सोमवार, 3 दिसंबर 2007

इब्लीस की नाफ़रमानियाँ और अल्लाह



फ़रीद खान मेरे मित्र और सहकर्मी हैं, उन्हे आप इस ब्लॉग पर पहले भी पढ़ चुके हैं..आज सुबह मेल में उनका ये लेख मिला इस नोट के साथ कि अगर प्रासंगिक लगे तो छापिये.. और मैं छाप रहा हूँ।



आरंभ करता हूँ ईश्वर के नाम से जो अत्यंत दयावान और कृपालु है।
(बिस्मिल्लाह इर्रहमानिर्रहीम का हिन्दी अनुवाद)

इस दुनिया में जो भी वुजूद में है, उसके पीछे ख़ुदा की एक मस्लेहत है।

(उर्दू शब्दकोश में मस्लेहत का मतलब हिकमत, पॉलेसी या नीति, ख़ूबी या विशेषता, मुनासिब तजवीज़ या उपयुक्त प्रस्ताव और अच्छा मशवरा दर्ज है।)

मेरा सवाल है आज उस अल्लाह से, जिसकी मैं वन्दना करता हूँ , कि अगर तस्लीमा और सलमान रुश्दी ने इतने ही हानिकारक विचार लिखे हैं तो उन्हें उठा क्यों नहीं लेता ... उन मुस्लमानों को क्यों हत्यारा बना रहा है भाई, जो आवेश में आ कर तलवार लिए तस्लीमा या रुश्दी के पीछे भाग रहे हैं।

लेकिन अल्लाह शब्दों में जवाब नहीं देता ... वह संकेत देता है।
संकेत है - आदम और हव्वा के वजूद में आने के पहले ही इब्लीस (शैतान) द्वारा अल्लाह की नाफ़रमानी करने पर भी अल्लाह ने उसे ख़त्म नहीं किया ... ।

अल्लाह ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर , असहमति पर , मतभेद पर रोक नहीं लगाई। और तो और शैतान ने तो नहीं सुधरने की भी ज़िद कर रखी है फिर भी अल्लाह ने उसे छोड दिया... शैतान ने चुनौती भी दे रखी है अल्लाह को, कि वह उसके बन्दों को बहका कर रहेगा, फिर भी अल्लाह ने उसे छोड दिया।

इब्लीस (शैतान) तक के वुजूद को अल्लाह ने ख़त्म नहीं किया फिर हम इंसान कौन होते हैं उसके काम में दख़ल देने वाले, लठ ले के तस्लीमा के पीछे भागने वाले और सलमान रुश्दी के पीछे तलवार ले कर भागने वाले ?

अचंभा तो इस बात का है कि जिन राजनेताओं को देश और संस्कृति की चिंता नहीं होती वे अचानक धार्मिक भावनाओं के रक्षक क्यों बन जाते हैं।

वह इसलिए कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (चाहे वह अभिव्यक्ति किसी भी तरह की क्यों ना हो) एक राजनीतिक कदम है। आप इतिहास देख लें .... सूफ़ियों से कितने ही बादशाहों को ख़तरा महसूस होता था ....औरंगज़ेब ने तो मंसूर को कुट्टी कुट्टी कटवा दिया था। नाथूराम गोडसे ने गांधी की आवाज़ को हमेशा हमेशा के लिए बंद कर दिया। सफ़दर हाशमी को कांग्रेसियों ने मौत की नींद सुला दी। मराठी नाटक मी नाथूराम गोडसे बोलतोय पर महाराष्ट्र सरकार ने प्रतिबन्ध लगा दिया। एम एफ़ हुसैन पर बजरंगियों का ख़तरा बना ही हुआ है और ताज़ा तरीन हमला फ़िल्म आजा नच ले पर भी हो गया।

हर कोई विचारधारा, देश हित, धर्म और राष्ट्र के नाम पर मारने और आवाज़ बंद करने को तत्पर बैठा है। सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो , सभी भयभीत होती हैं विचारों से। इसीलिए आम लोगों में उनके जो एजेंट होते हैं वह अपनी भावनाओं को हमेशा अपनी हथेली पर लिए सडकों पर फिरते हैं कि किसी भी चीज़ से उन्हें ठेस पहुंचे और मौलिक अधिकारों से हमारा ध्यान हट कर दोयम दर्जे की चीज़ों पर चला जाये।

यहाँ मारने को हर कोई स्वतंत्र खडा है लेकिन बोलने को कोई नहीं।

कोपरनिकस और गैलेलियो ने जिस तरह से चर्च के ख़िलाफ़ जा कर दुनिया के सामने अपना विचार रखा और आज दुनिया उनकी अहसानमन्द है। उसी तरह ......



अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने ही होंगे,
तोडने ही होंगे मठ और गढ सब।

-मुक्तिबोध।

7 टिप्‍पणियां:

Mired Mirage ने कहा…

बहुत सही कह रहे हैं आप । यदि भगवान वैसा ही है जैसा भगवान को मानने वाले कहते हैं तो उसे किसी मनुष्य का सहायता, बीच बचाव या भगवान के समर्थन में बोलने की आवश्यकता नहीं है । यदि आवश्यकता है तो वह बहुत ही कमजोर और बेचारा है तब वह भगवान कैसे हो सकता है ? आम इनसान भी उसपर किये गए थोड़े बहुत हमले सह लेता है तो क्या भगवान बही् झेल पाएगा ?
घुघूती बासूती

संजय तिवारी ने कहा…

मैंने कल अपने ब्लाग पर उस फतवे की प्रति डाली थी जो तस्लीमा के खिलाफ बांग्लादेश में मौलवियों ने जारी किया था. आश्चर्य होता है वे भी एक संस्कृति, सभ्यता को बचाने के लिए तस्लीमा को कत्ल करना चाहते हैं.

इस्लाम अनलहक का नारा बुलंद करनेवालों को कब तवज्जो देगा?

aakash ने कहा…

farid sahab ne hamesh ki tarah... sari bate... paine tarko ke saath rakhi hain...aaj ke is dur me hum sam ko ye samajh na hoga ki "agar raja ram mohan rai ko bhi Taslima,salman khursheed ki tarah rok diya gaya hota to aaj bhi na jane kitni nariyo ko jabran aag ki bhet chadah diya gaya hota"

Aakash Pandey

चंद्रभूषण ने कहा…

Kamal keeta Farid Saheb. Tusi great ho. Taslima ki Dvikhandito kuchh din ghar par padi thi. Do-teen chapter hi padh paaya. Lekin is vivad ke baare me janane ke chakkar me aaj baton-baton me vahi-vahi hisse chhant kar padh gaya.

Islam ke prati abhi tak man me jo samman tha uska 10 feesad ise padhne ke tatkal baad jata raha. Yah tab hai jab meri kisi dharm me aastha nahin hai. Jinki aastha is dharm me hai unki manodasha ise padhkar kya hui hogi, yah samajhana mere liye kathin hai.

Kya aap jaisa koi banda himmat karke is mudde par Taslima se bahas karne- ve galat hain to unhen sahi karne, aur sahi hain to mild tarikon se unki tasdik karne ke liye khada hoga????????

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

बिलकुल ठीक कहा मित्र. आप बधाई के पत्र हैं. यही सच है. धर्म जब तक राजनीति से जुडा रहेगा तब तक उसमें आत्मा की तलाश बेमानी है. लेकिन दुखद सत्य यह है की धर्म हमेशा और हर जगह राजनीति से जुडा रहा है, सिर्फ उन थोडे से क्षणों को छोड़ कर जब किसी विचारधारा का सृजन हुआ. इसके बाद तो कभी सरमद की गर्दन उतारी गई है तो कभी लूथर को सताया गया और कभी बुद्ध को तथागत कहा गया.

Pramod Singh ने कहा…

सही बातें, फरीद. बधाई. दिमाग को ऐसे ही पैना बनाये रखें.

Nasiruddin ने कहा…

तसलीमा क्या लिखती हैं, यह बहस का मुद्दा हो सकता है। ठीक उसी तरह से एमएफ हुसैन क्या रचते हैं, इस पर कई राय हो सकती है। मगर इस राय में वही राय सर्वश्रेष्ठ या आखिरी सच है, जो मैं कह रहा हूं, इसे ही राजनीति की भाषा में फासीवाद कहते हैं। फासिस्ट होने के लिए किसी नात्सी पार्टी में होना भी जरूरी नहीं है। वह कहीं भी पैदा हो सकता है।
तसलीमा ने जो लिखा या जैसे लिखा उस पर बात होनी चाहिए पर अभी इस बहस का वक्त नहीं है। आज जरूरी सवाल है कि विचारों और सोच की बहुलता बरकरार रहेगी या नहीं... विचारों की टकराहट को क्या फाइनल सोल्यूशन से ही निपटाया जाएगा। या इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगेगा। फरीद आपने काफी मौजू टिप्पणी की है। शुक्रिया

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