शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

घर पर पुल

जीवन तो भैया एक सफ़र है। जन्म और मृत्यु के बीच के दो अटल सत्य के बीच का अल्पविराम है। सुधीजन कहते हैं कि जीवन तो जन्म के इस पार और मृत्यु के उस पार के बीच का एक छोटा पुल है, और पुल से होकर बस गुज़र जाया जाता है। इस रहगुज़र में बोझा हलके से हलका रखा जाता है। ताकि मन करे तो पुल पर खड़े हो कर नीचे के बहाव को देख कुछ चिंतन-मनन कर लिया जाय! और इस पुल पर - या किसी भी पुल पर - घर नहीं बनाया जाता!

मगर सुधीजनों की बात कौन सुनता है। कभी-कभी तो सुधीजन स्वयं भी सुध-बुध भूल कर पुल पर दुमहलों-चौमहलों की अटारियां बनाने में व्यस्त हो जाते हैं। आजकल के बाबा-बापू गण वैतरणी में गैया की पूंछ के चक्कर में हैं या संसार में अपनी पूछ के चक्कर में हैं; ये राज़ किस से छिपा है।

खैर, हमारे बाबा लोग की महिमा अपरम्पार है जो कहते भले ही कुछ भी हों, बाक़ी दुनिया की तरह वो भी पुल पर घर बनाने में लगे पड़े हैं। उनका क्या दोष; आखिर वे भी मनुष्य हैं।

पर उन बेचारों का क्या जिनका घर ही पुल पर हो.. या घर के आगे भाई लोगों ने पुल बना दिया हो! वे आध्यात्मिकता के इस अचार का रस कैसे पाएं?



चित्र: भायखला पूर्व व पश्चिम को जोड़ने वाला पुल, मुम्बई

4 टिप्‍पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

जय हो!

बोधिसत्व ने कहा…

पढ़ कर नजीर का आदमीनामा याद आई।

अशोक पाण्डेय ने कहा…

दो अटल सत्‍य के बीच अल्‍पविराम - अच्‍छी लगी जीवन की यह परिभाषा।

अजित वडनेरकर ने कहा…

चिन्तन घर से निकल कर पुल पर आया अथवा पुल से गुजर कर घर खोज रहा है?
अपनी एक कविता याद आ गई भाई, सुनें-


पुल कभी स्वप्न
कभी दुःस्वप्न
कभी रिश्ता हुआ
पुल को जो होना था
वो कभी नहीं हुआ
सब इस पार ही रह गए पुल के
पार जाने का तो भ्रम ही हुआ...

कैसी लगी? मैं छंदबद्ध कविता का हामी ऐसी कविता लिख कर भी बेशर्मी से पूछ रहा हूं :)

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