मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009

वासना का दास

हिन्दी फ़िल्मों मे आज के पहले कभी सेक्स की ऐसी अभिव्यक्ति नहीं हुई थी जैसी अनुराग कश्यप ने देव डी. में कर दिखाई है। सुनते हैं अनुराग कश्यप ने अनुरोध किया था कि उनकी फ़िल्म को सेंसर करने वाले पैनल में पुरुषों से अधिक महिलाएं मौजूद हों। अक्सर पुरुष स्वयं को महिलाओं के बारे में सब कुछ तय करने का जन्मजात अधिकारी समझते हैं। शायद अनुराग का यह अनुरोध स्वीकार भी कर लिया गया क्योंकि फ़िल्म के आज़ाद-ख्याल संवाद सलामत हैं और अनुराग ने बिना उनका हनन किए नारी पात्रों का जो सेक्स के प्रति अनगढ़ भाव दर्शाया है वो भी।

आम तौर पर जिन्हे छिनाल या रण्डी के रूप में जाना जाता है अनुराग ने उन्हे ही अपनी नायिकाओं के रूप में पेश किया है। फ़िल्म के तीनों नारी पात्र एक ही चरित्र के हैं उनके नाम और हालात अलग हैं पर प्रेम और वासना के प्रति उनका नज़रिया एक ही है। घर-गृहस्थी चलाने वाली मिडिल क्लास वाइफ़ पारो और पहाड़गंज के कोठे से धंधा करने वाली चंदा मूलतः एक ही जैसी औरत हैं.. ये महज संयोग है कि एक कोठे पर बैठी है और एक अपने पति के बच्चे पाल रही है। देव डी के नारी पात्र के भीतर कई रंग हैं और उनकी शख्सियत कहीं मुकम्मल है। देव वैसा ही एकाश्मी है जैसा कि वह हमेशा से था फ़र्क बस इतना है कि वह दारू के साथ-साथ कोकेन भी सुड़क रहा है।

देव डी के कथ्य में अनगढ़ अनुभूतियाँ तमाम हैं मगर उदात्त भाव नहीं दिखते.. ये अनायास तो नहीं हुआ होगा.. निश्चित ही अनुराग मानते हैं कि यही आज की सच्चाई है। मुझे ऐसा लगता है कि प्रेम और वासना के वितान को रंगते हुए अनुराग वासना वाले छोर पर कुछ अधिक दूर तक चले गए कि संतुलन बिगड़ा हुआ लगता है। मैं मानता हूँ कि हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा प्रेम को वासना के अर्थ में ही जानता है। लेकिन 'जब वी मैट' और 'जाने तू या जाने ना' जैसे फ़िल्मों की भारी सफलता उसी युवा वर्ग के मानस में एक स्वाभाविक अबोधता, मासूमियत का भी इशारा देती हैं जिस युवा वर्ग का प्रतिनिधित्व देव डी के चरित्र करते हैं।

फ़िल्म में नारी पात्रों की तो एक यात्रा दिखती है मगर देव को अनुराग ने एक अजीब सी सी जकड़न दे दी है। फ़िल्म की शुरुआत से ही वो एक ऐसे ढाँचे में फँसा दिखता है जिस से वो कभी नहीं निकलता। उसके एहसासों को दर्शकों का कुछ पता नहीं पड़ता बस सिगरेट, गाँजा और दारु ही जैसे उसके अस्तित्व का अर्थ बनते दिखते हैं।

पूरी फ़िल्म के मूल में सेक्स है.. पर एक दफ़े भी देव डी सफलता पूर्वक किसी के साथ सहवास नहीं कर पाता! इस बात के इशारे हैं कि सेक्स चारों ओर है.. मगर आप होते हुए कभी नहीं देखते। होते-होते न होते हुए देखते हैं। क्या जिस यथार्थ में फ़िल्म के चरित्र जीवित हैं.. उस में प्रेम की परिणति सम्भोग में सम्भव नहीं? या सम्भोग ही सम्भव नहीं?

मेरे एक दोस्त का कहना है कि हम एक विभाजित यथार्थ के उपभोक्ता हैं। इस टुकड़े-टुकड़े हो चुके यथार्थ की टूटन को हम क़तरा-क़तरा जानते हैं, पूरी तरह पहचानते भी नहीं। क्योंकि न सिर्फ़ हम जिस में स्थित हैं वो यथार्थ बिखरा हुआ है बल्कि हमारा अपना निजी अस्तित्व भी कई जोड़ों में बँटा हुआ है। इसीलिए जब अनुराग कश्यप जैसा प्रतिभाशाली फ़िल्मकार इस विभाजित यथार्थ को एक ढाई घण्टे की शक़ल प्रदान करता है तो लोग आह और वाह कर उठते हैं। अनुराग अपने चरित्रों को मानवीय तो बनाते हैं पर अपने एक जटिल अंदाज़ में।

देव डी हमारे यथार्थ का प्रतिबिम्ब है और एक सफल प्रतिबिम्ब है। सवाल ये है कि क्या बीमार को बीमारी का नाम बता देने भर से उसकी बीमारी ठीक हो जाने वाली है? मेरे दोस्त का मानना है कि मन की चोटों को सहलाने के लिए ओज़ू जैसे सिनेमा की ज़रूरत है जो दिलो दिमाग़ को झकझोरती नहीं, उसे पर ठण्डे फाहे रखती है।ओज़ू नहीं तो अलमोदवार ही सही जो समाज के हाशिये पर रहने वाले लोगों को भी एक मानवीय गरिमा प्रदान कर देते हैं। दिक़्क़त मगर ये भी है कि जिसे दारू की लत पड़ जाये वो ठण्डक पहुँचाने वाले रूहअफ़्ज़ा को लात मारता है, ठण्डे फाहों की क्या बात है!

फ़िल्म के भीतर दो सिनेमैटिक स्टाइल हैं। देव डी के दिल टूटने के पहले वाली हिस्से को अनुराग ने काफ़ी सपाट अन्दाज़ से पेश किया है। मगर पारो की शादी के बाद देव की स्मोकिंग स्मोकिंग उठता है धुँआ वाली दुनिया काफ़ी नशीले अन्दाज़ में प्रस्तुत की गई है। और उसके प्रति अनुराग की एक विशेष रागात्मकता नज़र आती है। हर निर्देशक की एक पैट थीम होती है.. लगता है नश्शे की सर्रियल दुनिया अनुराग की थीम है। जो नो स्मोकिंग में भी थी.. और सुना है कि अनुराग की बहुचर्चित पहली फ़िल्म जो आज तक रिलीज़ नहीं हुई, 'पाँच' की भी वही विषय वस्तु है। किसी ने शायद सही कहा है कि हर निर्देशक एक ही फ़िल्म बार-बार बनाता है।

निजी तौर पर मुझे आदमी के नारकीय पतन की धूमिल दुनिया में कोई दिलचस्पी नहीं पर अनुराग कश्यप और उनके अपने प्रति ईमानदार सिनेमा में है। क्योंकि अनुराग हिन्दी की दुनिया में सच्चे सिनेमा के हिरावल हैं। उनकी सफलता से अनेको नए रास्ते खुलेंगे और मैं बहुत कस के चाहता हूँ कि अनुराग कश्यप सफल हों।

अनुराग का सब से अधिक तारीफ़ का पक्ष भी यही है कि वो अपनी पसन्द का सिनेमा बना रहे हैं। किसी निर्माता और वितरक की समझ के अनुसार दर्शक की पसन्द का सिनेमा नहीं बना रहे। अच्छे सिनेमा के बनने की ये पहली शर्त है- जो बना रहा है अगर उसे ही पसन्द नहीं तो किसी और को क्यूंकर पसन्द आएगा।

ब्लैक फ़्राईडे हमारे समय के विकृत वास्तविकता पर आधारित एक अद्भुत फ़िल्म थी। नो स्मोकिंग एक बहकी हुई फ़न्तासी। देव डी को मैं अद्भुत तो नहीं कह सकता मगर नो स्मोकिंग से बहुत बेहतर है। अनुराग से और भी बेहतर सिनेमा बनाने की उम्मीद है!

20 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

उम्दा समीक्षा..देखना तो पड़ेगी यह फिल्म.

अनूप शुक्ल ने कहा…

बहुत सुन्दर अंदाज में सब कुछ लिख गये। इसके पहले पढ़ी एक दो समीक्षाओं से अलग!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

समीक्षा फिल्म देखने को प्रेरित करती है।

Tarun ने कहा…

बहुत उम्दा समीक्षा, देखनी पड़ेगी ये फिल्म

Abhishek ने कहा…

अच्छी समीक्षा प्रस्तुत की है आपने.

डॉ .अनुराग ने कहा…

अनुराग कश्यप की प्रतिभा से कोई अनजान नही है .ओर हर डायरक्टर का एक ख़ास टच उसकी फ़िल्म में दिखना स्वाभाविक है .कल उनका इंटरव्यू देख रहा था उन्होंने कहा ये समूचा देवदास नोवल नही है बल्कि उसे एक विम्ब की तरह प्रस्तुत किया गया है ...समूची युवा पीड़ी नही बल्कि युवा पीड़ी के उस हिस्से का चित्रण जो भी अपने एक अलग गलियारे में साँस लेकर फल फूल रही है....इसे कोई संदेश प्रद फ़िल्म की तरह ना लेकर सिर्फ़ एक कहानी के तौर पे देख जाये ... कल रात मई हॉलीवुड की प्रसिद फ़िल्म while you were sleeping देख रहा था जो की रोमानिटिक कोमेडी है ...पर उसमे भी कई डाइलोग ऐसे है ....जो यहाँ कोई बोल भी ना पाये ......ओर भी कई मूवी है डार्क शेड्स में ..जाहिर है हमें अब इस माध्यम को एक नोवेल की कहानी के तौर पे भी लेना चाहिए ....मुझे याद है श्याम बेनेगल की "मंडी" का अडल्ट कंटेंट होने के कारण मैंने एक उम्र में जाकर देखी थी.....महेश भट्ट एक अलग की तरह वास्तिवकता ..अर्थ से हिन्दी सिनेमा में लाये थे .ये बात ओर है की आज वो ख़ुद भटक गए है ....
आपकी समीक्षा दमदार है...

गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" ने कहा…

Achchhi sameekshaa hai ji

कुश ने कहा…

आपके घर की गंदगी कोई दूसरा बताए तो बुरा लगता है.. देव डी भी वैसा ही कुछ प्रयास है.. दिन बीस बार माँ बहन की गाली देने वाले लोग पर्दे पर ये सब देखकर कहते है संस्कृति कहा जा रही है..

मैने रविवार को देव डी देखी और दिल खुश हो गया.. इसी खुशी में इस फिल्म पर दो चार बाते अपने ब्लॉग पर लिख दी... अनुराग की ब्लॅक फ्राइडे का कोई मुकाबला नही.. अब गुलाल आने वाली है.. सच कहा आपने जब निर्देशक को खुद ही फिल्म पसंद नही तो वो क्यू बनाए..

Mired Mirage ने कहा…

अच्छी समीक्षा है। फिल्म देखूँगी नहीं, क्योंकि शायद ही कभी देखती हूँ। परन्तु यदि कभी ऐसा हो कि टी वी चालू हो और यह फिल्म चल रही हो तो आपकी समीक्षा का ध्यान आएगा और अवश्य देखूँगी। यदि मारपीट नहीं है तो मुझे पसन्द भी आएगी। स्त्री चरित्र देखने की थोड़ी उत्सुकता भी रहेगी।
घुघूती बासूती

Kishore Choudhary ने कहा…

कल ही एक मित्र ने देव डी के फोटो भेजे थे आज संयोग से आपकी समीक्षा पढने को मिली , बहुत सुंदर लिखा है आपने आपकी हर बात पसंद आई और ज्यादा ज्ञान है नहीं वरना झाड़ ही देता

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

इस शनिवार को देखनी ही पडेगी जी यह फिल्म। सभी अच्छी बता रहे है।

Arvind Mishra ने कहा…

ठीक है पर क्या परदे पर आना चाहिए और क्या नहीं इसकी कोई लक्ष्मण रेखा तो हो -क्या यह फिल्म किशोरों के लिए भी है ? क्या आप इसे अपने बच्चों के साथ देख सकते हैं ? क्या इसे ए प्रमाणपत्र जरी किया गया है ?

मीनाक्षी ने कहा…

प्रभावशाली समीक्षा ने फिल्म देखने की लालसा को और बढा दिया है...

ई-स्वामी ने कहा…

मैंन देवदास पढा भी, तीनो फ़िल्में - कुंदनलाल सहगल वाली समेत देखी भीं. देव डी भी देखूंगा.

अगर आपको विदेसी पृष्ठ भूमी पर बनी देवदास नुमा फ़िल्म देखने में रुचि हो तो लीविंग लास वेगस देखियेगा.
www.imdb.com/title/tt0113627

अभय तिवारी ने कहा…

स्वामी जी,
मेरी राय में तो लीविंग लास वेगास सब से अच्छी देवदास है. बावजूद इसके कि बनाने वाले ने देवदास शायद पढ़ी भी न हो और कहानी सिर्फ़ देवदास और चन्द्रमुखी के रिश्ते की है..जब भी वो फ़िल्म स्टार मूवीज़ पर आती है देखता रह जाता हूँ..

मिश्रा जी,
शायद फ़िल्म को 'ए' प्रमाणपत्र दिया गया है..

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

लगता है फिल्म देखनी ही पड़ेगी... इसी बहाने फिर मिलेंगें..

अनिल कान्त : ने कहा…

अपने ही अंदाज़ में आपने बहुत कुछ लिख दिया ..

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

Irshad ने कहा…

aap bhi filme kyon nah banate ho?

SHASHI SINGH ने कहा…

जितनी लगन से अनुराग ने देव डी बनाई है उससे कहीं ज्यादा निष्ठा से आपने यह समीक्षा लिखी है। देव डी के बारे में अबतब जो कुछ भी पढ़ा-सुना उनमें से आपके ये शब्द सबसे ईमानदार और दिल की गहराई से निकले हुई जान पड़े।

अनुराग की सफलता के लिए आपकी शुभेच्छा के कारणों से भी मैं पूरी तरह इत्तेफाक रखता हूं।

विकास कुमार ने कहा…

अभी अभी देख कर आ रहा हूँ. फिल्म अच्छी लगी.

"लेकिन 'जब वी मैट' और 'जाने तू या जाने ना' जैसे फ़िल्मों की भारी सफलता उसी युवा वर्ग के मानस में एक स्वाभाविक अबोधता, मासूमियत का भी इशारा देती हैं जिस युवा वर्ग का प्रतिनिधित्व देव डी के चरित्र करते हैं।"

इन फ़िल्मों की सफ़लता ये दिखाती हैं - ये थोड़ा गले नहीं पड़ा. शाय्द ये फ़िल्में युवा वर्ग के बीच सफ़ल इस लिये हैं क्युँकि यही वे फ़िल्में हैं जो प्रेम और सेक्स के बीच से गुजर जाती हैं. प्रेम के छोर पर होने में मजा नहीं आता और सेक्स का छोर थोड़ा रिस्की दिखता है. (नैतिकता नहीं यहाँ डर का आयाम है - अधिकांश मामलों में)

ये फ़िल्में प्रेम की मासुमियत के चलते सफ़ल होती हैं - इसे मानने में मैं परहेज कर रहा हूँ. ये एक रास्ता हैं इस छोर से उस छोर तक जाने के लिये. थियेटर के कोने में बैठे जोड़े - सबूत हैं.

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