बुधवार, 29 अप्रैल 2009

लैन्सियोलेट कॉडेट टॉमेन्टोज़ हरसूट

आजकल एक नई भाषा सीख रहा हूँ। पेड़ों-पौधों में जागे नए शौक के चलते उन से सम्बन्धित एक गूगल समूह की सदसयता हासिल कर ली है – indiantreepix । जब भी किसी पेड़-पौधे को पहचानने की कोशिश में मेरे पास मौजूद चारों किताबें हाथ खड़ी कर देती हैं तो इस समूह पर एक पोस्ट, मय तस्वीर चिपका देता हूँ।

और बस समूह के ८२२ सदस्यों में से वे बन्धु जो पेड़ को पहचानते हैं, पहेली सुलझा देते हैं। और एक बार पेड़ का नाम पता चल जाय, खासकर वैज्ञानिक नाम तो नेट पर तमाम ऐसे स्रोत मौजूद हैं जो पेड़/झाड़ी/लता के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी मुहय्या कर देते हैं।

जो नई भाषा सीख रहा हूँ वो इसी वनस्पति शास्त्र से समबन्धित है। आप के स्वाद के लिए एक नमूना यहाँ पेश कर रहा हूँ –

Muntingia calabura (L., Muntinginaceae) : Small tree with tiered slightly drooping branches with crowded distichous simple alternate strongly asymmetrical sticky-pubescent oblong acuminate obliquely subcordate thin serrulate leaves, soon wilting, 2.5-15 cm long, 1-6.5 cm wide; stipules linear, about 5 mm long, caducous, flowers bisexual, 1 or few in axils, on pedicels about 2-3 cm long; sepals 5 (rarely 6 or 7), each about 1 cm long, lanceolate-caudate, tomentose-hirsute; petals white, [or pink], broadly spathulate-deltoid, about 12-13 mm long, rotate, stamens about 75; filaments slender, distinct, 6 mm long, white; anthers small yellow; disc annular, around the ovary; hirsute; ovary stipitate, glabrous, 5-celled; stigma capitate, 5-riged; fruit 5-celled baccate, sub-globose, light red, 1-1.5 cm wide, sweet-juicy, with many small (1/2 mm) elliptic grayish yellow seeds, stigma persistent.

ऊपर से ऐसा मालूम देता है कि यह अंग्रेज़ी भाषा है पर मैं यहाँ लिखे गए विवरण के आधे से अधिक शब्दों से परिचित नहीं हूँ। एक ग्लासरी नेट से मिली है पैंसठ पन्ने की। उसको देख कर ही थकान हो सकती है। मगर सीखने का आनन्द अक्सर बहुत थकानो से पार ले जाता है।

मैंने देखा है कि हिन्दी में इस प्रकार के समूहों का अभाव है जबकि ज़रूरत तमाम। अब जैसे शब्द की उत्पत्ति के सम्बन्ध में ही एक समूह क़ायम किया जा सकता है। क्या कहते हैं अजित भाई?















तस्वीर: मन्टिन्जिया कैलाबुरा या जमैकन चेरी या मराठी में केवनी।
यह पेड़ सड़क के किनारे मिला मगर पहचान इन्डियनट्रीपिक्स के दोस्तों ने कराई।

5 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

आदमी को हमेशा कुछ ना कुछ नया सीखते रहना चाहिए, ये मेरे सर कहा करते है। यही बात आपकी पोस्ट पढते ही आ गई। खैर अच्छा प्रयास। एक हम है। बस.....

Mired Mirage ने कहा…

आपके शौक को देखकर बहुत खुशी हुई। मुझे भी पे्ड़ पौधों में काफ़ी रुची रही है, परन्तु अब नाम भूल जाते हैं। बचपन से सदा पेड़ों के बीच रही मैं पहले बहुत से पेड़ों को उनके पत्तों की गन्ध से ही पहचान जाती थी। यदि किसी पत्ते को थोड़ा सा हाथ से मसलूँ तो आँख बन्द करके ही उसकी गन्ध से बचपन का पहचाना पेड़ व बचपन याद आ जाता है।
घुघूती बासूती

sanjay vyas ने कहा…

ये स्पष्ट है कि प्रजातियों के वर्गीकरण और नामकरण में जुनूनी लोगों ने कितना सघन परिश्रम किया होगा. लैटिन मूल के नामों को याद करने में हमारी जान निकल जाती थी. वनस्पति शास्त्र के अलावा प्राणी शास्त्र और रसायन में भी यही भेजामारी रहती थी.
organic chemistry में nomenclatutre पर पूरा अध्याय! किसी और का इतना अथक परिश्रम हमारे लिए यथावत परोसे जाने पर भी पसीने छुडा देता था.
अभय जी, सच है ये भाषा पूरी तरह विषय सापेक्ष है और जिज्ञासुओं के लिए इसके बिना गुज़ारा नहीं.हिंदी की पाठ्य पुस्तकों में पारिभाषिक शब्दावली इस्तेमाल हुई है पर यहाँ किताबें एक स्तर के बाद बिलकुल अनुपलब्ध है.

अजित वडनेरकर ने कहा…

सही बात है अभय भाई,
मैं बहुत दिनों से इस दिशा में सोच रहा हूं पर वही आपकी बात कि '...मगर सीखने का आनन्द अक्सर बहुत थकानो से पार ले जाता है....'मेरे शब्दों का सफर की खब्त के संदर्भ में सही साबित होती है और वह पहल टल जाती है।
साझेदारी का काम गूगल समूह के जरिये बहुत अच्छी तरह हो सकता है। भाषा और शब्दों के मामले में यह साझेदारी हिन्दी वालों के लिए लाभदायक होगी क्योंकि हम संदर्भों पर कम और अनुमान और परम्परा पर अमल के हामी हैं। इस बारे में हम शुरुआत कर सकते हैं।

आपने अच्छी जानकारी दी, वृक्षों में मेरी भी दिलचस्पी है और इस पर हिन्दी में कुछ पुस्तकें भी हैं। खासतौर पर ओषधीय पादपों के बारे में जिज्ञासू हूं। इस समूह की सदस्यता के लिए मैं भी आवेदन कर रहा हूं।
शुक्रिया...

बेनामी ने कहा…

Hello,nice post thanks for sharing?. I just joined and I am going to catch up by reading for a while. I hope I can join in soon.

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