बुधवार, 31 मार्च 2010

अरुंधति का रूमान

अरुंधति अपने दांतेवाड़ा यात्रा वृत्तान्त का अंत एक ऐसे शाएर की एक मशहूर नज़्म के एक टुकड़े से करती है, जो अपनी रुमानी क्रांतिकारिता के लिए प्रसिद्ध है- फ़ैज़।

वहाँ पाया गया अंश यह है :

हम अहले-सफ़ा मर्दूदे-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख़्त गिराए जाएंगे

नज़्म के इसी तेवर के चलते पाकिस्तान में इस पर लम्बे समय तक बंदिश रही। लेकिन क्या अरुंधति को आभास है कि यह नज़्म इस्लामी क़यामत की धारणा में गहरे तक धंसी हुई है? यह पूरी नज़्म क़यामत के रोज़ होने वाले इंसाफ़ को समर्पित है जिसे ख़ुदा ने अपनी विशालकाय पट्टी (लौहे अज़ल) पर पहले से ही लिख रखा है। इस नज़र से नज़्म में एक तरह का नियतिवाद है। मगर तख़्त ओ ताज उछालने की बात भर से इंक़लाबी बेहद भावुक हो कर अपनी रुमानियत में और उतराने लगते हैं।

फ़ैज़ की रूमानियत को ऐसे और समझा जाया कि उनकी वफ़ात हुए चौथाई सदी गुज़र गई है। तख़्त ओ ताज कई उछले और गिरे लेकिन जो नारा गूंज रहा है पाकिस्तान की फ़िज़ाओं में, वो अनल हक़ का नहीं है। (अनल हक़-अह्म ब्रह्मास्मि- फ़ारस के प्रसिद्ध सूफ़ी मंसूर हल्लाज का वो नारा था जिसकी उद्घोषणा के लिए उसे अनेक यातना देने के बाद मौत के घाट उतार दिया गया था)

क्या यह सिर्फ़ संयोग है कि अरुंधति का दांतेवाड़ा वृतान्त एक रूमानियत पर अंत होता है?

फ़ैज़ की पूरी नज़्म कुछ यूं है:

हम देखेंगे
लाज़िम है के हम भी देखेंगे
वो दिन की जिसका वादा है
जो लौहे-अज़ल पे लिखा है

जब ज़ुल्मो-सितम के कोहे-गरां
रूई की तरह उड़ जाएंगे
हम महकूमों के पांव तले
ये धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहले-हिकम के सर ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी

जब अर्ज़े-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएंगे
हम अहले-सफ़ा मर्दूदे-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख़्त गिराए जाएंगे

बस नाम रहेग अल्लाह का
जो ग़ायब भी है, हाज़िर भी
जो मंज़र भी है, नाज़िर भी
उठ्ठेगा अनलहक़ का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज करेगी ख़ल्क़े-ख़ुदा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो

25 टिप्‍पणियां:

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

आप सही कह रहे हैं,बढ़िया लिखे हैं, लेकिन साथ ही साथ आपको मैं बताता चलूं की यह विचारधारा मुझे कभी रास न आयी.

आशुतोष कुमार ने कहा…

अति,

तुम्हारी मासूमियत बाज़ दफे सचमुच जानलेवा होती है.
क्या ठीकरा फोड़ा है तुम ने फैज़ का अरुंधती के माथे.
अंग्रेज़ी के बड़े बड़े तुर्रम खान भी फैज़ को अरुंधती से कई मक़ाम ऊपर का लेखक तसलीम करते हैं. तुम्हारे लिखे से लगता है जैसे फैज़ को कोट करना अरूंधती के लिखे के किसी अंदरूनी कमजोरी का सबूत हो !जैसे रोमान कोई
कोई निहायत ही अहमकाना तसव्वुर हो !
सपने तो तुम भी देखते हो एक इन्साफपसंद इनसानदोस्त खूबसूरत दुनिया के.न केवल देखते हो बल्कि अपनी सारी मशक्कत और मगजमारी अपने तईं यही सोच कर करते हो की यह सब दो चार कदम आगे पीछे उस सपने की ओर ले जाएगा . वह सपना कभी सच में सच हो जाएगा , ये यकीन तो न तुम्हे होगा न किसी नाकाबिलेसुधार रोमानपसंद को .फिर भी सपने देखना तो जरूरी है .रोमान और क्या है ? महज़ रूमानियत? जब की तुम ठहरे रूमी के शैदाई!
ऊपर से क़यामत ये की तुम्हे फैज़ की शायरी में 'क़यामत ' किसी मियाँ अल्ला की बनायी क़यामत की नक़ल नज़र आरही है. मियाँ , ये वो क़यामत नहीं है , जो अल्ला मियाँ ने किसी लौहे अज़ल पे लिख रखी है .ये क़यामत वो है , जो उन के बूते आनी है , जिन्हें अनलहक का नारा उठाना है, ' जो मैं भी हूँ और तुम भी हो '.कभी इस नज़्म पर प्रणय को पढ़ना.लिंक है- http://samkaleenjanmat.blogspot.com/2010/02/blog-post_14.html

अरुंधती के इस लेख में दिक्कतें हैं. माओवाद के मुतल्लिक जो सब से मुश्किल राह्नीतिक औए वैचारिक सवाल हैं , उन्हें यहाँ एड्रेस नहीं किया गया है.
शायद अरुंधती का मकसद वो था भी नहीं
लेकिन इस लेख ने कम से कम दो बड़े ज़रूरी काम किये हैं .
एक तो यह की उस ने सैंडविच थियरी का कचूमर निकाल दिया है, यानी उदार मध्यवर्ग के इस हसीं ख़याल का की माओवादी और सरकार दोनों लुटेरे हैं, और आदिवासी बेचारे दो पाटों के बीच पिस लेने की सिवा और कुछ करने लायक नहीं हैं.यह साफ़ हो गया है की यह असल में सरकारी और निजी लुटेरों हत्यारों बलात्कारियों के खिलाफ आदिवासियों की हज़ारों सालों से चल रही लड़ाई का ही समकालीन अध्याय है.उस लड़ाई में कान्धा मिलाने जो भी गया, चाहे माओवादी हो या गांधीवादी , आदिवासी उस के साथ जुड़े. और वे क्या करते ?विदर्भ के किसानों की तरह सिलसिलेवार आत्महत्याएं ? की हम उन को हकीक़तपसंद लिख सकें , न की रोमानी ?

दूसरे उस ने इस चीदम्बरी प्रचार की हवा निकाल दी है की माओवादी इंसान नहीं , गुंडे बदमाश बलात्कारी लुटेरे शैतान हैं , और बता दिया है की असल में किस की आतंरिक सुरक्षा के लिए वे सब से बड़ा ख़तरा हैं.

इन दो बातों के लिए पहले तो लाल सलाम कामरेड अरुंधती , लाल लाल सलाम !

आगे बहस भी होगी , सवाल भी होंगे , यानी वह सब जिस का होना इस वक़्त निहायत जरूरी था.

Rangnath Singh ने कहा…

किसी ने सच कहा है कि क्राँन्तिकारी रूमान का मुकाबला एक ही चीज कर सकती है वो है मध्यवर्गीय कूपमण्डूकों का भेड़ियाधसान !!

फैज की जो व्याख्या आपने की है उसके बाद कुछ कहना तो मुँह नुचवाने जैसा होगा। फिर भी आ गया हूँ पयाम करता चलूँ।

अरूँधती के लेख को जिन लोगों ने भी पढ़ा होगा वो आपके कहे के खोखलेपन से स्वमेव वाकिफ हो जाएंगे। फिर भी आपके आग्रह को मान रखते हुए मैं कहुँ कि अरूँधती के लेख से उस नज्म को काट दीजिए। जिससे आपका दिमाग न भटके। और उसके बाद उसमें उठाए गए सवालों के जवाब पर भी कुछ सदुपदेश दीजिए।

कहना न होगा कि आज बहुत से तल्ख सवालों से मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी आँख चुरा रहा है क्योंकि ये सवाल फिल्मी सरपत नहीं हैं,ये असली हैं इन्हें हाथ लगाने से हाथ छिल भी सकता है।

अभय तिवारी ने कहा…

प्रिय आशु,
सपने देखना बुरा नहीं है लेकिन अपने सपने पर इस क़दर यक़ीन करने लगना कि वास्तविकता दिखनी ही बंद हो जाय, ये ज़िद मुझे समझ नहीं आती। हाँ, इस तरह की रूमानियत कभी थी मुझमे, लेकिन मैंने उस से अब तौबा कर ली है। नक्सलबाड़ी भी एक तरह की रूमानियत थी, क्या हश्र हुआ उसका, कलकत्ते के हज़ारों नौजवान उसकी भेंट चढ़ गए।

अब कुछ लोग ऐसे भी होंगे जो मेरी इस बात का अर्थ यह निकाल लेंगे कि कलकत्ता पुलिस के समर्थन में अपनी आवाज़ मिला रहा हूँ, वो तो ग़लत हैं ही लेकिन वो भी ग़लत हैं जो यह सोचेंगे कि मैं चारु मजुमदार पर उन नौजवानों की मौत का कोई इल्ज़ाम नहीं धरता। निश्चित ही चारु बाबू भी ज़िम्मेदार है।

सच्चाई को पूरा-पूरा न देख पाना बल्कि सावन के अंधे की तरह हरा-हरा देखना ही रूमानियत है। इन्ही रूमानियों के लिए कहा जाता है कि इश्क़ हुआ गधी से परी क्या चीज़ है। बात यहाँ इश्क़ के जज़्बे की नहीं प्रेमिका के सौन्दर्य की वास्तविकता की है। प्रेम में ये रूमानियत तो कोई ज़्यादा नुक़्सान नहीं करती- अधिक से अधिक दो लोगों के सम्बन्ध बिगड़ते हैं। मगर राजनीति में रूमानियत एक ख़तरनाक प्रवृत्ति है- इस बार फिर हज़ारों आदिवासियों की जानें दाँव पर लगी हैं। पूँजीवाद और आदिवासियों के इस अन्तरविरोध को खू़न-ख़राबे की हद तक ले जाने वाले लोग में माओवादी ही ज़िम्मेदार हैं। अरुंधति से मेरी यही शिकायत है कि वे राजनीति को रूमानी चश्मे से देख रही हैं।

अरुंधति के सवाल वाजिब हैं।, लेकिन ये लेख कोई नया सवाल उठाता कहाँ है। वो कहती हैं कि उनका कोई पूर्वाग्रह टूटा, मगर कोई भी तो नहीं। लेख पढ़ कर यही समझ आताअ है कि आदिवासी बड़े भले, सीधे, प्यारे, युद्ध के लिए तत्पर लोग हैं, और सरकार उन्हे नाह्क़ परेशान कर रही है, तो इसमें नया क्या है? रंगनाथ जी मुझे मध्यमवर्गीय कूपमण्डूक बता रहे हैं, चलिये वही सही, लेकिन मुझे नहीं लगता कि मध्यवर्ग में कोई भी ये मानता है कि आदिवासी हरामी और कुत्ते कि़स्म के लोग है, उन्हे तो सभी भलामानुस मानते हैं। असली सवाल तो माओवादियों पर है, और उनके बारे में अरुंधति कुछ भी नहीं बतातीं। ये एक तरह की सेलेक्टिव रिपोर्टिंग है। और ये मानने के लिए मत कहियेगा कि आदिवासियों के सिवा कोई और माओवादी नहीं है। सारे हथियार और राज्य सत्ता से संघर्ष की पूरी अर्थव्यवस्था वो जंगल में ही उत्पादित कर चला रहे हैं। उनके लेख का अंत ही नहीं पूरा लेख एक रूमानी चश्मा पहन कर ही लिखा गया है। इसीलिए मेरा सवाल है - "क्या यह सिर्फ़ संयोग है...?" (भाई रंगनाथ ध्यान दें)

क्या आप बता सकते हैं कि इस ऑपरेशन ग्रीनहंट का क्या अंजाम होने वाला है? आप मुझे निराशावादी, पराजित सोच रखनी वाला के मध्यमवर्गीय कूपमण्डूक मान सकते हैं, लेकिन मै इस तरह होने वाले खूनख़राबे के पक्ष में नहीं हूँ। कुछ लोग आदर्शों के आगे जान की क़ीमत कुछ नहीं मानते, मैं उस मत का अनुमोदन नहीं करता। जीवित रहना आदमी का सर्वोच्च लक्ष्य है, हालांइ उसमें लक्ष्य जैसा कुछ है नहीं। लक्ष्य या आदर्श एक काल्पनिक क्षितिज है जबकि जीवन सतत शाश्वत वर्त्मान।

रही बात फ़ैज़ की, तो फ़ैज़ की पहली ट्रेनिंग सूफ़ी मत में है, बाद में वामपंथ में। इस्लाम के ज़रिये क्रांति तक पहुँचना चाहते थे फ़ैज़, ऐसे संकेत हैं। और ये नज़्म भी वही संकेत है। मुझे रूमी पसन्द ज़रूर हैं लेकिन इसका ये अर्थ नहीं कि मैं आने आले कल की कल्पना सूफ़ी सिद्धान्तों पर करता हूँ। रूमी से प्यार बीते हुए कल को, अपनी परम्परा को बेहतर समझने के अन्दाज़ में है।

इस नज़्म में साफ़-साफ़ कहा जा रहा है कि 'बस नाम रहेगा अल्लाह का'.. फिर आप को लग रहा है कि ‘धर्म को अफ़ीम' मानने वाले मार्क्सवादियों के लिए ये समुचित नारा है, तो आप को कौन रोक सकता है। और आप को लगता है कि मैं फ़ैज़ को ठीक नहीं समझ पा रहा हूँ तो कोई बहुत बड़े संकट की बात नहीं है। इस उत्तर आधुनिक युग में किसी भी कृति के कई पाठ होने ही चाहिये।

रंगनाथ जी, ऊपर कही बातों में आप का भी जवाब है।

BIRENDRA ने कहा…

"मध्यवर्गीय कूपमंडूकता"...सिरिमान जी ने ऊंची बात कह दी.

अजित वडनेरकर ने कहा…

"इस नज़र से नज़्म में एक तरह का नियतिवाद है"
अरुंधती का पूरा वृत्तांत पढ़ने के बाद यही सोच बनी थी। वृत्तांत तो अच्छा है, पर वहां
इसका संदर्भ पढ़ कर ऐसा ही लगा था।
आपने एक पंक्ति में बहुत कुछ स्पष्ट किया।

स्वप्नदर्शी ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
अनूप शुक्ल ने कहा…

उत्तर आधुनिक युग में किसी भी कृति के कई पाठ होने ही चाहिये।
से एकदम और फ़टाक से सहमत।

तुलसीदास जी की चौपाई ढोल-गंवार शूद्र पशु नारी के आधार पर मैं तुलसीदास जी को स्त्री-विरोधी और दलित विरोधी मानता था। लेकिन स्व.आचार्य विष्णुकांत शास्त्री जी ने एक वक्तव्य में समझाया कि श्रेष्ठ रचनाकार अपने अनुकरणीय आदर्श अपने आदर्श पात्र से कहलवाता है। यह बात समुद्र के मुख से कवि ने कहलवायी है जो कि अधम पात्र है अत: यह कवि का मंतव्य नहीं है न उसका आदर्श।

इसके बाद से मुझे लगा कि देश/काल और परिस्थितियों के अनुसार एक ही कृति के अनेकानेक व्याख्यायें हो सकती हैं। सुन्दर पोस्ट और विचारोत्तेजक टिप्पणियां!

http://hindini.com/fursatiya/archives/63

Sanjeet Tripathi ने कहा…

mai aur kuchh na kahte hue bas apni ek purani post ka link dena chahunga, agar samay mile to
is post ko aur is par aaye comments ko padhiyega...

अरुंधति राय,लेखिका,मानवाधिकार कार्यकर्ता व एक्टिविस्ट के नाम एक छत्तीसगढ़िया का पत्र
http://sanjeettripathi.blogspot.com/2009/04/blog-post_08.html

Rangnath Singh ने कहा…

बड़े-बड़े विद्वान,
तुम्हारी...
बहुत हुआ सम्मान,
तुम्हारी... -

इस विद्रोही तेवर की अनुगूँज मुझे दूर-दूर तक सुनाई दी है, सुदूर मुम्बई तक भी। भाषा की मुख्यधारा में पड़े हुए और उस से अड़े हुए दोनों तरह के लोगों के भीतर। इस तरह की ज़बरदस्त मक़बूलियत अच्छे-अच्छे साहित्यकारों की नहीं है जो साहित्य के शीर्ष पुरस्कार पाने के बाद भी जनता के प्यार और स्वीकृति से कटे होने के कारण एक प्रकार की कुण्ठा में जीते हैं। चकाचक की घोषणा शायद उन को भी सम्बोधित है कि बहुत हुआ सम्मान। लेकिन यह कहना मुश्किल है कि चकाचक सभी तरह की कुण्ठा से मुक्त हो कर वैकुण्ठ हो गए होंगे। मुझे पता लगा है कि एक उनका एक संग्रह ही प्रकाशित हुआ और वो भी बहुत बाद में; सन २००४ में उनकी मृत्यु के कुछ पहले ही और उसमें भी उनकी सबसे लोकप्रिय कविताओं को जगह नहीं थी। वे सिर्फ़ लोगों के दिलों, ज़ुबानों और गुप्त खर्रों में ही बसी रहीं। ये वहीं चकाचक हैं जिनकी एक और कविता का मुखड़ा बहुत लोकप्रिय हुआ है:

हर अदमी परेसान ह
हर अदमी त्रस्त ह
मारा पटक के
जे कहे पन्द्रह अगस्त ह - चकाचक बनारसी

Rangnath Singh ने कहा…

ऊपर लिखी पँक्तियाँ मेरी नहीं है, ये अभय जी ने अपने एक लेख में लिखी थीं। अपने उस लेख में अभय जी चकाचक चाचा के माध्यम से लोकभावनाओं का स्वरूप स्पष्ट करने की कोशिश की थी। कहना न होगा कि चकाचक की शुरूआती चार पंक्तियांे उन लोगों को समर्पित हैं जिनमें मैं भी शामिल हूं। अंत में दी गयी चार पंक्तियां भी हमारे जैसे लोगों को ही समर्पित हैं जो जनता को स्वतंत्रता(लोकतंत्र) की दर्दनिवारक गोली देते नहीं थकते।

अपने लेख में अभय जी ने भी माना है कि "इस विद्रोही तेवर की अनुगूँज मुझे दूर-दूर तक सुनाई दी है, सुदूर मुम्बई तक भी। भाषा की मुख्यधारा में पड़े हुए और उस से अड़े हुए दोनों तरह के लोगों के भीतर"
मैं अभय जी की व्याख्या से पूर्णतः सहमत हूँ। उनकी बात में कुछ जोड़ना ही हो तो मैं यह जोडुंगा कि जनभावनाएं देशकाल के अनुसार अलग-अलग शिल्प में मुखरित होती रही हैं। बुद्धिजीवियों की मुख्यधारा उस शिल्प को स्वीकारे या नकारे इससे जनता को कोई फर्क नहीं पड़ता।

Rangnath Singh ने कहा…

सरकारी आंकडों को ही सच मानते हुए भी भारत के सत्तर प्रतिशत लोगों से कई हजार गुना ज्यादा अमीर होने के कारण मैं पूरा मुद्दे को अकैडमिक डिस्कोर्स के खांचे में ही बांध कर प्रस्तुत करूंगा।

इसलिए जेरे-बहस प्रश्न ये है कि आदिवासियों के अस्तित्व से जुड़े प्रश्नों का समाधान देने में लोकतंत्र ने देर कर दी या फिर माओवादी आदिवासियों के पास समय से पहले पहुंच गए ??

अब यदि माओवादी आदिवासियों के पास लोकतंत्र से पहले पहुंच गए हैं तब भी मुझे इससे आगे कुछ नहीं कहना। लेकिन मामला इसके उलट है यानि लोकतंत्र ने आदिवासियों के पास पहुंचने में देर कर दी है तो फिर भी मुझे इसपर कुछ नहीं कहना क्योंकि अभय जी ने ही अपने कमेंट में लिखा है कि -
"जीवित रहना आदमी का सर्वोच्च लक्ष्य है"

Rangnath Singh ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
स्वप्नदर्शी ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
अभय तिवारी ने कहा…

मैं एक बार साफ़ करना चाहता हूँ कि मैं अरुंधति का विरोध नहीं करता। न ही यथार्थ के आगे पूरी तरह समर्पण का हिमायती हूँ। मेरा कहना बस ये है कि यथार्थ का आकलन रूमानी चश्मे से न किया जाय क्योंकि वैसे यथार्थ का सही आकलन नहीं हो पाता और जो क़दम उठाते हैं वो नु़क्सानदेह साबित होता है। जो होता रहा है। अगर एक रियलिस्टिक एप्रोच अपनाई जाय तो जान-माल (माल तो उनके पास है ही क्या?) की हानि कम होगी।

मैं माओवादियों और अरुंधति को तो रूमानी मानता हूँ मगर आदिवासियों को नहीं.. वे तो अपने यथार्थ से जूझ रहे हैं, बस उन्हे खाई की तरफ़ रास्ता दिखा के गिराया जा रहा है, ऐसा मुझे लगता है। रूमानी तो वे हैं जो दूसरों की लड़ाई लड़ रहे हैं। मैं सब तरह से स्वप्न का विरोधी हूँ ऐसा भी नहीं है। लेकिन सुकरात और स्पार्टाकस को ठीक-ठीक स्वप्नदर्शी कहा जा सकेगा, मुझे शक़ है।

अपने पढ़ने वालों की टिप्पणी बड़ी अहम मानता हूँ मैं, जिन्होने दे कर वापस ले ली, उस का दुख हुआ। इसी लेने-देने पर एक बड़ा अच्छा शेर है, विषय से हट कर, निज़ामी बन्धु की क़व्वाली से। मुहम्मद की स्तुति में अल्लाह की चर्चा हो रही है..

ख़ुदा तो ज़िन्दगी देता भी है लेता भी है लेकिन
मेरे सरकार जो देते हैं, वापस नहीं लेते

Rangnath Singh ने कहा…

अभय जी,मैंने आपके कमेंट के जवाब में लिखने की कोशिश की वह लेख से लम्बी हो गई। मैं सोच में पड़ गया। मुझे बचपन में खेला विष-अमृत का वह खेल याद आने लगा कि जिसमें सिर्फ छू भर देने से गोइंया जी या मर जाता था ! काश कि ऐसा ही राजनीतिक बहसो में संभव होता। काश कि मुझे वो अदा आती कि जिस अदा से आपने कुल बारह लाइनें लिख कर अरूँधती के बत्तीस पेज के निबंध को विष का देने का असफल प्रयास किया !!

अभय जी आपने रोमांटिसिज्म के नाम पर काफी कुछ लिखा है। मैं सोचता हूं कि जहां से हम और आप देख रहे हैं वहां से नजारे नजारे कुछ और नजर आएं तो आश्चर्य नहीं। लेकिन एक बार कुतुबमीनार से नीचे उतर के देखा जाय तो लोकतंत्र भी एक कम रोमांटिक ख्याल नहीं !!

लोगों मे दो तरह के मतभेद होते हैं एक डिफरेंस आफ ओपियिन औद दूसरा,डिफरेंस आफ बिलीफ। डिफरेंस आफ ओपिनियन हो तो उस पर फौरी बहसें की जा सकती हैं। यदि डिफरेंस आफ बिलीफ हो उसमें कोई फौरी बदलाव होना मुश्किल होता है। क्योंकि विश्वास बनने-टूटने में एक लम्बा वक्त लगता है। अतः मैं ये बातें किसी बहस के तहत नहीं लिख रहा। मैं अपना मत साफ कर रहा हूं। बस। यह भी कहना चाहुंगा कि मेरी किसी बात को व्यक्तिगत न लें।

आशुतोष कुमार ने कहा…

अति,
१.पूँजीवाद और आदिवासियों के इस अन्तरविरोध को खू़न-ख़राबे की हद तक ले जाने वाले लोग में माओवादी ही ज़िम्मेदार हैं . ऐसा तुम ने लिखा है.
.माओवाद इस दुनिया में पिछले चंद दशकों से ही है. आदिवासियों का खूरेंज़ उलगुलान सदियों से जारी है .कल हों सकता है , माओ वाद न रहे , उलगुलान रहेगा.
तब तुम्हारे जुमले को क्या कहा जाए , रोमानी या रियलिस्टिक ?
२. अगर माओवादी ज़िम्मेदार हैं , तो उन्हें दंडक को विदर्भ बन ने से बचालेने का श्रेय दिया जाए ,या कलंक?
३. फैज़ ने लिखा - बस नाम रहेगा अल्ला का .
उन ने यह नहीं लिखा - बस अल्ला का नाम रहेगा .

इन दोनों में जो फर्क है , वह रोमानी है , या रियलिस्टिक?

बोधिसत्व ने कहा…

यह तो आपकी बात पर ही खून खराबा शुरू हो गया है भाई। क्या यह दूसरों के विचारों पर हथियार लेकर चढ़ बैठना न हुआ। इस कविता की पंक्तियों की साखी से जो बातें आपने कहीं है वे फैज को पढ़ने के लिए एक नया रास्ता देते हैं। चूँकि आप अब तक चले आ रहे आह आह और वाह वाह से थोड़ा अलग हट कर फैज साहब पर सवाल उठा रहे हैं और अरुंधती को भी प्रश्नों के दायरे में ले रहे हैं तो....गुनाह कर रहे हैं।
भाई आज का दौर है सोचो मत बस गुनगान करो।
फैज को रोमैंटिक कह कर आप अपने जनवादी भाइयों के हाथ से एक खंजर छीन कर उन्हें निहत्था कर रहे हैं। हालाकि आप गलत नहीं कर रहे हैं।
फैज की यह रचना एक नियतिवादी एप्रोच से लिखी गई है। भाइयो जब सब तय है तो लड़ना क्यों। बस बैठो और देखो। और गाओ कि हम देखेंगे।
मेरे गाँव में एक बूढ़ी दादी थीं, वे अक्सर कहती थीं-
एक दिन ठाकुर के किरौना पड़े
एक दिन देखे ए मरि जइहँ और और भगवान के घर देर बा भइया लेकिन नियाउ त होए। राम सब बरोबर कइ देइह....
फैज साहब का सुर कम से कम यहाँ तो मेरी गीँव की उन दादी जैसा ही है।
आप विचार करना और उसे पेश करना न छोड़ें...।
60 साल से पूरा देश देख रहा है
उसके पहले हजार साल से लोग देख रहे हैं
लेकिन बस देख ही रहे हैं
न तख्त गिरा न ताज उछला
क्योंकि इसके लिए केवल देखना नहीं होता कुछ करना होता है।

अभय तिवारी ने कहा…

भाई आशु,

कल तबियत कुछ नासाज़ रही है। देरी से जवाब देने के लिए माफ़ी चाहता हूँ।

पहले सवाल का जवाब तो देना बड़ा मुश्किल है, कल क्या होगा, कौन कह सकता है। एक समय मैं ज्योतिष में ख़ूब उलझा रहा था। मैंने पाया कि जानवरों पर तो सितारो-ग्रहों आदि की गति का प्रभाव तो पड़ता है मगर देश-समाज आदि पर भी पड़ता है, ऐसा मैं नहीं मानता, कुछ लोग मानते हैं, और घटनाओं, देशों आदि की भी पत्री बनाते हैं। उन से पूछा जा सकता है, लेकिन वो मक्कार कुछ भी ठीक-ठीक बता सकेंगे, शक़ है।

माना कि आप जो कह रहे हैं वही हो गया, तो उस से मेरी आज के आकलन पर क्या फ़र्क़ पड़्ने वाला है? वैसे एक बात और ये है कि आदिवासियों की ज़मीन हड़पने का काम कृषि समाज ने ज़्यादा किया है। और इसके आदिम साक्ष्य कृष्ण और अर्जुन द्वारा तक्षक के वन को जलाये जाने में मौजूद हैं। उत्तर भारत में गंगा का मैदान कभी जंगलों से भरा पड़ा था, आज सपाट खेत ही खेत हैं, कहाँ गए आदिवासी। राम अयोध्या से निकलते हैं और वनवास शुरु हो जाता है-चित्रकूट उनका वनवास है। आज का चित्रकूट देख लीजिये। अब आदिवासी वहीं बच रह गए हैं जो ज़मीन कृषि के लिए बहुत उपयोगी नहीं है। कृषि समाज की लूट के बाद बचे-खुचे संसाधन पर औद्योगिक समाज क़ब्ज़ा चाहता है।

वैसे उलगुलान माने होता क्या है?

ये बात आप की सही कि पूँजीवाद की निर्मम नीतियों के चलते ही विदर्भ और देश के दूसरे कोनों में बड़ी संख्या में किसान आत्महत्या कर रहे हैं। आदिवासी इलाक़ो में पूँजी के प्रवेश का ठीक यही परिणाम होगा, ये नहीं माना जा सकता। क्योंकि वे आदिवासी से किसान में नहीं सम्भवतः मज़दूर में बदलेंगे। दोनों की सीधी तुलना नहीं की जा सकती।

फ़ैज़ साहब की लाइन में आप के द्वारा बताए महीन फ़र्क को समझने में मुझे दो पल लगे, लेकिन समझ गया। फ़र्क़ है। लेकिन वो आप देख रहे हैं, एक आम मुसलमान के लिए ये तो आम बात है। अगर उन्हे अल्ला के विलुप्त होने की बात साफ़ करनी थी तो वे ये भी कह सकते थे कि -'न नाम रहेगा अल्ला का'। आप एक स्थापित भ्रम को मनवाने के लिए कुछ ज़िद कर रहे हैं। नज़्म लौहे अज़ल से शुरु होती है, क़यामत के रोज़ इंसाफ़ के वाएदे की बात करती है, काबे से बुत उठवाने की बात करती है, ज़ालिमों को सज़ा देने की बात करती है, और अल्ला के सिवा सब के नाम मिट जाने की बात करती है। ये सब क़ुरान की बाते हैं, फिर भी आप कहते हैं कि इस्लाम का डिसकोर्स नहीं है? एक अनल हक़ को छोड़ कर सब कुछ बहुत ही कॉनफ़ॉर्मिस्ट बाते हैं। अनल हक़ भी इस्लाम की एक धारा है, जिसे उसकी शुरुआत में तो काफ़ी प्रतिरोध सहना पड़ा, मगर अब अच्छे से असिमिलेट हो गई है।

जैसा कि ऊपर बोधिसत्व ने कहा ये वैसे ही है कि 'एक दिन साले को कीड़े पड़ेंगे'।

और इन दोनों में जो सूक्ष्म फ़र्क़ आप देख रहे हैं वो है नहीं। इस्लाम में अल्ला की मूर्ति नहीं बनती, नाम ही होता है। और उसका काबा होता है, उसकी क़यामत होती है, और उसका इंसाफ़ होता है। सब तो है। फ़र्क़ कहाँ है?

आशुतोष कुमार ने कहा…

अति ,
'बहस में जिद्दीपन' बुरी चीज़ है. 'बहस की जिद' मगर जरूरी है.दोनों में फर्क बारीक मगर बुनियादी है.

अरुंधती और फैज़ पर सवाल उठाना तो उत्तर आधुनिकता है . लेकिन इस सवाल पर सवाल करना खून खराबा है, दूसरों के विचारों पर ' हथियार लेकर चढ़ बैठना है'. ऐसा वाक्य हिंदी का कोई चिरयुवा कवि ही लिख सकता है . इस मुहावरे में 'विचारों ' का मानवीकरण तो है ही, 'प्रतीकात्मक बिम्बात्मकता ' के साथ 'र -अनुप्रास की छटा' भी देखने लायक है.ऊपर से विचार और हथियार का अद्भुत तुकांत! प्यारा दोस्त और कवि है बोधी.आजकल जनवादियों की नुक्ताचीनी भले करने लगा हो , खुद पक्का जनवादी है.जनकवि चिरकीन से उस का लगाव देखो. अब उसे थोड़ी रूचि चकाचक बनारसी में भी लेनी चाहिए . इस से भाषा की व्यंजना शक्ति और बेहतर हो पायेगी.


उर्दू- फारसी शायरी में मज़मून और मानी के बीच जो फर्क होता है, उसे तुम मुझ से बेहतर जानते हो.तुम उर्दू फ़ारसी जानते हो , और इन ज़बानों में जो बढ़िया शायरी हुयी है , उसे प्यार भी करते हो.क़यामत का मज़मून पुराना है. यह कोई इस्लाम की खोज नहीं है. यह एक आर्केटाइप यानी आद्यबिम्ब है , जो सभी संस्कृतियों में मिलता है. कबायिलियों में भी. इस्लाम ने उसे ईश्वरीय न्याय के एक रूपक की तरह विकसित किया है. तुम सहमत होगे की ईश्वरीय न्याय की अवधारना में दुनियावी अन्याय के प्रतिरोध का भी एक इशारा है. इन्ही इशारों के चलते धर्म को ' हृदयहीन संसार का ह्रदय'['कार्ल मार्क्स'] भी कहा गया है. सूफी इन्ही इशारों को लेकर चले थे. उन्होंने कुरान शरीफ की एक अपनी काव्यात्मक व्याख्या विकसित की थी.भय की जगह प्रेम का नारा बुलंद कर के मानव मुक्ति की एक राह खोजनी चाही थी, जिस में बन्दा खुदा के आगे समर्पण नहीं करता खुद खुदा हो जाता है. अनलहक. फैज़ ने इस मज़मून को अपने समय के सन्दर्भ में नए मानी दिए . यह नज़्म पाकिस्तान की जियाशाही के खिलाफ अवाम की आवाज़ यूँ ही नहीं बन गयी थी. राज करेगी खल्केखुदा . अवाम . न कोई तानाशाह , न कोई खुदा. कविता कविता है, भाषण नहीं. महज़ शब्दार्थ विश्लेषण से उस के मानी नहीं मिलेंगे . और व्यंजना को उस हद तक नहीं खींचा जा सकता की कविता खुद अपने खिलाफ खड़ी दिखाई देने लगे. उत्तर आधुनिकों के यहाँ भी अर्थ की बहुलता का अर्थ अनर्थ की छूट नहीं है


उलगुलान उस महान विद्रोह को कहते है , जो बिरसा मुंडा के नेत्रित्व में आदिवासियों ने चलाया था. चाहे दुनिया के तमाम विद्रोह नाकाम होते चले गए हों , लेकिन उन का सिलसिला कभी रुकता नहीं है. यह मनुष्यता के इतिहास का यथार्थ है , कोई रोमानी परिकल्पना नहीं. लोग लड़ते हैं , मारे जाते हैं. यह कोई अफवाह कोई मिथक नहीं है.इतिहास की ठोस और सब से ठेठ सच्चाई है.और कुचल दिए जाने भर से विद्रोह को नाकाम कह देना भी ठीक नहीं है. भगतसिंह भी एक रोमांटिक रिवोल्युशनरी था. मारा गया. वह देश भी नहीं बचा , जिस के लिए वह मारा गया. लेकिन आज पाकिस्तान में भी तमाम लोग ऐसे हैं , जो हर साल लाहौर के उस सादमान चौक पर इकट्ठे होते हैं , जहां उसे फांसी दी गयी थी. वे भगतसिंह जिंदाबाद और इंक़लाब जिंदाबाद के नारे बुलंद करते हैं. [TEHELKA, 10-04-2010]


लड़ाईयां नाकाम हो जाती हैं , लेकिन वे अगली लड़ाईयों की ज़मीन तैयार कर के जाती हैं. नाकामियों की यह कामयाबी भी एक अटूट यथार्थ है. लड़ते लड़ते ही और बेहतर तरीके से लड़ने के उपाय सूझते हैं. यकीनी जीत की उम्मीद न होने से लड़ना मुल्तवी कर देना , बिना लड़े मार दिया जाना भी आत्महत्या ही है. यह बात केवल किसानों पर लागू नहीं होती. विकल्प दो ही हैं . युद्ध या आत्महत्या.जिसे जो चुनना हो , चुने.


अगर मनुष्य की अंतिम मुक्ति में यकीन रखना नियतिवाद है , तो हो. इस नियतिवाद के बिना मनुष्य बने रहना नामुमकिन है .


रोमान और यथार्थ!
दोस्त , अक्सर यथार्थ वह होता नहीं , जैसा होने का वो दावा करता है.यथार्थ के नाम पर मिथ्याएं खूब फलती फूलती हैं. उत्तराधुनिकियों ने तो यही बताया है की 'यथार्थ' ही सब से बड़ी रूमानियत है .और रोमान . रोमान एक ऐसा यथार्थ है, जिसे मनुष्यता की तारीख कहते हैं.

अभय तिवारी ने कहा…

आशु भई,

अब आप ने इसे इस्लामी नियतिवाद मान ही लिया है तो बात ही ख़त्म हो गई.. मुझे इस के इस्तेमाल से कोई एतराज़ थोड़े हैं.. मेरी तो सभी परम्पराओं में बराबर की श्रद्धा है।

आप की सिर्फ़ दो विकल्पों की धारणा से जार्ज बुश की याद हो आई- आइदर यू आर विद अस ऑर अगैन्स्ट अस। भई मैं न तो युद्ध करूँगा और न आत्महत्या; आप इसे चाहे जो समझें। वैसे सच कहूँ तो आप भी वही कर रहे हैं, आत्महत्या तो नहीं कर रहे हैं, युद्ध भी कहाँ कर रहे हैं? मेरे और आप के जीवन में क्या अन्तर है? एक पार्टी के कार्ड से आप के जीवन की भौतिक सच्चाई में क्या बदलाव आता है? आप की ये बातें रूमानी मालूम देती हैं। :)

रूमान पर बहस जारी रहेगी, आगे!

मेरी समझ से शब्द रूमान ही होना चाहिये। इतालवी शहर रोम से निकला है, फ़ारसी की रवायत में रोम को रूम कहा जाता है, और रोम से सम्बन्धित बातों को रूमानी। रूमी का नाम भी तो यूँ ही हुआ, तुर्की लम्बे समय तक रूम के शासन में रहने के कारण वो इलाक़ा रूम कहलाने लगा था, तो मौलाना जलालुद्दीन, रूमी कहाए।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

जब भी लिखते हो, बिलकुल अलग सी बात कहते हो. सीधी-सच्ची मगर ऐसी जो आम आदमी को आसानी से नहीं दिख सकती है. ख़ास आदमी को तो दिखाने पर भी नहीं दिखेगी. क्योंकि ख़ास लोगों की आँखें ख़ास विचारधारा के टाट से बंधी हुई होती हैं जिसके बाहर का सूरज न उन्होंने खुद देखा है न किसी और को देखने देंगे ये.

रूम, रूमी, रूमान के बारे में अभी कुछ नहीं, अपने ज्ञानवर्धन के लिए चुपचाप बैठा विद्वानों की तकरीरें सुन रहा हूँ.

Neeraj Rohilla ने कहा…

हम तो चर्चा पढ़ते पढ़ते ही रूमानी हो गए.

बहरहाल, आपकी रंगनाथ बाबू और आशुतोष जी की सभ्य संतुलित और वैचारिक चर्चा देखकर मन प्रसन्न हो गया...ये ही बात करने का तरीका भी है |

KESHVENDRA ने कहा…

अभय जी और साथियों को इस धारदार बौद्धिक बहस के लिए ढेर सारी बधाई. अरुंधती जी का वह आलेख मैंने भी बड़े ही गौर से पढ़ा था और मुझे भी लगा कि वो सिक्के का एक ही पहलू दिखा रही हैं. मुझे लगता है कि वर्त्तमान समय में हर तरह के शोषण और दमन से निपटने के लिए लोकतान्त्रिक विकल्प मौजूद हैं. सूचना के अधिकार और रोजगार गारंटी एक्ट जैसे क्रन्तिकारी बदलावों के आने के बाद हमारी प्राथमिकता भ्रष्टाचार को मिटा कर आम जनता तक इन योजनाओं के लाभ पहुचाने की होनी चाहिए ना कि माओवादियों को प्रश्रय दे कर विकास को उन इलाकों तक ना पहुचने देने कि. एक और बात है कि हर राज्य में नक्सलवाद के अलग-अलग कारण और चेहरे हैं-जहाँ बिहार में यह पिछड़ों के शोषण और भूमि सुधारों कि विफलता से उपजी असहनीय गरीबी के देन है वहीँ झारखण्ड और छत्तीसगढ़ में यह आदिवासी शोषण और विस्थापन कि वजह से है. आंध्र और ओड़िसा में इसके पनपने कि वजह कुछ आदिवासी शोषण रही तो कुछ गरीबी और बेरोजगारी. बंगाल में इसके उदय की वजह थोड़ी तो गरीबी रही मगर उससे ज्यादा विचारधारात्मक रही. सरकार सिर्फ पुलिस विकल्प से माओवाद और नक्सलवाद से नही निपट सकती. इस समस्या से गृह मंत्री अकेले नही निपट सकते. माओवादियों को भी बदली हकीकत को समझते हुए अपने अंडर के आपराधिक और स्वार्थी तत्वों को नजरंदाज करते हुए सरकार से वार्ता कर विकास को बढ़ावा देने की नीति अपनानी चाहिए. इतना तो तय है की ना तो नक्सलवादी सरकार का तख्ता पलट करने में सक्षम है और ना ही सरकार इस विचारधारा को मिटाने में सक्षम है. बस विकास को आगे लाकर सुलह का एक माध्यम मार्ग जरुर निकाला जा सकता है.

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

मै बहुत देर से आया यहां…जिसे आप बार-बार नियतिवाद कह रहे हैं या जिसे बोधि सरापने से जोड़ रहे हैं वह एक तरफ़ बेहद सरलीकरण और जेनरलाइजेशन है तो दूसरी तरफ़ ख़ुद को ज़्यादा वैज्ञानिक साबित करने की एक चालाकी भी।

एक छात्र परीक्षा में बैठने वाला होता है…तैयारी करता है…रातें जलाता है…इस विश्वास के साथ कि वह पास होगा। वह नियतिवादी नहीं है।

एक छात्र भगवान को परसाद चढ़ाकर, पंडित जी की भविष्यवाणी पर विश्वास कर सो रहता है और जाके परीक्षा दे आता है…यह नियतिवाद है।

साफ़ है कि कोई मेहनत, कोई जद्दोज़ेहद शून्य मेम नहीं हो सकती, कर्म फल की इच्छा और इसके प्राप्त होने के सकारात्मक विश्वास से संचालित होता है। अगर लक्ष्य प्राप्ति का विश्वास न हो, यह विश्वास न हो कि अंतिम जीत हमारी होनी ही है तो न तो कोई खिलाड़ी खेलने उतरेगा और न ही कोई सेना लड़ाई मे उतरेगी। सक्रिय प्रतिरोध के साथ इंक़लाब की अपरिहार्यता पर हमारा या फैज या किसी और का विश्वास कतई नियतिवाद नहीं है। ऐसा तब होता जब सब हाथ पर हाथ धरे बैठे होते कि हां इंक़लाब हो ही जायेगा…बुड़िया का सरापना यही है।

अब जब वे लोग जो इंक़लाब की लड़ाई के हिस्सेदार नहीं होना चाहते और जनवाद तथा प्रगतिशीलता के तमगे भी टांके रहना चाहते हैं उनके लिये इस सक्रिय प्रतिरोध को ख़ारिज़ करना, इंक़लाब पर शक़ करने जैसे मुहावरे पेश करना सुविधाजनक होता है। ख़ारिज़ करने का आसान तरीका। उनसे पलट कर पूछा जाना चाहिये कि चलिये कहीं कुछ नहीं हो रहा, सब कन्फ्यूज और नियतिवादी … आप बतायें साथी आप क्या कर रहे हैं? भविष्य को लेकर आपका स्वप्न क्या है? वर्तमान से असहमति की आपकी अभिव्यक्ति कहां है?

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