सोमवार, 8 मार्च 2010

रंगीला रसूल भेज दूँ, छापोगे क्या?

क़रीब तीन साल पहले जब ब्लौग जगत के कुछ उत्साही सेकुलरपंथियों ने हिन्दू धर्म के देवी-देवताओं की मर्यादा का अतिक्रमण करती कुछ पोस्टें चढ़ाई थीं तो धुरविरोधी* ने पूछा था : “रंगीला रसूल भेज दूँ, छापोगे क्या?”

एम एफ़ हुसैन साहिब को लेकर जो बहस छिड़ी हुई है, उसमें मैं अपने पुराने साथी पंकज श्रीवास्तव और नीलाभ भाई से सहमत हूँ। मगर 'जनतंत्र' पर जो बात समरेन्द्र कहते हैं वो भी मुझे तार्किक लगती है। न तो हुसैन उतने मासूम हैं जितने कि हमारे साथी उन्हे बतला रहे हैं और न ही हमारे साथी उतने निरपेक्ष जितना कि वे दावा करते हैं। इसी कमी की ओर इंगित करते हुए धुरविरोधी ने पूछा था कि रंगीला रसूल भेज दूँ, छापोगे क्या?

बहुत लोग नहीं जानते होंगे कि 'रंगीला रसूल' क्या है। जो थोड़ी बहुत जानकारी** मिलती है वो कुछ यूँ हैं -

१९२० में दो किताबें प्रकाशित हुईं एक का नाम था- ‘कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी’, और दूसरी थी – ‘बीसवीं सदी का महर्षि’। इन किताबों में श्रीकृष्ण और आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द के चरित्र की जिस अन्दाज़ से विवेचना की गई थी, तत्कालीन पंजाब के हिन्दुओं को वह बहुत नहीं जंची। जवाब में एक आर्यसमाजी विद्वान पंडित चमूपति ने पैग़म्बर मोहम्मद के चरित्र पर एक किताब लिखी जिसका शीर्षक रखा – रंगीला रसूल। इस किताब में मोहम्मद साहब के यौन-जीवन पर बात की गई थी। लेकिन चमूपति जी किताब को अपने नाम से छपवाने में डर रहे थे कि कहीं ऐसा न हो कि जान से जायं। एक नए प्रकाशक राजपाल ने चमूपति को गुमनामी का आश्वासन दिया और पुस्तक पर लेखक की जगह ‘दूध का दूध पानी का पानी’ नाम दे दिया, मगर अपना नाम-पता न छिपाया।

जैसी कि आशंका थी, १९२४ में किताब छपते ही बड़ा बलवा म़चा। राजपाल जी पर बहुत दबाव आया कि बतायें कि लेखक कौन है। लेकिन उन्होने अपना वादा न तोड़ा। लिहाज़ा ग़ुस्से का निशाना वही बने। पहला जानलेवा हमला उन पर १९२६ में एक पठान ने छुरे से किया। हमलावर को सात साल की जेल हुई और राजपाल जी तीन मास में चंगे हो गए। कुछ मास बाद एक और हमला हुआ, लेकिन इस बार हमलावर ने उनके धोखे में किसी और को निशाना बना लिया।

मामला गर्म हो गया और गाँधी जी को भी बयान देना पड़ा कि ‘एक साधारण तुच्छ पुस्तक-विक्रेता ने कुछ पैसे बनाने के लिए इस्लाम के पैग़म्बर की निन्दा की है, इसका प्रतिकार होना चाहिये।’ ख़िलाफ़त आन्दोलन वाले मौलाना मोहम्मद अली ने जामा मस्जिद से तक़रीर की कि काफ़िर राजपाल को छोड़ना नहीं, उसे सज़ा देनी चाहिये। दबाव में आकर ब्रिटिश सरकार ने राजपाल जी पर पांच साल तक मुक़द्दमा चलाया, निचली अदालत ने छै महीने की सज़ा सुनाई। लेकिन हाई कोर्ट ने उस सज़ा को रद्द किया और फ़ैसला दिया कि किताब में दिए सारे तथ्य सच्चे और ऐतिहासिक हैं। रिहा होने के बाद राजपाल जी*** ने कहा कि रंगीला रसूल से मुसलमानों का दिल दुखा है इसलिए वे उसका अगला संस्करण नहीं छापेंगे।

इस के बावजूद १९२९ में एक अन्य हमलावर ने उनकी जान ले ली।

खोजने वाले को रंगीला रसूल इन्टरनेट पर मिल जाएगी। मैंने वहीं से खोज के पढ़ी है और पाया कि वाक़ई उस किताब में ‘तथ्यतः’ कुछ भी ग़लत नहीं है। (भावना का प्रश्न रह जाता है वह बड़ा सापेक्षिक है) आज भी दुकानों में रंगीला रसूल आप को ढूंढने से भी कहीं नहीं मिलेगी।

क्यों?

गाँधी जी आज जीवित होते तो हुसेन साहब के मसले पर भी वही राय रखते जो उनकी रंगीला रसूल पर थी?

अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए लड़ने वाले बन्धु ‘रंगीला रसूल’ और राजपाल की शहादत को भूल क्यों जाते हैं?


*एक सजग चिट्ठा जो अब अन्तरजाल से डिलीट किया चुका है।
**राजपाल जी के पुत्र दीना नाथ मल्होत्रा की किताब ‘भूली नहीं जो यादें’ में से।
***भारत के दो मुख्य प्रकाशन गृह
-राजपाल और हिन्द पॉकेट बुक्स -के स्वामी उन्ही के वंशज है।

विकी पीडिया पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार किताब मूल रूप से उर्दू में लिखी गई थी। बाद में उसका हिन्दी में लिप्यान्तर किया गया। किताब भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश में प्रतिबंधित है। राजपाल जी के हत्यारे इलम दीन को मौत की सज़ा हुई और उसे शहीद माना गया और बाद में गाज़ी का ख़िताब दिया गया।

26 टिप्‍पणियां:

गिरिजेश राव ने कहा…

मेरे पास है। छापूँगा नहीं ;)

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

मत कहो कि मैं काना हूँ, तुम्हारी दोनों जाएँगी।

Suresh Chiplunkar ने कहा…

एक कॉपी मुझे भेजिये गिरजेश भाई, मैं भी पढ़ना चाहता हूं कि कोर्ट द्वारा सही लेकिन गाँधी द्वारा गलत कही गई किताब कैसी होती है… :)

संजय बेंगाणी ने कहा…

गाँधी जी आज जीवित होते तो हुसेन साहब के मसले पर भी वही राय रखते.

राजपाल मुसलमान का निशाना बने इस लिए कश्मीरी पंडित की तरह भूल जाना चाहिए.

Madhukar ने कहा…

भाई निर्मल जी आपने बात तो ठीक कही है लेकिन मुझे डर है कि कहीं इस कडुवे सच को बोलने की वजह से आपको सांप्रदायिक न करार दें हमारे धर्म निरपेक्ष बंधूजन.

वैसे इस बेबाक रह्स्योदघाटन के लिए बधाइयां.

आनंद ने कहा…

इस बेबाक रह्स्योदघाटन के लिए बधाइयां.

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

अब मैं क्या कहूँ???

Arvind Mishra ने कहा…

भाई अभय जी ये तो आपने बहुत महत्वपूर्ण दस्तावेज दिखा दिया -बिचारे प्रकाशक ने कुछ पैसे बनाये हो या नहीं अनमोल जान तो गयी बिचारे की -मैं तो बहुत क्लांत हो गया यह वृत्तांत पढ़ कर --बाकी अपने विचार सुरेश जी के ब्लॉग पर पहले ही दे आया हूँ गौर फरमा लीजियेगा !

Arvind Mishra ने कहा…

इसे पढना भी प्रासंगिक हो गया है -
http://godsenathuram.rediffblogs.com/

अजित वडनेरकर ने कहा…

जानकारी के लिए शुक्रिया...

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

देखौ भैया ! औरौ जानकारी पाए के बाद कुछ कहब मुफीद होए !
हाँ , नीमन जानकारी दिहेव ! कान खड़ा भावा !
खोज कै सूची मा यक नयी चीज दर्ज भै ! आभार भाय !

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

अभय भाई ,
आप ने जानकारी अच्छी दी -
-- बाकि ,
हुसैन चित्र कला करते तो बढ़िया हैं -
उसमे कोइ २ राय नहीं ---
पश्चिम में , खुलापन , (आर्ट का ),
बहुत बड़ा हिस्सा है ही --
- धार्मिक मसले , फिर भी,
हमेशा , पेचीदा रहे हैं और इस पूरी शताब्दी तक, कायम रहेंगें ऐसा अनुमान है ---
- लावण्या

अजित वडनेरकर ने कहा…

रंगीला रसूल के सभी चौंसठ पृष्ठ पढ़ लिए और प्रकाशक मोहम्मद रफी साहब की टिप्पणी के साथ इसका समापन हुआ। दिलचस्प किताब है। निश्चित इन्हें आधार बना कर बहुत सी बातों से पहले ही हिन्दू समाज अवगत है। क्रिया की प्रतिक्रिया थी यह पुस्तक, जैसा आपने लिखा। आपने अंत में जो दो सवाल उठाए हैं, वे भी वाजिब हैं। पर क्या अभिव्यक्ति की आजादी के लिए राजपाल जी की शहादत अधूरी मानी जाएगी अगर हुसैन के तथाकथित कलाकर्म का हिंसक विरोध न किया जाए? क्या जो लोग हुसैन के कलाकर्म पर गौर करने को कहते हैं, ऐसा कर वे गलती कर रहे है? जिन लोगों ने राजपालजी की हत्या की थी, क्या तब इस कट्टरतावादी कर्म को किसी ने नहीं धिक्कारा था? क्या तब भी एक वर्ग से उदारता की उम्मीद नहीं की गई होगी?
जिस प्रकाशक ने सत्तर के दशक में बनाई पेंटिंग को तीस साल बाद अपनी पत्रिका को चर्चित करने का जरिया बनाया, उसकी पत्रिका भी बंद हो चुकी है। वे स्वयं धोखाधड़ी के कई मामलों में हवालात जा चुके हैं। किसी को जागरूक करने के लिए उन्होंने कोई भंडाफोड़ नहीं किया था, बल्कि उनका अपना स्वार्थ था। देवियों के अश्लील चित्र बनाकर हुसैन प्रसिद्ध होना चाहते तब इस मामले के उछलने से तीन दशक पहले ही वो अभीष्ठ प्राप्त हो जाता जिसकी खातिर वह सब किया गया था। जाहिर है, ऐसा नहीं है। हुसैन बेवकूफ तो थे नहीं। मैं न हुसैन का पैरोकार हूं और न ही अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर वाही तबाही कुछ भी कर गुज़रने देने का हामी। पर इतना जरूर है कि ऐसे विवादों से किसी भी किस्म के रचनाकर्म पर समझदार लोग अपना सार्थक नज़रिया रखने में हिचकने लगते हैं। जाहिर है अतिवादियों की चल निकलती है और यह सब एक जीवंत समाज के विकसित होते जाने के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।

कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee ने कहा…

रंगीला रसूल के लेखक पं. चमूपति एम.ए. जी थे (चमुनाथ नहीं)। कृपया सही कर दें।

महाशय राजपाल जी का वही प्रतिष्ठान आज राजपाल ऽ सन्ज़ (प्रकाशक, दिल्ली) है।

रेलवे के पूर्व महानिदेशक व "कम्प्यूटर के भाषिक अनुप्रयोग"(कम्प्यूटर विषयक पहली हिन्दी शोधपुस्तक)लिखने वाले डॉ. विजय कुमार मल्होत्रा जी राजपाल जी के पोते (उनके सबसे बड़े सुपुत्र के बेटे)हैं।

Sanjeet Tripathi ने कहा…

ajit bhiaya aapne jaha bhbi padha vo link denge?

baki padhne ke baad hi kahunga lekin sach kaha jaye to ab is samay me dhurvirodhi jee ki kami aur bhi jyada khalti hai, pata aap logo ko ye mehsus hota hai ya nahi....

अभय तिवारी ने कहा…

कविता जी,
नाम चमूपति ही है, भूल से चमूनाथ हो गया..
सुधार कर दिया है..

शुक्रिया!

सतीश पंचम ने कहा…

किताब पढने की मुझे भी इच्छा हो रही है। हो सके तो लिंक दे दिजिए।

वैसे इतिहास में कई ऐसी चीजें हैं जिन पर श्रद्धा का आवरण चढाकर उसे विवेचना से परे मानने की जिद की जाती है और यह जिद उन राजनीतिक कट्टरपंथियों की ओर से की जाती है जिनकी दाल रोटी ऐसे ही आवरण चढाने की बेतुकी कोशिशों की वजह से चलती है।

और यही आवरण चढाउ राजनीतिक दल ही हैं जो कि इतिहास को सही अर्थों में समझने, पढने नहीं देते।

NCERT की किताबों पर भी कई बार बवाल मचा चुके हैं ऐसे दल।

मुनीश ( munish ) ने कहा…

This post is a BIG "Q" mark on your Democratic credentials. "Q" bole to QUALITY. Thnx for giving us some quality-reading justifying ourlight years lost in blogwood .

जी.के. अवधिया ने कहा…

गिरिजेश जी, मेरे लिये यह जानकारी नई है। मुझे खेद है कि मैं आज इस पुस्तक को नहीं पढ़ पाया। हो सके तो पुस्तक की एक प्रतिलिपि मुझे भी भेजने का कष्ट करें।

मिहिरभोज ने कहा…

मैं आपके विचारों से अक्सर सहमत नहीं हो पाता पर आपका प्रशंसक जरूर हूं....तथ्य परक जानकारी सटीक शब्दों मैं.....

रंजना ने कहा…

बिलकुल नयी जानकारी थी यह मेरे लिए...इसके लिए बहुत बहुत आभार...

चाहे हुसैन साहब हों या फिर ऐसे बहुत सारे अपना नाम ब्रांड स्थापित करने और लाइम लाईट में रहकर अपना दूकान चलाने को अति आतुर लोगों के लिए नारी तथा धर्म, ये दो साधन सदा से ही सुगम लगते रहें हैं और आगे भी लगेंगे... सो क्या कहा जाय...

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

विवाह के समय माता सीता जी की आयु मात्र 6 वर्ष थी ।
माता सीता रावण से कहती हैं कि
‘ मैं 12 वर्ष ससुराल में रही हूं । अब मेरी आयु 18 वर्ष है और राम की 25 वर्ष है । ‘
इस तरह विवाहित जीवन के 12 वर्ष घटाने पर विवाह के समय श्री रामचन्द्र जी व सीता जी की आयु क्रमशः 13 वर्ष व 6 वर्ष बनती है ।

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

रंगीला रसूल सत्यार्थ प्रकाश की तरह दिल ज़रूर दुखाती है लेकिन वह कोई ऐसी किताब हरगिज़ नहीं है जिसके नक़ली तिलिस्म को तोड़ा न जा सके । जो कोई जो कुछ लाना चाहे लाये लेकिन ऐसे किसी भी सत्यविरोधी के लिए परम प्रधान परमेश्वर ने ज़िल्लत के सिवा कुछ मुक़द्दर ही नहीं किया । जो चाहे आज़मा कर देख ले । आशा है आप भविष्य में भी इसी प्रकार मजमा लगाकर इसलाम की महानता सिद्ध करने के लिए हमें आमन्त्रित करते रहेंगे ।

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

रंगीला रसूल सत्यार्थ प्रकाश की तरह दिल ज़रूर दुखाती है लेकिन वह कोई ऐसी किताब हरगिज़ नहीं है जिसके नक़ली तिलिस्म को तोड़ा न जा सके । जो कोई जो कुछ लाना चाहे लाये लेकिन ऐसे किसी भी सत्यविरोधी के लिए परम प्रधान परमेश्वर ने ज़िल्लत के सिवा कुछ मुक़द्दर ही नहीं किया । जो चाहे आज़मा कर देख ले । आशा है आप भविष्य में भी इसी प्रकार मजमा लगाकर इसलाम की महानता सिद्ध करने के लिए हमें आमन्त्रित करते रहेंगे ।
वर्तमान सहयोग के लिए धन्यवाद

rajeev sarswat ने कहा…

mai us prkash ko dhanyawad dounga jisnai vastvikta par pustak likhi phir alochak gandhi tho swai bikao or darpok tha yadi gandhi sacha hota to dais ka vibhajan hi nai hota
rajeev

rajeev sarswat ने कहा…

aasai vayaki ko mai sat sat naman karta huo jisna apni jan ki parwah nakarta houwai es sacchai ko samanai layai gandhi to sawai darpok tha jo satya wadi dikata tha par tha nahi

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