बुधवार, 9 मई 2007

सुगन्धित मूर्ख हैं आप..

मैं बाबा नागार्जुन से कभी नहीं मिला पर अनामदास मिले हैं.. मंत्र कविता की प्रतिक्रिया में उन्होने लिखा.. "बाबा के दर्शन दो बार करने का सौभाग्य मिला. औघड़ थे.. बाबा का हँसता चेहरा देखकर मन प्रसन्न हुआ, लोग तो भूल गए थे कि रामदेव, आसाराम और श्रीश्री रविशंकर से पहले एक और बाबा थे.." चन्दू भाई भी मिले थे..

मगर इसी कविता पर वरिष्ठ मित्र चन्द्रभूषण की प्रतिक्रिया आई वो बाबा की जयजयकारी छवि को थोड़ा ठेस पहुँचा रही थी.. "बाबा से पहली मुलाक़ात पटना में हुई थी । मुझे जनमत के लिये उनका इन्टरव्यू करना था । प्रेमचन्द रंगशाला के पास किसी धरने में शामिल होने आये थे । भीड़ छटने पर नमस्ते करके मैंने कहा,"बाबा आप से बात करनी थी"। छूटते ही बोले,"अब बात करने के लिये भी बात करनी पड़ेगी क्या? इस त्वरित जवाब से मैं इतना डरा कि टाइम लेकर भी बात करने नहीं गया । मेरे साथी इरफ़ान गये और झेलकर लौटे। बात के क्रम में बाबा ने उनसे कहा- "मूर्ख हैं आप, सुगन्धित मूर्ख..दो पैसे का चेहरा है आपका। सुन्दर को एक दिन सुन्दरी मिल जायेगी, फिर किनारे हो जायेंगे"..

पर बाबा कोई अवतार पुरुष, कोई मूर्ति तो थे नहीं.. थे तो एक समूचे मनुष्य.. तो इसी मनुष्य को और बेहतर जानने के लिये मैंने अपने पुराने मित्र इरफ़ान से सम्पर्क साधा तो उन्होने यह संस्मरण लिख मारा.. जिसमें बाबा ने उन्हे इस अनुपम उपाधि से नवाज़ा.. आप खुद ही पढ़ें इसे और आनन्द लें.. पर ये भी ध्यान रखें कि इरफ़ान मियां बाबा के हाथों सुगन्धित मूर्ख की उपाधि पाकर भी आहत नहीं है.. क्योंकि उनके व्यक्तित्व में कुछ तो था ऐसा कि बाबा को भी उसकी सुगन्ध को स्वीकारना पड़ा.. और इरफ़ान से मिलने वाला हर व्यक्ति इस सत्य को जानता है और मानता है..

बात १९९० की होगी शायद. चंदू भाई जिस वाक़ये की याद कर रहे हैं वो लम्बे समय तक हम लोगों के लिए चर्चा का विषय रहा. हम जिनको बड़ा कवि/शायर मानते हैं उनसे बड़ा आदमी होने की भी उम्मीद करते हैं. नागार्जुन ने इस घटना में जैसा व्यवहार किया उस से तब हमें उनके उसी बेलौस व्यवहार की झलक /पुष्टि मिली थी जिस पर हम जान छिड़कते हैं. अब यहाँ रुकिए, लगता है मैं जो कहने चला था उस से भटक रहा हूँ . अच्छा यही रहेगा कि मैं स्मृतियों की खंगाल करता हुआ आपको "उस" अनुभव का साझीदार बनाऊँ. अस्तु, मुद्दे की बात.

हम जनमत के लिए एक लम्बा इन्टरव्यू करने नागार्जुन के पास गए थे. वो अपने बेटे के साथ कंकरबाग,पटना के घर पर मिले . हम तीन मूर्तियाँ, संजय कुंदन, संजीव और मैं, पलंग के एक तरफ इस तरह बैठी थीं कि आज कुछ यादगार इन्टरव्यू सम्पन्न कर लेना है. सवाल अभी शुरू भी नहीं हुये थे कि बाबा ने बोलना शुरू किया. वो कोई चालीस मिनट तक वीपी सिंह की सरकार के बारे में बोलते रहे, जिसका निचोड़ ये था कि वीपी सरकार अभी बच्ची है इसे देखो, जल्दबाजी में इस सरकार के बारे में राय मत बनाओ और विरोध मत करो. हम इस उधेड़ बुन में कि उस इन्टरव्यू को कैसे संभव बनाया जाये जिसमें एक कवि का निजी जीवन, उसका रचनात्मक संघर्ष, उसकी सौन्दर्यबोधात्मक दुनिया, सुख दुःख, सपने सब आ जाएँ. अब तक जो बातें कही गयीं उनसे एक राजनीतिक पर्यवेक्षक की छवि बनती थी. तो जैसे ही हमें पंक्चुएशन में एंट्री की जगह मिली सबने एक दूसरे को देखा और मैंने सवाल पूछा. अब सवाल मैंने ही क्यों पूछा होगा इस पर अभय भाई कहेंगे 'तेरे को सस्ती लोकप्रियता जो चाहिये होती है'. बहरहाल.

इरफान: बाबा लेकिन अ अ आप तो कविता के आदमी हैं...(सवाल अधूरा और बाबा उवाच)बाबा: कविता के आदमी राजनीति के आदमी! आदमी को इतना बांटकर देखते हो?(स्वर में क्रोध)इरफान: लेकिन बाबा.....आप तो जे पी मूवमेंट में भी...(सवाल अधूरा और बाबा उवाच)बाबा: मूर्ख है ये...सुगन्धित मूर्ख. कविता के आदमी ..राजनीति के आदमी..अरे जे पी क्या.. मैं कहाँ कहाँ रहा. मैं बौद्ध भी रहा, जेल में भी रहा..तुम जानते क्या हो?...अरे मालूम है जीवन है इसमें क्या क्या उतार चढ़ाव आते हैं मालूम भी है कुछ? चले आये हैं मूँछ मुड़ाकर.. तुम्हारा चेहरा भी है दो पैसे का.. आज तुम यहाँ हो और जनमत में हो कल तुम बम्बई चले जाओगे.. हीरो-वीरो बन जाओगे.. फिर मैं आऊँगा, पूछूँगा, वो इरफान कहॉ गया?.. तो पता चलेगा वो बम्बई चला गया.. वैसे मैं दिल्ली जाकर विपिन से पूछूँगा तुम्हारे बारे में..
(सूचना:सादतपुर में पार्टी का ऑफिस था और बाबा रोज़ सुबह टहलते हुए चाय पर विपिन भाई के साथ होते अख़बार पढ़ते, हंसी ठट्ठा करते ,दुनिया जहान की चिंताएं शेयर करते. पार्टी ऑफिस उनके सादतपुर के कई घरों जैसा घर था)


इस पूरे संवाद क्रम में बाबा का स्वर उंचा और थकता जा रहा था.उन्होंने खिड़की की तरफ मुँह कर लिया, इससे पहले वे अपने बेटे को निर्देश दे चुके थे कि इन लोगों को हटा दिया जाये. हम ढीठ थे, भक्त थे या कर्मयोगी अब ठीक से तय नहीं कर पा रहा लेकिन एक दूसरे को देखते कुछ ज्वार के थमने की उम्मीद लिए बैठे रहे. खिड़की की तरफ मुँह किये अब वो धीरे धीरे किसी अनदेखी दुनिया से मुखातिब थे और उधर से आ रही टुकड़ा भर धूप या मुट्ठी भर हवा से बातें करते रहे. हमें किसी ने हटाया नहीं. यह एक कवि का घर था और सब परिजन कवि के स्वभाव से परिचित थे. इसमे १०-१५ मिनट गुज़रे. करीब था कि बाबा सो गए हों. किसी भीतरी स्वरयंत्र से आ रही या खींच कर लाई जा रही आवाज़ से यही एहसास होता था कि वो किसी अन्य दुनिया से संवाद में व्यस्त हैं. कब वो वापस इस दुनिया में आये नहीं मालूम लेकिन हमने सूना.. अरे भाई सुकांत! पानी वानी पिलाओ इन लोगों को.यह सुन कर हम एक ओर आश्वस्त हुए कि हम बेआबरू होकर नहीं निकलेंगे दूसरी ओर 'इन्टरव्यू जो हो ना सका' की एक पंक्ति हमारी असफलता की कहानी कह रही थी. अब मुझे उनकी मृत्यु का वर्ष याद नहीं लेकिन तब से थोड़े दिनों पहले उनके पैतृक गाँव में उनकी बीमारी का सुनकर जब कॉमरेड विनोद मिश्र और साथी मिलने पहुंचे तो मुझे मालूम हुआ कि वो दूसरी बातों के अलावा ये भी पूछने लगे, "इरफान का क्या हाल हैं ?"

7 टिप्‍पणियां:

Sanjeet Tripathi ने कहा…

बाबा नागार्जुन के लेखन से पहला परिचय कोर्स की एक कविता बादल को घिरते देखा है से हुआ था, उसके बाद से तो बाबा नागार्जुन को जितना पढ़ो, जितनी बार पढ़ो उन्हे पढ़ने की भूख कम होने का नाम ही नही लेती चाहे वह ऊं मंत्र हो, या हजार हजार बाहों वाली या फ़िर खिचड़ी अथवा कुंभी पाक और दुख मोचन।
बिरले ही होते हैं ऐसे लोग।
शत-शत नमन उन्हें

अविनाश ने कहा…

इरफान का ये संस्‍मरण रामजी भाई सुनाते रहे हैं। बाबा मौलिक शख्‍सीयत के आदमी थे। हमारे वक्‍त में लोग एक दूसरे की कॉपी नज़र आते हैं। थोड़ी चापलूसी, थोड़ी विनम्रता, थोड़ी चालाकी, थोड़ी महत्‍वाकांक्षा, थोड़ी सृजनशीलता का कोलाज लोगों में मिलता रहता है। मैंने बाबा के साथ काफी लंबा वक्‍त गुज़ारा है। हमारे घर में, हमारे गांव में, पटना में, उनके गांव तरौनी में, उनके लड़के शोभाकांत, सुकांत के घर में, पटना में हरिनारायण सिंह, खगेंद्र ठाकुर, उषाकिरण खान, खगेंद्र ठाकुर और सुरेंद्र स्निग्‍ध के घर में, दरभंगा में रामधारी सिंह दिवाकर के घर में- मैं बाबा के साथ-साथ रहा हूं। ये उनका आखिरी से दो-तीन साल पहले का वक्‍त था। बाबा और मुझमें जो तालमेल और राग था, उसके कुछ स्‍केचेज तारानंद वियोगी ने अपनी किताब तुमि चिर सारथी में खींचे हैं। इस किताब का ज़‍िक्र अशोक वाजपेयी ने जनसत्ता के अपने स्‍तंभ कभी कभार में किया है। तो बाबा और मैं एक बार दरभंगा के उनके घर से अपने घर आ रहा था। रिक्‍शे पर। गर्मी की दोपहर थी। रास्‍ते अमलतास और गुलमोहर के फूल देख कर जिस तरह वह उछले, मेरे लिए अप्रत्‍याशित था। ठीक उसी तरह इरफान को सुगंधित मूर्ख कह कर वह उछले होंगे। इरफान बहुत दिन तक ताव खाये रहे। उन्‍हें लगा होगा कि बाबा ने सुगंधित तो ठीक कहा, लेकिन मूर्ख क्‍यों कहा। लेकिन जो समझने वाले थे, समझ गये कि इरफान को देख कर बाबा को एक नया मुहावरा हाथ्‍ा लगा होगा और लगे हाथ वो इसे आजमा लेना चाहते होंगे। अब बाबा जैसे लोग हमारे पास शायद ही कभी होंगे।

काकेश ने कहा…

अपने प्रिय बाबा के बारे में जैसा सुना था वो और पक्का हो गया. बहुत सुखद रहा बाबा को जानना .इसी तरह से अन्य महान (मीइया द्वारा बनाये "महान" नहीं ) लेखकों के बारे में लिखिये . ऎसे ही एक शख्स "शैलेश मटियानी" के बारे में पढ़ रहा हूँ .समय मिलने पर लिखुंगा.

बेनामी ने कहा…

अविनाश की टिप्प्पणी पर दो शब्द; मैं सुगन्धित मूर्ख कहे जाने पर बहुत दिनों तक ताव खाये रहा, उस ताव की उतनी याद नहीं है लेकिन ये ज़रूर है कि बाबा की अभिशाप को फलित होते देखने का इन्तज़ार मैं ज़रूर करता रहा. अभी तक तो मुम्बई में जाकर हीरो नहीं बन पाया हूँ. इस घटना के बाद कई मुलाक़ाते दिल्ली में भी उनसे हुई और ये एहसास पक्का हो गया कि खुद उनकी इस बात में सच्चाई है कि "मैं जो देखता हूँ वही लिख देता हूँ". एक तरह से उनकी कविताओं का एक बड़ा अनुपात उन कविताओं से बनता है जिन्हे कवि की क्षणिक प्रतिक्रिया कहा जा सकता है. हिन्दी इलाक़े की साहित्यिक मैपिंग के दौरान मैंने हिन्दी के लोकप्रिय लेखक प्यारेलाल आवारा से सुना कि उनसे मिलने जो दो कवि आया करते थे वो त्रिलोचन और नागार्जुन थे. याद रहे कि हिन्दी के अभिजात लेखक प्यारेलाल आवारा से मिलना नहीं चाहते थे. हिन्दी के ये दो कवि कुछ इतना महत्व रखते हैं कि उनके बारे में देर तक बात हो सकती है. ये तो आप समझते ही हैं कि नागार्जुन द्वारा सुगन्धित मूर्ख की उपाधि पाना सुब्रत राय सहारा द्वारा स्वर्णजटित विद्वान की उपाधि से कहीं बेहतर है. मेरी मूर्खता की सुगन्ध आप तक भी पहुँच रही है.
-इरफ़ान

Sanjeet Tripathi ने कहा…

सच कहूं तो बाबा के साथ आप लोगो के संस्मरण पढ़ कर जलन सी होती है कि आप लोग कितने किस्मत वाले हो जो ऐसे व्यक्तित्व के साथ आप लोगो को समय गुजारने का मौका मिला, उनकी संगत मिली।

प्रियंकर ने कहा…

बाबा तो बड़े आदमी थे ही,इरफ़ान भी कम बड़े मन के मानुस नही हैं . दो अच्छे और सच्चे व्यक्तियों के बीच ही ऐसा संवाद संभव है .

बड़े लोगों का बच्चों जैसा व्यवहार भी उनके अंतरंग की निर्मलता का ही हिस्सा होता है वरना तो आज के सफल व्यक्ति के व्यक्तित्व का कोलाज अविनाश ने बताया ही है . बाबा भी इसी वजह से कई बार चर्चा में रहे .लोग स्टैंड बदलने पर उनसे नाराज़ भी रहे .

कुछ बड़े लोगों से जुड़े ऐसे प्रसंग मन में हैं कभी लिखूंगा .

Bodhi ने कहा…

बाबा नागार्जुन के साथ कुछ दिन मेरे भी कटे हैं । अविनाश के जैसे कुछ उन बड़ भागियों में मैं भी हूँ जिन्हें बाबा के साथ रिक्शे पर बैठने का सुअवसर मिला है। बाबा को कविता सुनाने और बाबा की कविताएं सुनने का मौका भी मुछे मिला है। बाबा अक्सर बहुत बोलते थे और चालू कमेंट्स खूब किया करते थे । उनके जैसे मान- सम्मान और जनप्रिय कवि अकुंठ भाव से कहीं भी और किसी के भी साथ उठने-बैठने में संकोच नहीं करता था। नहीं तो बड़ा कवि होने का भ्रम बनते ही कई लोग धीर-गंभीर हो कर आग मुतने लगते हैं । नखरे बढ़ जाते हैं और लंतरानियाँ आदत में शामिल हो जातीं हैं । कुल मिलाकर बाबा का कद पाकर बाबा जितना सर्व सुलभ होना अपने में एक चमत्कार है। क्या आज के कवि बाबा या त्रिलोचन जी जितना साधारण रहन-सहन अपना सकते हैं । यह इरफान का भाग्य था कि बाबा ने उन्हें एक नाम दिया । मैं बाबा के बारे में बहुत कुछ कहने का अधिकारी नहीं हूँ फिर भी कुछ बातें बाबा की संगति से उपजीं थी उन को आप सब को बताना चाहूँगा। बाबा ने मेरा कान फूँका और मुझे गुरु मंत्र दिया। उस वक्त की तस्वीरे मैं मित्र अभय को दिखा चुका हूँ । बाबा पर अपना संस्मरण मैं लिख रहा हूँ और कल विनय पत्रिका में छापूंगा । सचित्र ।

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