मंगलवार, 15 मई 2007

बिल्लू का बचपन ३


बिल्लू के पापा जी सिगरेट नहीं पीते थे.. वो पान खाते थे.. सिगरेट फ़िल्मों में विलेन पीते थे और हीरो भी जब वो दुनिया से नाराज़ होते थे.. राजू ने विलेन जैसी कोई बात नहीं की थी.. उसने तो "कहीं नहीं" जैसा ईमानदार जवाब देकर अपने मन की सच्चाई का परिचय दिया था.. वो हीरो हो सकता है.. वो जिस बेपरवाह नज़रों से नहर और उसके पार की कॉलोनी की ओर देख रहा था.. शायद वह किसी तरह की छिपी हुई नाराज़गी थी.. ऐसा बिल्लू ने सोचा..
राजू क्यों नाराज़ होगा दुनिया से.. क्या उसके पापा शराब पीकर उसकी माँ को पीटते थे.. या उसके पापा नहीं थे सिर्फ़ माँ थी जो उसको पढ़ाने के लिये दूसरों के घरों में महरी का काम कर रही थी.. या माँ भी नहीं थी.. बहुत बचपन में ही मर गई थी, टी बी की दवा वक्त पर ना पहुँच पाने के कारण.. क्योंकि दवा की दुकान वाले ने पैसे पूरे ना होने के कारणं सारी दवाओं का पैकेट उसके हाथ से छीन कर उसे सड़क की ओर धकेल दिया था.. या फिर किसी ने उसके हाथ पर लिख दिया था कि उसका बाप चोर है..
ये आखिरी बात सोच कर बिल्लू ने धीरे से राजू की हाथ की ओर देखा.. राजू ने एक हाथ मोड़कर सर के नीचे रखा हुआ था और दूसरे हाथ से सिगरेट पी रहा था..राजू ने अपनी कमीज़ की आस्तीनें मोड़कर ऊपर तक चढा़ई हुई थीं.. बिल्लू ने देखा कि सिगरेट वाले हाथ में कुछ भी नहीं लिखा था.. सर के नीचे वाले हाथ को ठीक से ना देख पाने के लिए बिल्लू और आगे की ओर झुक गया.. मगर फिर भी ना देख पाने के कारण.. उसने राजू के बराबर लेटने की मुद्रा में आने का फ़ैसला किया.. बिल्लू के लेटते ही राजू ने सर के नीचे का हाथ निकाला और उसी का सहारा लेकर उठ खड़ा हुआ.. इस अन्तराल में बिल्लू को राजू के उस हाथ की एक झलक भर ही मिल सकी.. वहाँ नीले रंग से कुछ लिखा हुआ था..बिल्लू ठीक से पढ़ नहीं सका कि क्या.. बिल्लू ने देखा राजू ने सिगरेट को उंगलियों से ठोकर मार कर नहर की तरफ़ उछाल दिया.. सिगरेट उड़ती हुई नहर के पानी पर गिरी.. और नहर के पानी की सतह पर हलके हलके हिलने लगी..

यह देखते देखते बिल्लू थोड़ा भ्रमित हो गया उसे समझ नहीं आया कि नहर के हलके हलके हिलते पानी के साथ सिगरेट हिल रही थी.. या सिगरेट जिस गति से उड़ती हुई आई थी उस गति के प्रभाव से अब नहर का पानी हिल रहा था..इस परिघटना को ठीक से समझने के लिये बिल्लू ने नहर किनारे की मिट्टी का एक बेढंगा ढेला नहर के पानी पर लगभग सिगरेट के आस पास ही फेंका.. ढेला जल्दी से पानी में डूब गया.. जैसे बिल्लू के इस प्रयोग में उसका सहयोग सिर्फ़ किनारे से उड़कर पानी की सतह तक जाने तक ही था.. ढेले के इस असहयोग का दोष बिल्लू ने ढेले को नहीं दिया और सोचा कि शायद यह पानी का अपना फ़ैसला था कि किसे वो तैरने देगा और किसे डुबो देगा..बिल्लू को तैरना नहीं आता था.. यह सोच कर वो नदी के स्वभाव के प्रति थोड़ा सशंकित हो गया..उसने देखा कि सिगरेट पानी की सतह पर अभी भी हलके हलके हिल रही थी.. सूरज की किरणें पानी पर गिर कर बिल्लू की आँखों को चौंधियाँ रही थीं.. और हैलीकॉप्टर की शक्ल के कीड़े भी पानी की सतह का निरीक्षण कर रहे थे.. फिर उस ने सोचा कि ऐसा भी तो हो सकता है कि उसके ढेले फेंकने और राजू के सिगरेट फेंकने के कौशल में अन्तर हो.. आखिर दोनों के उम्र और कद में भी तो अन्तर था.. और फिर राजू दुनिया से नाराज़ भी था..
राजू का ख्याल आते ही बिल्लू ने मुड़कर राजू की तरफ़ देखा.. उसके हाथ में अभी भी कुछ नीली स्याही से लिखा हुआ था .. जिसे बिल्लू पढ़ नहीं सका था..उसे पढ़ने के लिये बिल्लू दिन भर राजू के साथ साथ घूमता रहा.. और जब बिल्लू को उसे पास से पढ़ने का अवसर मिला तो उसने पाया कि वहाँ डॉटपेन से लिखा था.. राजू लव टू पिंकी.. बिल्लू थोड़ा निराश हुआ.. कहानी कुछ और थी.. राजू का किसी से प्रेम था और यह वाक्य उसी का बयान था.. इतना समझदार था बिल्लू.. मगर यह पढ़कर बिल्लू के मन में राजू की जो छवि बनी थी उसकी विराटता में थोड़ा अन्तर आ गया इसलिये नहीं कि राजू का बाप चोर नहीं था और वह किसी पिंकी नाम की लड़की के प्यार में था.. बल्कि इसलिये कि राजू की अंग्रेज़ी ठीक नहीं थी.. बिल्लू ने पूरे आत्मविश्वास से अपने नए दोस्त की गलती सुधारनी चाही..
'राजू लव टू पिंकी नहीं होता'..
'क्या ?'.. राजू ने त्यौरियाँ चढ़ाकर पूछा..
'ये गलत सेनटेन्स है.. राजू लव्स पिंकी सही सेनटेन्स है'..
राजू को बिल्लू की बात अच्छी नहीं लगी थी..
'इसको फिर से लिखो'.. बिल्लू ने मित्रवत सलाह दी...
'पागल है क्या'.. राजू ने बिल्लू को लगभग हिकारत से देखते हुए कहा..
राजू की हिकारत बिल्लू को समझ में आ गई.. वह चुप हो गया.. दोनों चलते रहे.. इस बीच दोनों चलते चलते नहर पार कर के कॉलोनी के अन्दर चले आये थे..अधिकतर सड़कें खालीं थीं.. कहीं कहीं दोनों तरफ़ मकान बन के तैयार खड़े थे.. कहीं एक तरफ़.. और कहीं एकदम सन्नाटा था.. वे अभी एक सन्नाटी सड़क पर थे.. अचानक चलते चलते राजू रुक गया और एक तरफ़ देखकर बोला.. 'वो देख'.. बिल्लू ने देखा सड़क के किनारे की ज़मीन सड़क से काफ़ी नीचे थी जैसे कोई बड़ा सा गढ्ढा हो.. और उस गढ्ढे में उनसे थोड़ी दूर पर एक औरत बैठी हुई थी.. उनकी तरफ़ पीठ करके.. बिल्लू को उसका चेहरा नहीं दिख रहा था.. पर उसके साँवले शरीर की कमर के नीचे का हिस्सा बिना कपड़ो का नंगा दिख रहा था.. बिल्लू ने ऐसा दृश्य पहले कभी नहीं देखा था..
(आगे फिर.. )

6 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

बिल्‍लू की कहानी में रस आ रहा है। तबीयत की बेवफाई ने पिछले कुछ दिनों से इंटरनेट की दुनिया से दूर कर रखा था। अभी एक साथ बिल्‍लू कथा बांची। मजा आ रहा है। अब आगे.....?
मनीषा

Pramod Singh ने कहा…

ये बिल्‍लू राजू की दोस्‍ती अपने को रास नहीं आ रही. आपको नहीं लगता ये राजू बिल्‍लू का क्रिया-कर्म करेगा? बिल्‍लू पर अच्‍छे प्रभाव पड़ते नहीं दिख रहे. क्‍या राजू की जगह रवि, सुशांत, अनिमेष जैसे बच्‍चों की संगत में आपने बिल्‍लू को डालने का कोई विचार किया? मैं भुक्‍तभोगी हूं. मेरे तीनों लड़के ऐसे ही राजुओं की संगत में कचड़ा होकर घर और मेरे माथे पर बैठे हैं! आपको आगाह कर रहा हूं. समय रहते चेत जाइए!
अप्रगतिशील सहयात्री

काकेश ने कहा…

अरे भाई अच्छे खासे बिल्लू को काहे बिगाड़ रहे हैं..वो बेचारा तो पुल से ट्रेन पर भी नहीं थूकता था आप बेचारे को सिगरेट और लव यू के चक्कर में तो डाल ही दिये... अब कमर के नीचे क्या दिखवा रहे हैं.

देखिये एफ टी वी जब बैन हो गया तो कहीं इसे भी बैन ना कर दिया जाय :-) बच के रहियेगा.

Bodhi ने कहा…

अभय जी आप बिल्लू विरोधियों की ओर ध्यान दिये बिना बिल्लू को आगे बढ़ाएं। मेरा मेनना है कि हिंदी में बचपन और किशोरावस्था पर कुछ भी अच्छा और संतोषप्रद नहीं है। बिल्लू की कुर्बानी से कोई क्रंति नहीं होनी है। और ना ही बिल्लू के होने से कोई सामाजिक आंदोलन ठप पड़ने जा रहा है। बेहतर होगा कि बिल्लू विरोधी लोग बिना बिल्लू के अपनी सामाजिकता को अंजाम दे लें ।
प्रमोद भाई एक मध्यवर्गीय पिता की पीड़ा से उबरिये और बिल्लू को जीवन की राहों पर आगे बढते देखिए। बिना राजू से मिले बिल्लू जिंदगी के राज पथ पर एक अर्ध-बिल्लू की तरह हो कर रह जाएगा । यह शुद्धतावादी रुख क्यों प्रमोद जी और काकेश जी । मुझे लगता है बिल्लू नहीं आप लोग कुछ और देख-खोज रहे हैं । अगर गोर्की का मेरा बचपन आप सब ने पढ़ी हो तो वह प्रसंग याद होगा जहां गोर्की अपने बचपन में गाँव की लड़कियों के फ्राक को उन्ही के ऊपर सिर पर बाँध कर लुका-छिपी का खेल खेला करते थे और लड़कियाँ क्र के नीचे अनावरण खेला करती थीं।
इस लिए बिल्लू के जरिए अपनी नैतिकता को न लादिए
अविनाश भाई
बिल्लू से कैसा बैर
उसकी बलि देकर अरुंधती के एजेंडे में बहुत कुछ नहीं जोड़ा-घटाया जा सकता। अरुंधती का फंडा और तरीके से उठाया जा सकता था। अगर अभयने बिल्लू की बात नहीं भी चलाई होती तो भी अरुंधती की बात पर कोई असर नहीं पड़ना था । आपने बिल्लू को पीटने के चक्कर में निर्मल आनन्द की कला का गला न धोटने वाली बात को दर किनार कर दिया ऐसा क्यों है भाई । मुझे बताओगे तो अच्छा लगेगा

बेनामी ने कहा…

ठक्-ठक्! नाक्-नाक्! अंकिल जी, बिल्‍लू है? मेरा नाम टिल्‍लू है, मेरे को बोरिविली से बोधि अंकिल ने भेजा है, और मैं बिल्‍लू से दोस्‍ती करना चाहता हूं! आप अभी सो रहे हैं, ठीक है मैं बाद में आ जाऊंगा!
टिल्‍लू शर्मा

बजार वाला ने कहा…

ha ha ha !! kya baat hai..,
kya baat hai !!

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...