मंगलवार, 1 मई 2007

मैं एक मजदूर और आप भी..

आज एक मई है दुनिया भर में आज के दिन को मजदूर दिवस के रूप में मनाते हैं.. इस तारीख के मजदूर दिवस बन जाने के पीछे एक कहानी है.. १८५६ में ऑस्ट्रेलिया में बिल्डिंगो में काम करने वाले मजदूरों ने काम बंद कर के पार्लियामेंट का घेराव किया और आठ घंटे कार्य दिन की माँग की और सुखद रूप से इतिहास में पहली बार मजदूरों की विजय हुई.. लेकिन आठ घंटे के कार्य दिन और दूसरी जायज़ माँगों के लिये संघर्ष आज भी जारी है.. और हर जगह उन्हे इतनी आसान जीत नहीं मिली है.. प्रदर्शन हुए, रैलियां की गई.. गोलियाँ चलीं.. खून बहा.. लोग मारे गये.. मजदूर नेताओं पर मुक़दमे भी चलाए गए.. धीरे धीरे यह घटना राज्यसत्ता के खिलाफ़ मजदूर संघर्ष का एक प्रतीक बन गई और लगातार दुनिया भर में इसकी बरसी मनाई जाती रही और कई बरसियों पर भी राज्य-मजदूर संघर्ष के फलस्वरूप जानें जाती रहीं.. आज दुनिया भर में इसे मजदूर दिवस का दरजा मिल गया है..

आप सोच रहे होंगे कि मैं भी क्या मजदूरों की बात करके आप को बोर कर रहा हूँ.. आप से आप की बात करूँ.. मजदूरों की बात मजदूरों से करूँ.. माफ़ करें बन्धु.. मैं वही कर रहा हूँ.. आप में से कितने लोग हैं जो अपना धंधा करते हैं.. अपनी दुकान.. अपना व्यापार.. कमीशनखोरी वाले बन्धु लेख पढना यहीं बंद कर सकते हैं.. आप लोग अभी मजदूर नहीं बने हैं.. जिस तरह की पूँजी की इजारेदारी इस देश में और दुनिया भर में जारी है.. सभी तरह के छोटे मोटे धंधे वाले आप सब लोग मन बनायें, अपना बोरिया बिस्तर समेटने की तैयारी करें.. आप भी मजदूर बना दिये जायेंगे..

शेष लोग जो किसी कम्पनी या कॉरपोरेट के लिये काम करते हों, डॉक्टर, अध्यापक, पत्रकार, अधिकारी, एजेन्ट, बीपीओ, सेल्स, मार्केटिंग, विज्ञापन की दुनिया में काम करने वाले, एक्टर, गायक, लेखक.. आप सब मजदूर हैं.. मेरी तरह.. क्यों.. मजदूर तो वो होता है जो फ़ैक्ट्री में जा के मशीन पर काम करता है.. भाईसाहब दुनिया बदलती है.. फ़ैक्ट्री का स्वरूप बदलता है..

मिसाल के तौर पर मुम्बई में मशहूर फ़िल्मी हस्ती राम गोपाल वर्मा के दफ़्तर का नाम फ़ैक्ट्री है.. तरह तरह के कलाकार अपनी प्रतिभा लेके अपने सपने लेके मुम्बई आते हैं.. और यहाँ आकर कलाकार नहीं बनते सिर्फ़ मजदूर बन जाते हैं.. कला व्यक्ति के भीतर से निकली उसकी अनोखी अभिव्यक्ति है.. पर मुम्बई फ़िल्मों में जिसने आखिरी बार कोई अनोखी अभिव्यक्ति देखी हो.. कृपया मुझे भी बताये.. ये अनुकृति का धंधा है.. जो चल रहा है जो बिक रहा है उसकी नकल करो.. कभी कदार अपवाद स्वरूप कोई कला की अभिव्यक्ति हो जाती है.. तो फिर अंधभाव से उसकी नकल शुरु हो जाती है.. इस विषय पर बहुत लिख गया है मुझे लिखने की ज़रूरत नहीं.. लुब्बे लुबाब ये है कि कलाकार भी अब मजदूर हो चुका है.. अपने को सफ़ेद कॉलर कर्मचारी समझने की भूल भी जो बन्धु कर रहे हैं वो अपनी भूल सुधारें .. सब मजदूर हैं.. आप को लगेगा मैं कुछ सामान्यीकरण कर रहा हूँ.. एक झाडू से सब को समेट रहा हूँ..

पर बन्धु मैं यहाँ बाबा मार्क्स से आपका परिचय कराना चाहूँगा.. मार्क्स का नाम लेते ही हमारे दिमाग़ में माकपा, भाकपा, भाकपामाले, और तमाम दूसरे नक्सलवादी धड़े.. रूस, चीन की क्रांति क्यूबा, वियतनाम आदि आदि कौंध जाता है.. पर सच मानिये मार्क्स को इन से जोड़ कर देखना एक गलती है.. अलबत्ता ये मार्क्स से अपना सम्बंध ज़रूर जोड़ते है.. ये वैसे ही है जैसे कि हम बजरंग दल, शिव सेना, तोगडि़या, भाजपा, अड्वाणी और उभरते हुये दल हिन्दू राष्ट्र सेना के अपराध को राम के मत्थे मढ़ दें.. वे राम का नाम लेते हैं.. राम तो उनका नाम नहीं लेते.. जैसे ये राम के साथ अन्याय होगा.. वैसे ही मार्क्स के साथ भी अन्याय मत करें..

बाबा मार्क्स का जन्म १८१८ में जर्मनी में हुआ.. उन दिनों जर्मनी योरोपीय दर्शन का केन्द्र बना हुआ था .. मार्क्स, जो मूलतः एक दार्शनिक ही थे, उस परम्परा को शीर्ष तक ले गये.. उनके दर्शन का नाम है ऐतिहासिक भौतिकवाद.. उन्होने मजदूर की बड़ी सुन्दर परिभाषा की है..

पहले कि अपने उत्पादन के साधन (मशीन/ कम्प्यूटर/ दफ़्तर/ दुकान/ नेट्वर्क/ कैमरा; एक शब्द में औजार) जिसके हाथ में न हो.. और दूसरे कि वह अपने उत्पाद अपनी रचना से विलगित हो.. यानी कि आदमी जिस की रचना में संलग्न है.. जो काम कर रहा है उसके साथ एकत्व, अपनापन ना महसूस करे..

कहाँ मिलते हैं ऐसे लोग जो अपने काम में आनन्द लेते हैं.. अपने काम के साथ एक भीतरी जुड़ाव महसूस करते हैं.. यहाँ मैं याद दिलाना चाहूँगा कि पुराने समय अक्सर कामगार लोग काम करते करते गाते थे.. निर्मल आनन्द में काम के साथ एक रूप हो जाते थे.. अब कहाँ ऐसा होता है.. काम के दौरान तो असम्भव सी बात है.. काम के बाद मजदूर डिस्को और पब और म्यूज़िक कन्सर्ट जाकर भी निर्मल आनन्द को नहीं प्राप्त कर पाता.. कुछ लोग गूगल के दफ़्तर की मिसाल देना चाहेंगे.. पर वो शायद आने वाले समय के संकेत हैं.. और इस तरह के दफ़्तर आम स्तर पर कभी नहीं लागू हो सकते अभी के पूँजीवाद में..

तो वे सारे लोग जिनके औज़ार जिनके हाथों में नहीं.. और जो अपने काम के साथ एकाकार नहीं.. और जिनके पास बेचने के लिये केवल अपना श्रम है.. शारीरिक या मानसिक.. वे सब भाई बहन मजदूर हैं.. और आज हम सब का दिन मजदूर दिवस है.. भूल जायं कि रूस में क्या हुआ.. चीन में क्या हो रहा है.. और हमारे देश में कम्यूनिस्ट पार्टियाँ क्या कर रही हैं.. उनके कुकर्मों की वज़ह से मार्क्स के नगीनों का अनादर न करें.. ध्यान दें कि आठ घंटे कार्य दिन का संघर्ष अभी भी अधूरा है.. सरकारी संस्थानों को छोड़कर बाकी जगहों पर श्रम क़ानून ताक़ पर रखे जा रहे हैं.. १२ से १६ घंटे काम करना आम बात है.. निजी क्षेत्रों में हमारे आप जैसे लोग ८ घंटे की नहीं.. २४ घंटे की नौकरी बजाते हैं.. आप से उम्मीद की जाती है कि फ़ोन और नेट के ज़रिये आप हमेशा उपलब्ध रहें.. आप कभी भी सोते से जगाये जा सकते हैं.. और ऊँचे नीचे ओहदे का भेद नहीं.. सब मजदूर हैं..

आइये इस नये एह्सास के साथ अपनापन महसूस करें मजदूर दिवस के साथ.. नहीं कर पा रहे.. ? कोई बात नहीं कोशिश कीजिये सिर्फ़ अपनापन महसूस करने की.. किसी भी चीज़ के साथ.. कोशिश कीजिये.. अगर कर सकते हैं तो आप भाग्यशाली हैं .. आप खुश रहिये.. आप की खुशी को किसी की नज़र ना लगे..

5 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

ऊंची तंख्‍वाहों वाली आधुनिक कॉर्पोरेट की नौकरियों ने श्रमिक-मजदूर होने के एहसास को और भोंथरा किया है। नई पीढ़ी इस मुगालते में है कि देश प्रगति कर रहा है, वे कार और शॉपिंग मॉलों में घूमते, ब्रांडेड कपड़े पहनते और ब्रांडेड खाना खाते मगन हैं। उन्‍हें वो सब मिल रहा है, जिसका मुंह उनके बाप-दादा ने कभी सपने में भी नहीं देखा होगा। मजदूरों, श्रमिकों का शोषण वगैरह तो गुजरे जमाने की बातें हुईं। अब तो हमारा वर्ग बदल गया है। अभय, हम किसी बड़े शातिर खेल के निर्मम शिकार हो रहे हैं और हमें खबर भी नहीं।
मनीषा

अनिल रघुराज ने कहा…

यकीनन, मजदूर हैं हम सभी, लेकिन सामूहिकता अस्मिता के बोध से वंचित। मीडिया और आईटी से लेकर बैंकिंग जैसे सेवा क्षेत्र की तमाम नौकरियों ने हमें एकल उत्पाद बना दिया है जहां हम खुद के बिकाऊ होने का भ्रम पाले रखते हैं। हमारी सामूहिकता अस्मिता खंड-खंड हो गई है और हम खुद उद्यमी होने का पाखंड ढोते रहते हैं।

अनामदास ने कहा…

साइबर कुली और टेलीकुली जैसे शब्द अब धीरे-धीरे आकार ले रहे हैं. औद्योगिक क्रांति के बाद मज़दूरों ने सबक़ सीखा और संगठित हुए, पूंजीपति ने भी तो सबक़ सीखे हैं, तरीक़ा बदला है...स्टाइल से. आप सोचते हैं कि कंपनी ने मोबाइल दिया है...लेकिन वह आपको रात-बिरात सताने के लिए है, आप सोचते हैं कंपनी आपको मुफ़्त में चाय पिलाती है, लेकिन वह आपको चाय के लिए बाहर जाने से रोकने के लिए है....मालिक शातिर हो गए हैं और मज़दूरों को नए सिरे से समझना है कि उनका कहाँ-कहाँ, कैसे शोषण हो रहा है....ज़रा उपभोक्तावाद की चमकार थिरे तो बात समझ में आए. बढ़िया लिखा.

अनूप् शुक्ल ने कहा…

लेख् अच्छा लिखा है। ऊपर् अनामदास और् अनिल रघुराज ने हमारी बात् कह दी!

Manish ने कहा…

इतनी तफसील से समझाओगे तो मानना ही पड़ेगा कि हम सब मजदूर हैं । अच्छी विवेचना की नवयुगीन श्रमिकों की ।

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