढे में उनसे थोड़ी दूर पर एक औरत बैठी हुई थी.. उनकी तरफ़ पीठ करके.. बिल्लू को उसका चेहरा नहीं दिख रहा था.. पर उसके साँवले शरीर की कमर के नीचे का हिस्सा बिना कपड़ो का नंगा दिख रहा था.. बिल्लू ने ऐसा दृश्य पहले कभी नहीं देखा था..

वह एक टक उधर देखता ही रह गया..वो दो साँवली गोलाइयाँ थीं.. अगर वो लाल होतीं और उनके किनारे हरे रंग के.. तो बिल्लू समझ जाता कि वो एक बड़े तरबूज़ की कटी हुई दो फाँकें हैं जो अगल बगल रख कर आपस में किसी तरह जोड़ दी गई हैं..अगर वो उजली होती तो बिल्लू सोचता कि शायद वो कोई भूला भटका पूरा चाँद है जो भरी दोपहर में निकल आने की अपनी गलती जानकर एक औरत के लहँगे में घुसने की कोशिश में फट कर दो हो गया है.. मगर ये ना चाँद था ना तरबूज़ ये तो कुछ और था गोल चिकना मगर साँवला.. बिल्लू ने सामान्य कूल्हे खूब देखे थे.. कपड़ों से ढके छिपे..एक पूरे शरीर का हिस्सा.. उन्होने कभी बिल्लू को इस तरह मोहित नहीं किया.. इन कूल्हो में कुछ विशेष था.. ये उसे किसी शरीर का हिस्सा नहीं बल्कि अपने आप में वो एक विराट हसीन हस्ती बन कर उसके दिलोदिमाग़ पर छाते जा रहे थे.. उन गोलाइयों से बिल्लू की नज़रें हट ही नहीं रही थी.. मानों वे उम्र भर उन्ही गोलाइयों को खोज रही थीं और अपनी मंज़िल पा जाने पर अब कहीं और भटकने से उन्हे साफ़ इन्कार हो..

बिल्लू न जाने कब तक ऐसी ही खड़ा रहा.. इसी बीच उन साँवली गोलाइयों की स्वामिनी उस औरत ने अचानक मुड़कर उनकी दिशा में देखा.. और झटके से अपनी गोलाइयों को ढक दिया.. बिल्लू इस व्यवहार के लिये तैयार नहीं था.. फिर उसने सुना कि गोलाइयों को छिपा लेने वाली औरत एक ऐसी भाषा में कुछ बड़बड़ा रही है.. जो उसने पहले नहीं सुनी थी.. सुन्दर गोलाइयो वाली औरत क्रुद्ध दिख रही थी.. कुछ बात हुई थी जो उसके मन के विरुद्ध थी.. वो बिल्लू की ओर भी देख रही थी पर राजू की ओर अधिक अपना क्रोध फेंक रही थी.. बिल्लू ने देखा कि राजू हँस रहा था.. फिर अचानक मोहक गोलाइयों को छिपा लेने वाली औरत ने एक नुकीला पत्थर उठाकर राजू की तरफ़ फेंका.. बिल्लू और राजू दोनों छिटक थोड़ा दूर हट गये.. दूसरा पत्थर भी उनकी दिशा में उड़ता चला आ रहा था.. बिल्लू अपना बस्ता सँभालते हुए भागने लगा.. राजू भी भाग रहा था पर वो बस्ता नहीं अपनी पैंट की म्यानी सँभाल रहा था.. बिल्लू ने देखा कि उसने भागते भागते ही म्यानी की चेन को बंद किया.. बिल्लू को कुछ समझ नहीं आया वे भागते भागते काफ़ी दूर निकल आने के बाद ही थमे.. जब उनकी साँस फूलने लगी..राजू अभी भी हँस रहा था.. बिल्लू को समझ में नहीं आया कि हँसने की क्या बात थी.. क्या राजू उन गोलाइयों के ढक जाने से खुश था.. या उन की स्वामिनी से पत्थर खाकर उसे आनन्द आया था.. या कोई और ही वजह थी जिसे बिल्लू समझ नहीं सका..

इस घटना के बहुत दिनों बाद तक भी बिल्लू उन गोलाइयों को भुला नहीं सका.. उसे पत्थर फेंकने वाली औरत का चेहरा याद नहीं था मगर गोलाइयां किसी अनोखे आधे चाँद की तरह उसके मन के आकाश पर सर्वदा आरूढ़ रहतीं.. उसके आँखे बंद करते ही न जाने कहाँ से वो तैरती सी आ जातीं.. और ऐसे उसके मानसिक पटल पर लहराती रहती जैसे यही उनके अस्तित्व का उद्देश्य हो..

सपनों में तो और भी विकट स्थिति थी.. बिल्लू पतंग उड़ा रहा होता और उसकी पतंग का आकार उन गोलाइयों जैसा होता.. बिल्लू पतंग की डोर छोड़ने के बजाय लपेटने लगता.. जब वो नज़दीक आती तो बिल्लू को पता चलता कि वे पतंग की तरह हलकी नहीं .. उनसे भी ज़्यादा हलकी होतीं.. इतनी ज़्यादा कि उन्हे छूते ही बिल्लू सतह से उठने लगता और उठता ही जाता ऊपर.. और ऊपर.. या फिर बिल्लू इम्तिहान का परचा लिख रहा होता..और कॉपी पर शब्दों की जगह गोलाइयां आकार ले रहीं होतीं.. बिल्लू उसे रबर से मिटाने की कोशिश करता.. और रबर के बदले उसके हाथ में वो गोलाइयां आती.. उनके स्पर्श से बिल्लू एक अजीब सनसनी से ग्रस्त हो जाता.. और धीरे धीरे उनका आकार बढ़कर इतना हो जाता कि वह बिल्लू के बाज़ुओं से बाहर निकल जातीं..और बिल्लू घबरा कर उन्हे सँभालने की कोशिशें करता हुआ कक्षा के बाहर भागता..

जागृति के हादसे भी कम नहीं थे.. स्त्रियों के कूल्हे देखते ही बिल्लू के मन में बसी हुई गोलाइयां.. उन कूल्हों के ऊपर छा जातीं.. ये स्त्रियां जो बिल्लू की पड़ोस की कोई दीदी या आंटी होती.. जो एक खास सामाजिक माहौल में बिल्लू को दिखतीं मिलतीं.. बिल्लू का उनके साथ एक आदर सम्मान का रिश्ता होता.. उनके ढके छिपे कूल्हों पर बिल्लू की उन मनभावन गोलाइयों के छा जाने से बिल्लू के मानसिक जगत में बड़ा गड्ड-मड्ड होने लगता.. और न जाने क्यों इस गड्ड-मड्ड के होने के बाद मन में कहीं से एक तरल ग्लानि आ कर सब ओर फैल जाती और उन गोलाइयों के आनन्द को डुबा देती.. उनके डूब जाने से या किसी अन्य वजह से बिल्लू देर तक अपराधी महसूस करता रहता..

6 टिप्‍पणियां:

अनामदास ने कहा…

बिल्लू इसलिए परेशान हो रहा है क्योंकि वह नहीं जानता कि अब वह जवान हो रहा है. पवित्रता की हद तक सहज और सुंदर वर्णन, हम सब इस प्रक्रिया से गुज़रते हैं लेकिन ऐसे प्रीटेंड करते हैं जैसे पैदा ही ऐसे हुए थे. कमोबेश सबके देखने और सीखने की प्रक्रिया ऐसी ही होती है, लेकिन जब आप कोई ऐसी ईमानदार अभिव्यक्ति पढ़ते हैं तो आपको अपने दिन याद आ जाते हैं. न जाने कितना कुछ याद आ गया, लिखना होगा कभी.

Pramod Singh ने कहा…

कथा में मांसलता की आप ये कैसी अमूर्त छायाएं रच रहे हैं! उचित कर रहे हैं?.. निर्मलता की सीमाएं लांघ रहे हैं, या मेरा वहम मात्र है?.. बंधु, असमंजस में हूं.. और देखिए, लोग हम पर आरोप लगाते हैं कि उलझाने वाली चीज़ें लिखते हैं! यह सचपुच बिल्‍लू ही है तो! कहीं इसका वास्‍तविक नाम शेखर तो नहीं?..

अफ़लातून ने कहा…

इस मुल्क में किशोरों की यौन शिक्षा बिल्लू टाइप होती है ।

काकेश ने कहा…

आप मतलब बिल्लू को बिगाड़कर ही रहेंगे .. लेकिन अच्छी है किशोरावस्था की मानसिक उहापोह.. आप आजकल जो किताबें पढ़ रहे हैं उसके बारे में भी लिखिये समय निकालकर.

अविनाश ने कहा…

बचपन ऐसे ही जवान होता है। मासूमियत ऐसे ही सामाजिक हादसों से टकराती है। कथा और संस्‍मरण की सहजता उसकी सच्‍चाई होती है- बिल्‍लू के बचपन का विवरण अब तक सहज तरीके से दर्ज हो रहा है।

Nasiruddin ने कहा…

अभय जी, मैं बिल्लू को बढ्ते हुए देख रहा हूँ, इसलिए टिप्‍पणी से बच रहा था। लेकिन इस चरण के बाद मुझे लगा एक दो बात कहूँ। रचनाकार जब रचता है तो अभिव्यक्ति के कौन से तरीके अपनायेगा, यह उसकी अपनी खास शैली या तरीका होता है। आपका बिल्लू अपने किशोरवय मन से कैसे डील कर रहा है...यह आपकी शैली का नमूना है। इस वय को हम सबने किसी न किसी रूप में पार किया है और किसी न किसी रूप में जूझ कर आगे बढे हैं। किसी को इसमें कुछ और भी दिख सकता है। शील-अशलील की बहस का मोर्चा भी खुल सकता है। और फिर कोई फतवेबाजी... मैं डरा नहीं रहा... मैं बस सोच रहा हूँ... रचना को सीमा में बांधने वालों के बारे में... बिल्लू आगे बढता रहे यही दुआ है...

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