रविवार, 20 जुलाई 2008

न्यूकिलाई सौदे का राष्ट्रीय हित

सोनिया गाँधी, मनमोहन सिंह, राहुल बाबा, कांग्रेस पार्टी के तमाम दूसरे लग्घू-बग्घू आजकल अपने उच्चतम स्वर पर राष्ट्रीय-हित का गान गा-गा कर देश के सामने यह सिद्ध करने को उद्धत हैं कि इस न्यूकिलाई सौदे से बेहतर सौदा तो मुमकिन हो ही नहीं सकता।

इस कोरस-गान में पूर्व राष्ट्रपति डॉ० कलाम, न्यूकिलाई वैज्ञानिक डॉ० काकोदकर, पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा भी अपने-अपने स्वरों का योगदान कर चुके हैं। तमाम टीवी चैनल्स भी अपने-अपने ‘राष्ट्रीय’ हितों को ध्यान में रख कर कांग्रेस की राष्ट्रभक्ति और लेफ़्ट के राष्ट्रद्रोह को साबित करने में कोई क़सर नहीं छोड़ रहे जिनमें सबसे आगे हैं ‘सीएनएन’ आईबीएन के राजदीप सरदेसाई।

जोड़तोड़ हो रही है, तोड़फोड़ हो रही है, होड़महोड़ भी हो रही है, सारी बातें हो रही हैं मगर कहीं भी लेफ़्ट इस सौदे की मुखालफ़त क्यों कर रहा है इसकी चर्चा नहीं हो रही। आखिर क्या है ऐसा इस सौदे में जो देश के हित में नहीं है..? भाजपा भी चुप्पी साध कर इस मौके का पूरा-पूरा फ़ायदा उठाने में लगी है। असलियत तो ये है कि सौदे के बारे में उसके विचार कांग्रेस से कोई अलग नहीं है। और हम तमाशबीन की तरह इस लम्बे नाटक के सीधे प्रसारण का वैसे ही आनन्द ले रहे हैं जैसे ये एक और इंडिया-ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट मैच हो।

इस सब के बीच कल मेरी नज़र उर्दू अख़बार ‘इंक़िलाब’ के अंग्रेज़ी सेक्शन ‘क़ौम’ में शाया एक लेख पर पढ़ी जिसमें न्यूकिलाई सौदे के तमाम ऐसे बिन्दुओं को उजागर किया गया है जिनकी कोई चर्चा नहीं करता।

सबसे पहले समझिये हाइड एक्ट में क्या है..

१. हाइड एक्ट के मुताबिक हमारे परमाणु परीक्षण की सूरत में हमें न्यूकिलाई आपूर्ति बंद कर दी जाएगी।

२. हमें न्यूकिलाई ईधन की सिर्फ़ उतनी ही आपूर्ति की जाएगी जो हमें किसी भी तरह का रिज़र्व बनाने से बाधित रखे। ताकि आपूर्ति बंद होने की सूरत में हम कोई स्वतंत्र क़दम न उठा सकें।

३. हाइड एक्ट हम से एक ऐसी तारीख़ उगलवाना चाहता है जिसके बाद हम कभी परमाणु-परीक्षण न करने का वादा करें। यह भारत के आणविक हथियार कार्यक्रम को दफ़न करने के बराबर होगा। मैं स्वयं इस पक्ष में हूँ पर उस सूरत में नहीं जबकि अमरीका और चीन को सारे हथियार चमकाने और बाक़ी दुनिया को धमकाने की खुली छूट मिली हुई हो।

४. ये एक्ट भारत से अपेक्षा करता है कि तमाम न्यूकिलाई संधियों पर जो अमरीका की नीति है भारत उसका समर्थन करे जैसे फ़िसाइल मटीरियल कट-ऑफ़ ट्रीट्री; और विदेश नीति के मामले में अमरीकी नीति से चिपक कर चले। भारत ईरान पर प्रतिबंध लगाने के मामले में मामले में एक बार आई ए ई ए में पिछली बार अमरीका के साथ और ईरान के खिलाफ़ वोट दे चुका है जबकि ऐसा करने से भारत-ईरान गैस पाइप लाइन बुरी तरह खतरे में पड़ सकती है।

अब देखिये १२३ समझौता क्या कहता है..

१. पहले तय हुआ था कि अमरीका भारत को न्यूकिलाई ईधन बनाने की प्रकिया के विषय में पूरी मदद करेगा मगर असली समझौते में से बेहद महत्वपूर्ण हिस्से ग़ायब हैं; यूरेनियम के एनरिचमेंट और हैवी वाटर के उत्पादन की प्रक्रिया में अमरीका तकनीकि सहयोग का ना कोई उल्लेख है न कोई वादा।

२. जबकि जापान और दक्षिण कोरिया के साथ अमरीका ने जो १२३ समझौता किया है उसके अन्तर्गत इन सभी बिन्दुओं पर तक्नीकि सहयोग शामिल है। इस लेख को पढ़ने के पहले मुझे पता था कि भारत एक अकेला ऐसा देश है जिसके साथ अमरीका ऐसा समझौता कर रहा है.. मगर ये सच नहीं है बल्कि इस सौदे को हमारे गले के नीचे धकेलने के लिए किया जा रहा एक प्रचार है।

३. हालांकि हमें रिप्रोसेसिंग प्लान्ट लगाने की इजाज़त दी जा रही है जिसकी अकेले की लागत लगभग दस हज़ार करोड़ रुपये होगी। मगर ऐसे किसी भी प्लान्ट को बनाने के पहले हमें इस प्लान्ट के सारे ब्लूप्रिन्ट्स यानी ड्राइंग, डेटा, समीकरण सभी कुछ आई ए ई ए के पास भेजना होगा एप्रूवल के लिए। आपके वैज्ञानिकों की बरसों की मेहनत से उपजे बेहद गोपनीय शोधकार्यों को इस तरह से राजनैतिक मंच पर रख के देने केलिए राजी हो जाना किस प्रकार की विदेश नीति की विजय ये मेरी समझ से परे है.. क्योंकि ये भी प्रचार का हिस्सा है कि ये सौदा हमारी विदेशनीति की सबसे बड़ी विजय है।

४. १२३ समझौता हमें बाध्य करता है कि हम अपने इस राष्टीय प्लान्ट को चलाने के नियम और तरीक़ों का पालन करेंगे। यू एस एटॉमिक इनर्जी एक्ट के सेक्शन १३१ के अन्तर्गत एक और समझौता करेंगे जो अमरीकी कांग्रेस द्वारा एप्रूव किया जाएगा। लेकिन इस एक और समझौते का ज़िक्र १२३ समझौते में कहीं नहीं है।

५. और सबसे खास बात ये है कि इस १२३ समझौते में कोई आर्बिटरेशन क्लॉज़ नहीं है। इस क्लॉज़ का महत्व आप इस बात से समझिए कि जापान ने इस क्लॉज़ के लिए अमरीका के साथ खींचतान करते हुए दो साल ज़ाया किए। छोटे-मोटे मामूली समझौतों में भी विवाद होने की सूरत में एक आर्बिटरेशन क्लॉज़ होता है मगर इतना बड़ा इतना ऐतिहासिक समझौता इस विषय पर खामोश है। तो क्या इस मौन को जंगल के उस पुराने क़ानून के प्रति स्वीकृति समझा जाय कि जिसके तहत बलवान, कमज़ोर को दबाता आया है।


यहाँ दी गई जानकारी उर्दू अख़बार 'इंक़िलाब' के अंग्रेज़ी सेक्शन 'क़ौम' में शाया एक लेख, ‘जज द न्यूकिलयर डील ऑन फ़ैक्ट्स, नॉट कनविक्शन्स’ पर आधारित है। इस लेख के लेखक अशोक पार्थसारथी, इंदिरा गाँधी के वैज्ञानिक सलाहकार रह चुके हैं।

10 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

आपकी लगभग सारी बातों से सहमति

लेकिन मुझे लगता हैं कि तब भी हम अब से बुरे न होंगे. इस समय भारत के उपर तमाम प्रतिबंध हैं, और हमारे न्युक्लियर रियेक्टर बिना ईंधन के अन्डर कैपेसिटी हैं. अगर यह डील हो तो बहुत सारी दिक्कतें मिट जायेगीं.

जहां ताक ईरान-भारत पाइपलाइन का सवाल है, उसको पाकिस्तान से होकर जाना है. साथ ही अगर अमेरिका न्युक्लियर करार की कीमत मांग रहा है, तो ईरान पाइपलाइन की मांगेगा. और यकीन करिये वो कीमत ज्यादा महंगी होगी. बेहतर होगा की अगर साथ देना ही है तो एक जनतंत्र का दें. और अमेरिका का जनतंत्र हिन्दुस्तान से कम शक्तिशाली नहीं. क्या आप ईरान के बारे में ऐसा कह सकते हैं? वैसे भी सालों से बात हो रही है पाइपलाइन की, और हर बार फच्चर फंस रहा है. न्युक्लियर डील में इतनी देर नहीं लगेगी.

जहां तक न्युक्लियर टेस्ट का सवाल है. पिछले टेस्ट बहुत सारे प्रतिबंध लगे. अगर आप डील करें या न करें, टेस्ट करेंगे तो प्रतिबंध लगेंगे. इसलिये टेस्ट का नुक्सान तो होना ही है. तो डील करके भी इस नुक्सान से क्या डरना?

मुझे लगता है कि फॉसिल इंधन से निर्भरता कम करने में ही भारत की भलाई है, क्योंकि वो जिस समूह के हाथों में है, वो इस समय पूरी दुनिया को ransom पर लेना चाहते हैं.

इसलिये मेरे विचार से तो बेहतर है कि न्युक्लियर डील हो के रहे.

बेनामी ने कहा…

अच्छा है !

Manish Kumar ने कहा…

सही समय पर बेहद जरूरी लेख। मैं बहुत दिनों से इस डील के अहितकारी पहलुओं के बारे में जानने को उत्सुक था। पर मीडिया का सारा ध्यान इधर से उधर गए सांसदों पर ज्यादा टिका है जबकि बहस इन मुद्दों पर होनी चाहिए।

Pramod Singh ने कहा…

सही है. सही है. एक बार फिर- सह्ह्ही है.

अशोक पाण्डेय ने कहा…

हमें तो लगता है कि कमरतोड़ महंगाई जैसे जरूरी मुद्दे से आम जन का ध्‍यान हटाने के लिए यह राजनीतिक नूराकुश्‍ती की जा रही है। वामपंथी दलों को देशहित की इतनी ही चिंता है तो उन्‍हें महंगाई के मुद्दे पर समर्थन वापस लेना चाहिये था। महंगाई का अभी यह हाल है तो आम चुनाव के बाद क्‍या स्थिति होगी। मुद्रा‍स्‍फीति ऐसे ही बेलगाम रही तो एक दिन हमारी स्थिति भी जिम्‍बाबवे जैसी होगी कि अरब खरब रुपये के नोट जारी करने पड़ेंगे। यह पहलू एटमी करार से अधिक चिंताजनक है।

अजित वडनेरकर ने कहा…

सत्य वचन अभय भाई।
गरिष्ठ विषय पर इतना सुपाच्य लेख लिखना आपके ही वश में था। एक बार और पढ़ा जाएगा।

Farid Khan ने कहा…

यह इतनी गम्भीर बात होगी मैंने सोचा नहीं था.... यह तो पूरी तरह नकेल कसने वाली बात है जो अक्सर जानवरों को वश में करने के लिए जाता है।

गरिमा ने कहा…

बाप रे, ये सब तो पता ही नही था, खैर फ़ैसला तो कल हो ही जायेगा कि नकेल कस गया या बच गये।

arvind mishra ने कहा…

आपने कुछ पहलुओं को उजागर किया -धन्यवाद !पर फिर भी यही लगता है भारत फायदे में रहेगा .अमेरिका का विशाल जनतंत्र हमें आश्वस्त करता है .वे शायद इतने टुच्चे नहीं जितने और कई राष्ट्र .और अपना हित तो सभी देखते हैं -भारत पर अमेरिका कोई दया नही कराने जा रहा -उसके कए छुपे एजेंडे हो सकते हैं -हमें चौकस तो रहना ही होगा .

Dr. Chandra Kumar Jain ने कहा…

बेहद दुरुस्त चिंतन.
पुष्ट जानकारी
प्रभावी विश्लेषण
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डा.चन्द्रकुमार जैन

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