बुधवार, 7 मई 2008

आई पी एल के छक्के

आई पी एल शुरु होने के पहले बहुत लोगों ने उसकी सफलता पर प्रश्नचिह्न लगाए थे; मैं भी इस जमात में शामिल था। पर आज, ‘मनोरंजन के बाप’ के आग़ाज़ के बीसेक दिन बाद कोई शुबहा नहीं रह गया है कि पूरा देश अपनी शामें कहाँ ज़ाया कर रहा है।

मेरी सारी आशंकाओ को धूल चटाता हुआ आई पी एल साढ़े आठ की टी आर पी के साथ आरम्भ हुआ.. टी वी के शीर्ष कार्यक्रम ‘एकता की सास-बहू’ से दो अंक ऊपर.. हालत यह है कि सारे अन्य चैनल्स इसकी समाप्ति का इन्तज़ार कर रहे हैं। ऐसा क्यों हुआ..? स्थानीयता, वफ़ादारी, भावनात्मक जुड़ाव जैसी तमाम सीमाओं के बावजूद आई पी एल के साथ लोग क्यों तमाशाई बने हुए हैं?

मैं ने लिखा था.. मगर आई पी एल तो शुद्ध सर्कस है। सर्कस कभी-कभी देखने के लिए बड़ा रोचक है पर आप रोज़-रोज़ उसे देख कर वही उत्तेजना नहीं महसूस कर सकते।
अगर इनमें से किसी टीम के साथ मेरे दिल की भावना नहीं जुड़ेगी तो मैं सब कुछ छोड़कर इन के मैच क्यों देखने लगा?


मेरे आकलन सिर्फ़ यहाँ तक सही था कि वफ़ादारियाँ नहीं है.. इसके आगे ग़लत.. वफ़ादारियाँ नहीं हैं पर पूरा मज़ा उठाने के लिए लोग बड़ी आसानी से अपनी वफ़ादारियाँ चुन रहे हैं.. एक ही परिवार के भीतर लोगों की वफ़ादारियाँ बँट गई हैं। ऐसा होने के पीछे किसी खास खिलाड़ी का आकर्षण काम कर रहा है शायद!

वैसे मज़ा लेने वालो दो बैलों के युद्ध, दो मुर्ग़ों के युद्ध, दो कुत्तों के युद्ध में भी अपने-अपने पक्ष चुन कर मज़ा ले लेते हैं। मैंने इस पहलू का पूरी तरह से अनदेखा कर दिया था। और सबसे बड़ी ग़लती मैंने ‘सब कुछ छोड़कर’ जैसा वाक्यांश इस्तेमाल कर के की.. भारतीयों के पास सब कुछ छोड़ने जैसा कुछ भी नहीं है..

मेरा ये ख्याल कि शुरुआत में लोग उत्सुकतावश देखेंगे पर जल्दी ही ऊब कर पूर्वस्थिति में लौट जाएंगे, पूरी तरह ग़लत था। मेरा सोचना था कि वे ऊब कर जो पहले कर रहे थे वो करने लगेंगे.. पर पूर्वस्थिति जैसी कोई चीज़ थी ही नहीं.. वो तो कुछ कर ही नहीं रहे थे.. और आई पी एल को उनके उबाने की कोई ज़रूरत नहीं पड़ी.. वो पहले से ही इतने ऊबे हुए थे कि अपने समय को कैसे काटे इस प्रश्न के आगे लाजवाब थे।

अधिक से अधिक हो ये सकता था कि वे रिमोट बीबी के हाथ में दे देते और ‘एकता की सास’ में क्या हुआ, देखने लगते बीबी के साथ। पर अभी शायद बीबी 'एकता की सास' से ऊब कर 'आई पी एल के छक्कों' को देख रही है। मेरे एक मित्र इस बात को कुछ यूँ रखते हैं कि “जिस आदमी ने दिन भर दफ़्तर में मरवाई हो वो शाम को आकर कुछ शुद्ध मनोरंजन चाहता है.. और आई पी एल से अच्छा ड्रामा उसे कहाँ मिलेगा?”

बात बहुत सरल है.. हर आदमी के भीतर एक तमाशाई है जो सड़क होने वाले झगड़े को देखने के लिए साइकिल रोक कर किनारे खड़ा हो जाता है। सिर्फ़ वही आदमी एक बार उड़ती नज़र डाल कर आगे बढ़ जाता है जिसके पास करने के लिए कुछ सार्थक हो.. घर से कोई मक़्सद ले कर निकला हो।

बात घूम कर फिर उसी मक़्सद पर जा अटकती है.. या तो अधिकाधिक लोग भटके हुए हैं और जीवन का उद्देश्य खोज पाने में नाकामयाब रहे हैं.. और बस कुछ विरले महापुरुषों ने अपना जीवन उस अमूल्य ध्येय को पाकर सफल किया है। और या फिर वे भ्रमित आत्मा है और वास्तव जीवन का कोई मक़सद नहीं.. और ये बात हर तमाशाई जानता है और सब कुछ भूल कर मज़े से तमाशा देखता है।

8 टिप्‍पणियां:

अरुण ने कहा…

अरे हम ओ जेई समझै हते, कि इहा तारी बजान वारे छक्कन के बारे मे कछु लिखो है, काइ ते जब ते जे चियरलिडरियन पे बैन लगो है हमनै तो जे सब देखनई छोर दियो है,हम तो जेइ समझ रये हते कि हुआ अब चियर लिडरनियन के बदले जे आई पी सी एल बाले छक्कअन ते डांस फ़ांस कराये रये होंगे तो तुम बाई पे लिखो हो :)

हर्षवर्धन ने कहा…

सही है। मैंने अपनी राय बगलपट्टी में दर्ज कर दी है।

PD ने कहा…

अजी हम तो महापुरूषों में से नहीं आते हैं फिर भी आई पी एल नहीं देखते हैं.. ऐसा नहीं कि हम कोई मकसद लेकर आफिस से निकलते हैं, पर क्या करें टीवी से चिढ ही कुछ ऐसी है.. :)

भुवनेश शर्मा ने कहा…

आईपीएल तो है ही मजेदार. कभी कैटरीना तो कभी प्रीति जिंटा जैसी देवियों के दर्शन हो जाते हैं और चीयरलीडर्स तो हैं ही.
साथ में छक्‍के-चौवों का आनंद अलग से. स्‍टेडियम में बैठने वालों की तो वाकई बल्‍ले बल्‍ले है

Udan Tashtari ने कहा…

आपके आदेशानुसार वोट के माध्यम से राय व्यक्त कर आये,सर.

राजीव जैन Rajeev Jain ने कहा…

जो आज्ञा

vimal verma ने कहा…

अरे अभय जी मैने पहले भी टिप्पणी की थी पर यहां नहीं देखकर फिर से लिखना पड़ रहा है...पर एक बत तो है कि आई पी एल में कुछ मैच देख कर मज़ा आ रहा है...हमेशा कोई फ़ंसा हुआ मैच देखने मज़ा आता है और आई पी एल में अब वो मज़ा आने लगा है...बहुत सी टीमें जो कागज़ पर मजबूत दिख रही थीं मैदान में फ़ीकी लगने लगी है...अब तो असली क्रिकेट तेज़ क्रिकेट देखने को मिल रहा है....पर दुख इस बात का है कि कभी कभी लगता है अपने रोमांच के चक्कर में हमने खिलाड़ियों को ग्लैटियेटर समझ लिया है...और आखिर तक वो हमें सारा मज़ा दे रहे है....बिना थके...हमारे रोमांच को सहला रहे हैं जो हमें और किसी खेल में मिलता नज़र नहीं आ रहा....सास बहू के सीरियल जब तक मैच चल रहे हैं इनसे पीछे ही रहेंगे.....

DR.ANURAG ARYA ने कहा…

दरअसल लोग टी.वी की एकरसता से उकता गए है ओर समाचार वाले भी खली ओर राखी सावंत के तोतको मे पड़े है....एकता कपूर टेंशन मे है.......बस यही बात है......

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