मंगलवार, 23 मार्च 2010

जन्नत हमीं अस्त?


जम्मू और कश्मीर में ‘वूमन्स परमानेन्ट रेज़ीडेन्ट (डिसक्वालिफ़िकेशन) बिल’ पर घमासान छिड़ा हुआ है। इस बिल के पास हो जाने के बाद राज्य की कोई भी औरत अगर किसी ग़ैर-प्रान्तीय से शादी करती है तो वो राज्य की स्थायी निवासी होने का अधिकार खो देगी। क्या है वो अधिकार? राज्य में सम्पत्ति ख़रीदने का अधिकार!

भरतीय संविधान की धारा ३७० के चलते कोई ग़ैर-प्रान्तीय राज्य में सम्पत्ति नहीं ख़रीद सकता है। मज़े की बात ये है कि जम्मू और कश्मीर राज्य में यह क़ानून १९२७ से ही लागू है। क्योंकि उस समय बड़ी तादाद में पंजाबी, जम्मू में पैर फैला रहे थे। तो जम्मू के लोगों ने असुरक्षा की भावना से महाराज हरि सिंह से गुहार लगाई और सुरक्षित हो गए। उस वक़्त का बना क़ानून १९४८ में भारत में विलय के बाद भी बना रहा।

हम ग़ैर-कश्मीरियों के ज़ेहन में कश्मीर को लेकर एक छवि बनी हुई है कि भई धरती का स्वर्ग है कश्मीर। ये भ्रान्ति मुग़ल बादशाह जहाँगीर की ग़लतफ़हमी -जन्न्त हमीं अस्त- से पैदा हुई और अभी तक चली आ रही है। अगर ये वास्तव में सच होता तो मुग़ल बादशाहों ने अपना मरकज़ आगरा और दिल्ली को बनाने के बजाय श्रीनगर को बना लिया होता। वहाँ की आबो-हवा ज़िन्दगी बसर करने के लिए इतनी ही माक़ूल होती तो गंगा के मैदान में आबादी का घनत्व कम होता और कश्मीर की घाटी में ज़्यादा होता!

लेकिन कश्मीर के बाशिन्दों ने इस ग़लतफ़हमी को कुछ ज़्यादा ही सीरियसली ले लिया है। इसीलिए वे सोचते हैं कि पूरा हिन्दोस्तान (दुन्या न भी सही) कश्मीर में किसी भी तरह एक कुटिया बना लेने के लिए मरा जा रहा है। इसीलिए पीडीपी, नेशनल कान्फ़्रेन्स से लेकर कांग्रेस तक इस अपने मूल में स्त्री-विरोधी क़ानून को बेहिचक, बेशर्मी से लागू करने में योगदान कर रहे हैं।

लेकिन कोई उनसे पूछे कि भैया कौन रहना चाहता है कश्मीर में? कश्मीरी मुसलमान तो ख़ुद आरोप लगाते हैं कि कश्मीरी पंडितो को किसी ने नहीं भगाया; वे स्वेच्छा से निकल गये। कश्मीर घाटी के जो हालात हैं वहाँ से कोई भी अमनपसन्द आदमी मौक़ा मिलते ही भाग खड़ा होना चाहता है। माना जा रहा कि दुनिया के सबसे ख़तरनाक इलाक़ो में एक कश्मीर भी है। और लोगबाग़ है कि अपनी आँख से पट्टी हटाना ही नहीं चाहते? उनका ख़याल है कि लोग कश्मीर में घुसने के लिए मरे जा रहे हैं? होश में आइये भाईयों!

6 टिप्‍पणियां:

अजित वडनेरकर ने कहा…

ग़ज़ब कर दिया भाई..
लिखते हुए स्वरों के आरोह अवरोह का आभास नहीं होता, वरना जानते, कैसे बोल रहा हूं।

हमेशा की तरह एक नंबर देता हूं :)

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

दारुल हरब बनाने का सीधा षड़यन्त्र है. देश को और छोटा करने की भूमिका है. कश्मीर में कश्मीरी हिन्दू कभी दोबारा आ न सकें, इसके लिये जमीन तैयार की जा रही है.

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

सही कह रहे हैं, अभय जी. कश्मीर में क्या रखा है? असली माल दिल्ली में है. एकदम तर माल. जो पहले से जानते थे उन्होंने शाहजहाँ बाबू की बात नहीं मानी और वाया इलाहाबाद दिल्ली पहुँच गए. वो भी कितने पहले.

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) ने कहा…

ये बात सही कही आपने..और इस बात से inspire होकर कही ठाकरे साहब लोग कुछ और नीति सीख गये तो और हो-हल्ला...

चंदन कुमार झा ने कहा…

सही बात !!!!

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

..........लेकिन कश्मीर के बाशिन्दों ने इस ग़लतफ़हमी को कुछ ज़्यादा ही सीरियसली ले लिया है। इसीलिए वे सोचते हैं कि पूरा हिन्दोस्तान (दुन्या न भी सही) कश्मीर में किसी भी तरह एक कुटिया बना लेने के लिए मरा जा रहा है। इसीलिए पीडीपी, नेशनल कान्फ़्रेन्स से लेकर कांग्रेस तक इस अपने मूल में स्त्री-विरोधी क़ानून को बेहिचक, बेशर्मी से लागू करने में योगदान कर रहे हैं।

लेकिन कोई उनसे पूछे कि भैया कौन रहना चाहता है कश्मीर में? कश्मीरी मुसलमान तो ख़ुद आरोप लगाते हैं कि कश्मीरी पंडितो को किसी ने नहीं भगाया; वे स्वेच्छा से निकल गये। कश्मीर घाटी के जो हालात हैं वहाँ से कोई भी अमनपसन्द आदमी मौक़ा मिलते ही भाग खड़ा होना चाहता है। माना जा रहा कि दुनिया के सबसे ख़तरनाक इलाक़ो में एक कश्मीर भी है। और लोगबाग़ है कि अपनी आँख से पट्टी हटाना ही नहीं चाहते? उनका ख़याल है कि लोग कश्मीर में घुसने के लिए मरे जा रहे हैं? होश में आइये भाईयों....
क्या बात है ,एकदम कलम तोड़ देने का इरादा है क्या?
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सटीक आलेख,बधाई.

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