बुधवार, 7 अप्रैल 2010

सड़कों पर नाचते पाकिस्तानी

यह कोई तंज़ या कटाक्ष नहीं है। यह हो रहा है। पाकिस्तान की सड़कों और बाज़ारों में नौजवान लड़के नाच रहे हैं और लड़कियां भी। जी, लड़कियां भी। आज कल एक पाकिस्तानी को लेकर बहस भी गर्म है और लोग डरे हुए हैं कि वो शौएब मलिक हमारी अकेली टेनिस स्टारलेट प्यारी सानिया मिर्ज़ा को पाकिस्तान ले जाकर बुर्क़े में क़ैद कर देगा। यह वीडियो उन भीति आत्माओं के भय-शमन के लिए।



इस से यह पता चलता है कि हम पाकिस्तान के बारे में कितनी एकाश्मी राय रखते है। ये बात सही है कि पाकिस्तान में एक बड़ा तबक़ा औरत को बुर्क़े में बंद रखने और देश में इस्लामी क़ानून लागू रखने का ही हिमायती है, लेकिन साथ ही साथ एक दूसरा अभिजात वर्ग भी है जो उस पुरातन संस्कृति से उस तरह इत्तफ़ाक़ नहीं रखता। कह सकते हैं कि जैसे इस देश में संस्कृतियां वर्गो से विभाजित हैं वैसे ही उस देश में भी।

इसी तर्क को थोड़ा खींच कर यह भी कहा जा सकता है कि पाकिस्तान में चल रहा ख़ूनी संघर्ष एक तरह का ‘सांस्कृतिक संघर्ष’ है। अभिजात वर्ग के द्वारा पोषित नई पूँजीवादी संस्कृति और आम जन की मध्ययुगीन इस्लामी संस्कृति के बीच। इस नज़रिये से उन घनघोर मार्क्सवादियों (सभी नहीं, कुछ) को क्या कहा जाएगा जो इस संघर्ष में अमरीका की पूँजीवादी संस्कृति के विरुद्ध लड़ने वाले तालिबान के पक्ष में खड़े नज़र आते हैं?

ये नाच असल में कोका कोला का एक कैम्पेन है। इसकी पूरी रपट यहाँ देखें जहाँ और भी वीडियो हैं।

9 टिप्‍पणियां:

संजय बेंगाणी ने कहा…

नई मुक्त संस्कृति और मध्ययुगीन संस्कृति के बीच संघर्ष क्यों नहीं कह सकते?

डॉ .अनुराग ने कहा…

मै इसे बर्बाद होते एक देश के लोगो में देशभक्ति का एक अनावश्यक इन्फ्युज़न कहूँगा जो तात्कालिक ओर जरूरी मुद्दों से परे ....मुद्दों के बाजारीकरण का एक नमूना है ....जिसमे कई लोगो का चतुराई से इस्तेमाल है

Arvind Mishra ने कहा…

एकाश्मी या जीवाश्मी !

Anurag Geete ने कहा…

कहते है ज़िन्दगी अपना रास्ता खोज ही लेती है.... आप चाहे लाख दबाने की कोशिश करो.... पाकिस्तान इतिहास की कई गलतियों का नतीजा है, और उसका भविष्य भी कई गलतियों से मटियामेट हो चूका है, पर ज़िन्दगी को चाहिए, उमंग, ख़ुशी, उत्सव... जाहिर है पाकिस्तानी भी कब तक अपनी और सियासतदानोकी गलतियों का मातम मनाएंगे... थोडा तो उन्हें भी हक़ है झुमने का.

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

इसी तर्क को थोड़ा खींच कर यह भी कहा जा सकता है कि पाकिस्तान में चल रहा ख़ूनी संघर्ष एक तरह का ‘सांस्कृतिक संघर्ष’ है। अभिजात वर्ग के द्वारा पोषित नई पूँजीवादी संस्कृति और आम जन की मध्ययुगीन इस्लामी संस्कृति के बीच। इस नज़रिये से उन घनघोर मार्क्सवादियों (सभी नहीं, कुछ) को क्या कहा जाएगा जो इस संघर्ष में अमरीका की पूँजीवादी संस्कृति के विरुद्ध लड़ने वाले तालिबान के पक्ष में खड़े नज़र आते हैं?
असली बात तो इसी बात में है.

रंजना ने कहा…

सही कहा आपने....
वहां भी एक ऐसी जमात है जो आधुनिकता की पक्षधर है..

सोनू ने कहा…

सही बात है। अमीर और अंग्रेज़ीदाँ लोगों ने भारत की तरह वहाँ भी विषमता ही पैदा की है।

सुलभ § सतरंगी ने कहा…

अगर बात सांस्कृतिक संघर्ष की है तो कौन किसकी संस्कृति को नष्ट करने पर आमादा है.

जरुरत है सिर्फ पुरानी संस्कृति से रुढियों को हटाना, समानता और प्रगति से जोड़ना न की पाश्चात्य को बढ़ावा देना. दोनों(हिन्दुस्तानी-पाकिस्तानी) के पूर्वज एक ही हैं.

विजय प्रकाश सिंह ने कहा…

सर जी फ़िर सानिया दुबई क्यों जा रही है , सियालकोट क्यों नही?

असल मुद्दा तो सानिया के पाकिस्तानी बनने का है । अब उसकी जीत, अगर खेली तो, पर भारत वाले खुशी कैसे मनायेंगे । जब कभी फिर मुम्बई जैसा कांड हुआ तो सानिया को कैसे चीयर करेंगे । क्या हम सानिया को चीयर करेंगे और वह शोएब को चीयर करेगी ( जो उसका फ़र्ज़ भी है ) , यह सब एक साथ कैसे होगा । क्या हम सब इतने बड़े संत हो गये हैं या " मजबूरी मे महात्मा " बनए का दिखावा कर रहे हैं ।

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