शुक्रवार, 23 मई 2008

मेरे मित्र बोधिसत्त्व

बोधि को कोई ब्लॉगर कह रहा है कोई साहित्यकार। मैं बोधि को तब से जानता हूँ जब वे साहित्यकार नहीं थे और ब्लॉगर तो नहीं ही थे.. वे थे सिर्फ़ एक छात्र.. मेरी तरह। हम दोनों इलाहाबाद में पढ़ते थे.. और कुछ-कुछ सामाजिक सरोकार भी रखते थे। मैं पी एस ओ का सदस्य था और वे एस एफ़ आई के। ये दोनों संगठन बहुधा मुद्दों पर एक साथ खड़े होते थे और चुनाव में एक दूसरे के विरूद्ध प्रत्याशी खड़ा करते थे और लड़ते थे.. मगर मेरे और बोधि के बीच में कोई संघर्ष नहीं था.. हाँ बहसें होती थीं.. और जैसी कि मेरी आदत थी मैं सामने वाले को ध्वस्त करने की कोशिश में रहता भले ही वो मित्र बोधि ही क्यों न हों। पर मेरी इस मरकही फ़ित्रत के बावजूद बोधि और मेरे बीच कभी कोई कड़वी घटना नहीं घटी। हम मित्र ही बने रहे..

बरसों बाद हम मुम्बई में मिले और मित्रता वहीं से शुरु हो गई। संयोग से आज हम दोनों एक ही पेशे में हैं; दोनों ही शब्द बेच कर पैसे कमाते हैं। आजकल बोधि भाई एकता कपूर के लिए महाभारत सीरियल के लेखन की ज़िम्मेवारी संभाले हुए हैं। ऐसा मौका मुझे मिलता तो मैं भी लोक लेता.. पर ये सौभाग्य बोधि भाई को मिला है। वैसे ये महज़ भाग्य की ही बात नहीं है.. उनकी व्यवहार-कुशलता का भी योगदान है। मैं व्यवहार-कुशल नहीं हूँ.. कई दूसरे लोग भी नहीं है.. पर इससे क्या बोधि की व्यवहार-कुशलता एक दुर्गुण में बदल जाती है?

मगर ये काम उन्हे मिलने के पीछे सब से महत्वपूर्ण कारण यह है कि वह इस काम के लिए सबसे योग्य उम्मीदवार हैं। बिना किताब का सहारा लिए वे घंटो महाभारत पर व्याख्यान कर सकते हैं.. रामचरित मानस की सैकड़ों चौपाइयाँ उन्हे मुँहज़बानी याद हैं। उनकी जैसी स्मृति का स्वामी मैंने दूसरा नहीं देखा। बोधि में अनेकों गुण हैं पर वो मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं हैं.. हम-आप सब की तरह मनुष्य हैं। जहाँ गुण हैं तो कुछ कमियाँ भी हैं। ज़रूर हैं—सबकी होती हैं।

मेरे मित्र हैं .. गुणों को सोहराता हूँ और अवगुणों को हतोत्साहित करता हूँ। और ऐसा भी नहीं कि मेरे उनके बीच कोई वैचारिक मतभेद नहीं.. दो अलग मस्तक हैं मतभेद तो स्वाभाविक है। पर मित्रता मस्तक का नहीं हृदय का विभाग है। ज्योतिष जानने वाले बन्धु जानते होंगे कि कुण्डली में मित्र का स्थान चौथा घर है.. हृदय का स्थान। वैसे ग्यारहवां घर भी मित्रों का बताया जाता है पर वो लाभ का स्थान है.. और उस स्थान से संचालित मित्रता भी नफ़ा-नुक़सान वाली होती है। असली मित्रता तो चौथे स्थान की ही है।

इसीलिए मेरे कई मित्र ऐसे भी हैं जो भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रदेश अध्यक्ष हैं। कुछ शिव सेना के जिलाध्यक्ष रह चुके हैं। यानी कि जिनसे वैचारिक रूप से छत्तीस का आँकड़ा है। पर मित्रता तो व्यक्ति से होती है उसके विचारों से नहीं.. विचार तो व्यक्ति की संरचना का बहुत छोटा हिस्सा है। विचार बदलने में देर नहीं लगती .. तर्क की बात है .. एक पल में विचार इधर के उधर हो जाते हैं। और अगर तर्क से नहीं हुए तो मतलब साफ़ है कि विचार की जड़ में कोई आवेग कुण्डली मार के पड़ा है.. विचार की प्रधानता की बात ही खत्म हो गई।

फिर भी अगर किसी को लगता है कि मित्रता विचार के आधार पर होती है तो बचपन के मित्रों का क्या करेंगे? वो तो मित्र कहलाने के क़ाबिल ही नहीं रहेंगे! जबकि सच्चाई ये है कि जब कॉलेज से निकल कर नौजवान कुछ विचार करने लायक होता है तो मित्र बनाने की कला न जाने कहाँ हेरा आता है?

लुब्बे-लुबाब ये है कि बोधि भाई साहित्यकार हैं, ब्लॉगर हैं, और भी बहुत कुछ हैं.. पर वे उस वजह से तो मेरे मित्र नहीं हैं? मित्र तो सिर्फ़ एक मनुष्य, एक व्यक्ति होने के नाते हैं और रहेंगे।

भाई बोधि को कुछ लोग देख कर पुलिसवाला और पहलवान भी समझ लेते हैं पर अपने डील-डौल के बावजूद वे इतने विनम्र हैं कि मेरी ज़रूरत की चार किलो की पुस्तक को खरीद कर बलार्ड पिअर से ढो के मेरे घर तक छोड़ जाते हैं, अपनी एकता कपूर के साथ अपनी मसरूफ़ियत के बीच। फिर खुद पेचिश से कमज़ोर हो जाने के बावजूद अपने घर के मेहमानों के आग्रह पर उन को टाँड़ से किताबें निकाल-निकाल कर भी दिखाते हैं.. भले ही वो मेहमान उनके मित्र हों चाहे न हों!

प्रमोद भाई, अब तो ज़ाहिर हो गया, बोधि को अपना मित्र नहीं मानते.. और वे जो कुछ कहें- वो उनका मामला है- वो कह सकते हैं। वे भी मेरे मित्र है.. और मैं उनकी इज़्ज़त करता हूँ। बोधि के बचाव की मुद्रा में मैं उन पर पलटवार नहीं कर सकता.. पर बोधि अकेले खड़े पिटते रहें ये भी मैं नहीं देख सकता। ग़लतियाँ सबसे होती हैं.. बोधि से भी हो सकता है हुई हो.. पर वे खलनायक हैं ऐसा मानना मेरे लिए अस्वीकार्य है।

12 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

ब्लाग्स बहुत ले-दे कि दुनिया हे सर पता नहि क्या बात-बेबात कि अनबन रहति हे

लगता हे यहा कोइ दुनियादार नहि, सब फर्माबर्दार हि हे

Rajesh Roshan ने कहा…

विचारो में भिन्नता होते हुए भी एकता हो सकती है. मुश्किल है, असंभव तो नही कहूँगा

yunus ने कहा…

एक जरूरी पोस्‍ट ।
आपकी दोस्तियों को सलाम करते हैं हम ।
और अपने ऐसे दोस्‍तों का खूब सम्‍मान भी करते हैं और गरियाते भी हैं ।

दिनेशराय द्विवेदी ने कहा…

अभय जी, दोस्तियाँ दोस्तियाँ हैं, और वैचारिक यात्रा उस से बिलकुल भिन्न। दोस्त इस यात्रा को मजेदार भी बनाते हैं और कष्ट भी देते हैं मगर फिर भी साथ निभाते हैं। वैचारिक यात्रा के कारण कोई दोस्ती नहीं छोड़ता और दोस्त को पिटने भी नहीं देता।
आप दोस्ती कायम रखिए और वैचारिक यात्रा भी।
जीवन की ये विचित्रताएं ही उसे जीवन्त बनाती हैं।

Nandini ने कहा…

अब दोस्‍त कामै ऐसा करेंगे.. तो पिटेंगे ही... और आप भी डबल दोस्‍ती निभाए हैं... ये अच्‍छा लगा... संयत संयमित...

बोधि हमारे पसंदीदा कवियों में हैं... लेकिन ऐसा हल्‍का लिखने से पहले उनके कलम की स्‍याही सूख जाया करे... और उस दिन स्‍याही की सारी दुकानों में हड़ताल हुआ करे... हमारी यही दुआ है...

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

बहुत बढ़िया पोस्ट...और जरूरी भी...
मेरा मानना है कि अगर कहीं भी छोटे से मतभेद से भी इस तरह की स्तिथि पैदा हो तो हम सभी को अपने-अपने स्टैंड पर विचार कर उचित कदम उठा समस्या का समाधान करना चाहिए.

अजित वडनेरकर ने कहा…

सही सही।

PD ने कहा…

आपका पोस्ट पढना अच्छा लगा.. आज मेरे जितने भी मित्र हैं सभी से मेरी वैचारिक भिन्नताएँ हैं फिर भी सभी मेरे अजीज है और मैं उनका..
लगे रहे.. आपकी दोस्ती को सलाम.. :)

बाल किशन ने कहा…

कुछ नही बस
आपलोगों की दोस्ती को सलाम.

मनीषा पांडेय ने कहा…

Pyare Abhay, bahut der bad jab mujhe is prakaran ka pata chala to maine sari poste padhi. Sach kah rahi hun kyunki aapse sach bol sakti hun, aisa mera dilee vishvas hai. Abhay, mujhe bilkul achcha nahi laga aur bahut gussa aa raha hai ki aap jo dono ko itne samay se jante hai aur jinke vivek aur tark buddhi par mujhe itna bharosa hai, vo aap aisi bat kyun kah rahe hai... Mujhe sachmuch aapse bahut narazgi hai. Datail baten phone par, lekin filhal to bas aapse khub jhagda karne ka man kar raha hai...
Manisha

Neeraj Rohilla ने कहा…

आपकी मित्रता के जज्बे को नमन,
आपके लेख ने बहुत से नए विचारों की कोंपले मन में लगाई हैं, हाईस्कूल में "मित्रता" नाम की एक कहानी पढी थी, उसकी बरबस याद आ गयी |

बधिसत्व जी के सरल स्वभाव के बारे में बताने के लिए धन्यवाद,

नीरज रोहिल्ला

Priyankar ने कहा…

मित्रता तो वही अच्छी है -- चौथे घर वाली . बाकी तो दुनियादारी है .

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