बुधवार, 2 मई 2007

समाचार कौन बनाता है.. ?

आज मेरी बात अपने एक मित्र से हो रही थी.. रिचर्ड गियर और शिल्पा शेट्टी जुड़ी उस चुम्बन के बारे में .. जिसके बाद पूरे देश में ऐसा हंगामा हो गया.. कि आज तक लोग बाग़ गिरती हुई नैतिकता के स्तर से परेशान हैं.. और इस के लिये ज़िम्मेदार शिल्पा और गियर को क़ानून की ज़द में ले लेना चाहते हैं..

एक स्त्री जिसे चूमे जाने से कोई परेशानी नहीं.. एक पुरुष जो आसानी से दुनिया की किसी भी औरत को हम बिस्तर कर सकता है..(हर औरत को नहीं, मैं सामान्यीकरण कर रहा हूँ) .. उनका चुम्बन लोगों के नैतिक विवाद का विषय है.. जो लोग अपने ही घर में माँ, बाप, दादा, दादी, बेटे, बेटियों के साथ बैठ कर टी वी पर हिन्दी फ़िल्मो गानों और न्यूज़ चैनल्स पर दिन रात सचमुच अश्लील गाने और अश्लील विज्ञापन संदेश, और कहीं ज़्यादा अश्लील समाचार देखते थकते नहीं.. जिस देश की सड़कों पर सामान्य साज सज्जा में निकलने वाली लड़्कियां भी सुरक्षित नहीं.. वो लोग शिल्पा की आबरू के बारे में चिन्तित हैं..

जो लोग अपने सामान्य बातचीत के भाव बिना गालियों के अलंकार के प्रेषित नहीं कर पाते.. जो लोग अपने ही देश को सब मिल कर नोच रहे हैं.. जहाँ से जो पा रहे हैं खसोट रहे हैं.. उन्हे ये चुम्बन तो अश्लील लगता है पर बाकी कुछ अश्लील नहीं लगता.. और लगता होगा अगर किसी को तो कम से कम इतना तो नहीं कि उस के खिलाफ़ रोये गाये..

आप खुद सोचिये क्या अश्लील था उस चुम्बन में.. आपने पहले चुम्बन नहीं देखा.. सबने देखा है.. स्त्री पुरुष का अश्लील सहवास भी चोरी छिपकर अपनी मर्जी से देखा है.. और तो और आजकल अखबारों तक में नंगी तस्वीरें छ्पना आम बात है.. कोई आवाज़ नहीं उठाता.. तो किस बात के लिये हुआ इतना सब नाटक.. इतना सब पाखण्ड..

आपको शायद याद न हो तो याद दिला दूँ.. ये घटना है १६ अप्रैल २००७ की .. और उस से एक रोज़ पहले उत्तर प्रदेश के किसी दूर दराज़ के इलाक़े में हमारे सुन्दर राजकुमार राहुल बाबा ने अपने ओजस्वी वाणी में दो चार बातें उनके परिवार और पाकिस्तान के विभाजन के सम्बंध से कहीं थी.. जिसके चलते उनकी राजनैतिक समझदारी और वाकपटुता के संदर्भ की सारी पोल पट्टियां उजागर हो गईं ..

न सिर्फ़ देश के भीतर के गैर काँग्रेसी दल बल्कि पडो़सियों को भी सरकार और काँग्रेस को गरियाने का एक अच्छा मौका मुह्य्या हो गया था.. लगा कि न सिर्फ़ यू पी बल्कि देश की सत्ता पर से काँग्रेसी दावे का शेर लड़खड़ा कर ढेर हुआ जाता है.. पर इस शिल्पा शेट्टी और रिचर्ड गियर के चुम्बन ने उसे पूरी तरह आच्छादित कर दिया..

आप को लगता है कि ये सिर्फ़ एक संयोग था.. और इसके पीछे कोई मंच संचालन नहीं था.. मेरे मित्र इसे संयोग नहीं मानते.. उनका खयाल है कि आम जनता का ध्यान मुद्दो से हटाने के लिये उन्हे जान बूझ कर गैर राजनैतिक मुद्दो में फँसाया जा रहा है.. जैसे कि सरकार का मेहनत मशक्कत कर के सुनिश्चत करना कि दूरदर्शन पर क्रिकेट का सीधा प्रसारण हो.. ये सारा कुछ एक तयशुदा नीति के तहत किया जाता है .. और ये भी एक ऐसा ही मामला है..

आप इससे सहमत हों कोई ज़रूरी नहीं मगर एक बार फिर से सोचे.. और विशेषकर वे लोग जो नारद जैसे मंच में भी एक षडयंत्र खोज लेते हैं.. आप के लिये अच्छा मसाला है..

5 टिप्‍पणियां:

Mired Mirage ने कहा…

मंच संचालन के विषय में तो पता नहीं किन्तु जो लोग अत्याचार,बलात्कार के विरूद्ध मुँह नहीं खोलते उन्हें शिल्पा जी के सम्मान की इतनी चिन्ता क्यों सताई समझ नहीं आता ।
घुघूती बासूती

Piyush ने कहा…

अभय भाई,
आपकी बात सौ आने ठीक है...
लेकिन, दो असहमतियां भी हैं...
पहली,टीवी पर विजुअल की महिमा आप जानते हैं-लिहाजा राजकुमार पर शिल्पा भारी पड़ गईं।
दूसरी यह कि अपने गेयर ने पहली बार यह हरकत नहीं की। एक बार जनबा बिपाशा को भी लपेटने की कोशिश कर चुके हैं। विजुअल गवाह हैं। इसलिए सबको हमबिस्तर करने वाली बात भी थोड़ी ज्यादा है।
-पीयूष

sarika ने कहा…

Abhay aap likhtee thoda bhari hain. Yadi hindi saral ho to hi nirmal aanand aa sakta hain. Mujhee kuchh samay lageega aap ka blog padnee aur samajnee mein...

...phir miltee hain.

बेनामी ने कहा…

मैं कोई कुलवक्ती यानि होलटाइमर पत्रकार नहीं हूँ भाई इसीलिए आप द्वारा उठाए गए मुद्दे पर बोलने का अधिकारी मैं शायद नहीं हूँ । होना तो यह चाहिए था कि आप के मुद्दे पर रवीश अविनाश,बोधिसत्व या खबरिया चैनलों में काम कर रहे अन्य पत्रकार मित्र करते पर लगता है कि इन लोगों ने न बोलने का मन बना लिया है इसलिए मैं अपनी जैसी भी समझ है कुछ कह रहा हूँ ।

1- खबरें किनके खिलाफ नहीं चलतीं
अ- वे लोग जिनकी पकड़ कॉरपोरेट वर्ल्ड पर हो अक्सर खबरिया चैनलों के मध्यवर्गीय संपादक ऐसे लोगों के खिलाफ खबरें नहीं चलाते ।अगर चलाते भी हैं तो ऐसी भाषा में जिनमें आक्रामकता का नामोनिशान भी न हो। खबर चलने के दौरान कोई ना कोई फोन उस समय के ऑउट पुटएडीटर को गालियाँ दे रहा होता हैऔर ऑउट पुट एडीटर माफी मांग रहा होता है ।और खबर थोड़ी ही देर में लुढ़क जाती है।
ब- बड़े औद्योगिक घरानों के खिलाफ कोई भी खबर कभी नहीं चलती। जो खबर चलेगी वो खुश करने के लिए । बड़े औद्योगिक घरानों के मुखिया की उड़ान और देवालयों की परिक्रमा का प्रसारण कभी भी छोड़ा नहीं जा सकता ।रतन टाटा और सिंहानिया की उड़ान और रिलायंस के अनिल भाई धीरूभाई अंबानी की तीर्थयात्रा हो या पारिवारिक तकरार दोनो खबरो में सिर्फ अच्छी-अच्छी बातें की जाती हैं । तीर्थ यात्रियों और श्रद्धालु भक्तों को दर्शन में हुई देरी के लिए सिर्फ अमिताभ बच्चन को ही निशाना बनाया जाता है । जबकि अनिल भाई भी उस मंदिर में दर्शन के लिए अमिताभ परिवार के साथ गए होते हैं । लेकिन किसी चैनल के संपादक के बस में नहीं कि वह अनिल भाई के खिलाफ कुछ भी बोल सके।
स-अक्सर शुरु के दिनों में हर पत्रकार किसी ना किसी नेता की लटकन हुआ करता है । आप चाहें तो पता कर सकते हैं कि किस पत्रकार को किस नेता ने प्रमोट किया है । बड़े पदों पर पहुंच जाने के बाद भी संपादक को अपने प्रमोटर नेता को याद रखना पड़ता है ।
द-जिन दलों के पास पाले हुए गुंडे कार्यकर्ता हों उनके खिलाफ कोई भी चैनल कोई भी खबर नहीं दिखाता । आप उदाहरण ले सकते हैं शिवसेना प्राइवेट लिमिटेड के मालिक बाल ठाकरे का । उनके खिलाफ खबर दिखाने की हिम्मत कोई भी चैनल नहीं दिखाता । अभी तो स्टार को तोड़ कर रख देनेवाले धनन्जय देशाई पर भी कोई खबर नहीं चलनी है ।आप बताए कि धनन्जय के खिलाफ क्या किया पुलिस या खबरिया चैनलों ने ।
य- सूचना और प्रसारण मंत्री भी इसी तरह का एक डरावन शब्द और पद है खबरिया चैनलों के लिए।
इस मंत्री के खिलाफ तो छोड़ दीजिए उसके आस-फास मडराने वालों के भी खिलाफ कोई खबर नहीं चल सकती भाई ।
र-कुछ चैनलों के संपादकों का मानना है कि राजनीतिक खबरों को कौन देखता है। यानि खबर बड़ी हो या छोटी उसमें मनोरंजन का पुट होना ही चाहिए । तभी तो अमर सिंह की भड़ैती और लालू की लंठई हमेशा चलनेवाली खबरें होती है।
ल-एक राजनैतिक बयान पर चुम्मा-चाटी की खबर कफन बन कर छाएगी ही और राहुल बाबा को नाराज करने की ताकत किस संपादक में है...कल का प्रधान मंत्री है राहुल ।
ल-बाबाओं और संतों के खिलाफ भी चैनल अक्सर मौन रहते हैं । बोलते हैं तो पक्ष में । आप चाहें तो बाबा रामदेव और बृंदा कारात की भिड़त में चैनलों का चरित्र आंक सकते हैं । आखिर बृंदा कहां गलत थीं और बाबा रामदेव कहां सही था । तय है कि बाबा से कुछ मिल सकता था बृंदा से नहीं इस लिे लाइन तो फायदेवाली ही लेनी होगी । इसी तरह परमपूज्य आशाराम बापू के जमीन संबंधी खबर से चैनलों के भक्त पत्रकार कब उतर गए समझ नही आया। आशा राम बापू ने आश्रम की जमीन किसानों को सौपी या नहीं कौन पूछे ।
तो भाई अभय
पत्रकार भी इंसान है और वह लोभी भी हो सकता है ।उसकी की भी तो त्रृष्णा होगी , सपने होंगे। आपकी प्रतिबद्धता के फेर में वो अपने भविष्य पर लात नहीं मार सकते ।
एक बात और पर्दे पर दिख रहे पत्रकार की कोई हैसियत नहीं होती। ुनके कान में एक वायर लगा होता है जिसपर अपने कमरे में बैठा संपादक या उस समय का इंचार्ज अपने हिसाब से दिशा निर्देश देता रहता है।
यह सवाल प्रश्न के परे है कि चल रही बड़ी खबरे बनावटी होती हैं उन्हे सजा सवांर कर पेश करने के लिए कुछ सुंदर चेहरे और कुछ सुंदर शब्द होते हैं बस

ओम ने कहा…

ये अक्षरश: सत्य है कि शिल्पा की ख़बर से ज़्यादा ज़रूरी मसले हैं बात करने के लिए। जिस दिन ये ख़बर दिखाई गई उस दिन भी दूसरी बेहतर ख़बरों की कमी नहीं थी। ये दुर्भाग्य है मीडिया के लिए। लेकिन रिचर्ड गियर की हरकत (और अगर वो अनजाने में हुआ तो इस पर चुप्पी साध लेना) और इस वाक़ये के बाद शिल्पा के बदलते बयानों के बारे में भी कुछ कहा जाना चाहिए। मैंने कहा था- यहां (http://kharikhoti.wordpress.com) पढ़ कर देंखे कहीं आप भी मुझसे इत्तेफ़ाक़ तो नहीं रखते।

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