रविवार, 13 मई 2012

दोस्त


उस दिन शांति के सर में तेज़ दर्द था। शायद गर्मी की वजह से।  शांति आँख बंद करके लेटी ही थी कि एस एम एस की घंटी बजी। लेटे-लेटे ही शांति ने फ़ोन की खिड़की पर देखा- आरती का मेसेज था- उसकी माँ नहीं रही। शांति का मन दो मिनट तक उस के दर्द से भरे सर और हाथ में पकड़े फ़ोन के बीच झूलता रहा। आरती शांति के सामने वाली इमारत में रहती है। उसका बेटा पीयूष, अचरज के ही क्लास में है और दोनों की अच्छी दोस्ती भी है। दो-एक बार आरती और पंकज, शांति के घर आए हैं और दो-एक बार शांति और अजय उनके घर गए हैं। आरती की माँ और पिताजी शांति की इमारत के दूसरे विंग में रहते थे। और शांति का घर उनके लिए आरती के घर से भी पास पड़ता था। मगर उनका कहीं आना-जाना कम ही होता था। आंटी को वैसे भी गठिया था और चलने-फिरने में तकलीफ़ होती थी और अंकल वैसे तो स्वस्थ हैं मगर बहुत मिलनसार नहीं। नमस्ते करने पर मुस्करा कर जवाब ज़रूर देते हैं पर उससे ज़्यादा नज़दीकियों की कोई दिलचस्पी नहीं दिखाते। न बच्चों का हाल पूछते, और न मौसम के हाल पर बिसूरते। बस आंटी के बगल में खड़े होकर उनकी बातों के खतम होने का इन्तज़ार करते। और अक्सर उस इंतज़ार में उनकी भंगिमा बिगड़ सी जाती। मगर आंटी उनपर ज़रा ध्यान नहीं देती- वो सूचनाओं के पर्याप्त आदान-प्रदान के बाद ही हिलतीं। वैसे भी उनकी हड्डियों को हिलने में तक़्लीफ़ थी तो वो हर क़दम का भरपूर लाभ लेकर ही आगे बढ़ना चाहतीं। अंकल बेचारे, जो शायद किसी भी आम पुरुष की तरह चलने में नहीं पहुँचने में यक़ीन रखते थे, उतनी देर कसमसाते रहते। अब आंटी चली गईं.. अब उन्हे कभी इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा- शांति ने सोचा। सर दर्द से बोझिल हो रहा था। खड़े-खड़े उसे उठाए रखना भारी पड़ रहा था, इसीलिए शांति लेट गई थी। मगर इस नई सूचना न उसका लेटे रहना मुश्किल हो गया। उसे आरती के पास जाना ही होगा- सोचकर शांति उठ गई। पहले अजय को मेसेज किया, फिर पाखी को बताया, और निकल पड़ी। 

घर के बाहर जूते-चप्पलों की ढेरी लगी हुई थी। दरवाज़ा खुला था। और बाहर के कमरे में ही आंटी का शव कमरे के बीचो-बीच रखा था।  शांति ने पिछली बार जब आंटी को देखा था उसके मुक़ाबले काफ़ी कम वजन लग रहा था। अस्पताल में बिताए अन्तिम दिनों में शायद ये बदलाव आया होगा।  शांति की नज़रें आरती को खोजने लगीं। कुछ पहचाने हुए और कुछ अनजान चेहरे भी उस कमरे में मौजूद थे। सबके चेहरे गम्भीर और उदास। पर उनमें आरती नहीं थी। आंटी के शव के साथ उन अनजान लोगों के बीच खड़े रहना शांति को अजीब सा लगने लगा। शांति अन्दर चली गई।  आरती रसोई में पंकज और एक दो अन्य लोगों के साथ थी-  दाह-संस्कार के बारे में बात हो रही थी। कब होगा, कैसे होगा.. किस-किस को खबर हो गई, कौन रह गया आदि। जैसे ही शांति और आरती की नज़रें मिलीं। दोनों स्वाभाविक रूप से एक दूसरे के गले लग गईं। शांति ने आरती की पीठ पर एक-दो दफ़े दिलासा के लिए हाथ फेरा। आरती ने भी हलके से शांति की पीठ थपथपाई.. कुछ पल वे इसी मुद्रा में रहे और फिर अलग हो गए। आरती वापस अपनी चिंताओ में लौट गई। शांति को एक पल का अवकाश मिला और उसे अपना सरदर्द याद आया। वो वहीं था, कहीं नहीं गया था। उस सर दर्द की उपस्थिति में ही शांति ने पाया कि शांति का आरती को दिलासे के लिए गले लगाना एक औपचारिकता था- उसने पहले से सोचा हुआ था कि वो क्या करेगी। आंटी की मृत्यु दुख का मौका था मगर तक़ल्लुफ़ का भी मौक़ा था। शांति को दुख है पर इतना भी नहीं कि उसे रोना आ जाय। और आरती के दुख में शरीक़ होना बिना रोए कैसे मुमकिन है.. शायद सिर्फ़ उसे गले लगाकर और पीठ थपथपाने की दिलासा देकर। लेकिन अपनी औपचारिकता के अलावा उस गले लगने में शांति को आरती की भी औपचारिकता का एहसास हुआ। जैसे पहले से तय था कि वो गले मिलेंगे और कुछ पल एक-दूसरे की पीठ सहलाकर अलग हो जाएंगे। आरती पहले से तैयार थी। शांति ने आरती के चेहरे को देखा- आरती उदास थी पर रो नहीं रही थी। उसके हावभाव से लग रहा था कि ज़िम्मेदारी निभा रही थी। मृत्यु एक निजी अवसर है, मरने वाले के लिए और उसके क़रीबी लोगों के लिए। मगर मृत्यु एक सामाजिक अवसर भी है, जहाँ दोस्त, पड़ोसी और दूर के सम्बन्धी उस सत्य के साक्षी होते हैं। उस वक़्त आरती को देखते हुए बिलकुल नहीं लगा कि उसके लिए आंटी की मृत्यु  कोई निजी अवसर थी। वो पूरी तरह उसके सामाजिक आयाम में बनी हुई थी। तो फिर आंटी की मृत्यु का आरती पर निजी तौर पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा था? ऐसा कैसे सम्भव था! 
रसोई में भीड़ बढ़ने लगी थी। शांति पीछे हट आई। अचानक उसकी नज़र दूसरे कमरे में बिस्तर पर बैठे अंकल पर पड़ी। अंकल कमरे में एकदम अकेले थे और वो उसी ओर देख रहे थे। शांति को एकाएक समझ नहीं आया कि वो क्या करे? नमस्ते करे या कुछ और? शांति ने अपने आप को आरती का सामना करने के लिए तो तैयार किया था, पर अंकल की बात वो भूल ही गई थी। और इसीलिए उनसे कैसे मिले में कुछ भी सूझ न पाने की स्थिति में शांति दरवाज़े के सामने से हट गई। 

अंकल अकेले क्यों थे? उनकी पत्नी की मृत्यु हुई थी.. कोई उनको दिलासा क्यों नहीं दे रहा? फिर शांति ने ग़ौर से देखा पूरे घर में आरती और पंकज के दोस्त और पड़ोसी ही थे। अंकल का एक भी दोस्त वहाँ नहीं था? शांति को लगा कि उसे अंकल के पास बैठना चाहिये। वो दरवाज़े पर लौट गई। अंकल ने वापस उस की ओर देखा। इस बार शांति तैयार थी- उसने नमस्ते कर ली.. और उनके पास ही बैठ गई। पर उसके पास कहने को कुछ नहीं था। अंकल की तरफ़ सीधे देखना भी आसान नहीं था। वो इधर-उधर देखती रही। बीच-बीच में एक नज़र अंकल को भी देख लेती। अंकल भी रो नहीं रहे थे। उदास थे और चुप थे। जिस बिस्तर पर वो बैठे थे उस पर अस्पताल जाने से पहले आंटी भी सोया करती होंगी। कितनी रातों दोनों ने जीवन और मृत्यु की बाते की होंगी। अचानक शांति को एहसास हुआ कि क्यों नहीं रो रहे थे अंकल और आरती। आंटी की मृत्यु के पहले ही उनकी बीमारी के दौरान उन्होने आंटी की मृत्यु की कल्पना करना शुरु कर दिया होगा.. और शायद उसका इंतज़ार भी। 
कुछ वक़्त बीत गया। कमरे में शांति और अंकल ही बने रहे। अंकल का कोई दोस्त तब भी नहीं आया था। शायद उनका कोई दोस्त था ही नहीं। आंटी ही उनकी एकमात्र दोस्त थीं। अंकल और दुनिया का जो भी सम्बन्ध था, आंटी के ज़रिये था। बिना आंटी के अंकल शायद अब चलते समय किसी से मिलने के लिए कहीं नहीं रुकेंगे। किसी का इंतज़ार नहीं करेंगे.. सीधे अपनी मंज़िल पर पहुँच जायेंगे। 

*** 

पिछले इतवार को दैनिक भास्कर में छपी

1 टिप्पणी:

Sonal Rastogi ने कहा…

mratyu hamein apne bheetar jhaankne kaa avsar deti hai

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