मंगलवार, 31 जुलाई 2007

भागी हुई लड़कियाँ

आलोक धन्वा ने गिनी चुनी कविताएं लिखी है.. पर सारी की सारी अविस्मरणीय हैं.. गोली दागो पोस्टर, जनता का आदमी, पतंग, भागी हुई लड़कियाँ, ब्रूनों की बेटियाँ..आलोक धन्वा की उमर पचपन साठ से कम क्या होगी.. मगर कुल जमा उनका एक ही संग्रह छपा है..दुनिया रोज़ बनती है.. आज ही देखने को मिला .. कई कविताएं ऐसी कि साफ़ लगता है कि वे संग्रह की पृष्ठ संख्या को सैकड़े के करीब धकेलने के लिए लिखीं गईं हैं.. पुरानी वाली राय संकट में आ गई.. रायों के साथ ये बहुत होता है.. कुछ नया तथ्य मिलते ही उनका अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है.. क्या करूँ.. राय बनाना ही छोड़ दूँ क्या..?

पिछले दिनों आलोक धन्वा अपनी कविता के कारण नहीं अपने निजी प्रसंगों के चलते चर्चा में रहे.. साथ ही उनकी कविता 'भागी हुई लड़कियाँ' का भी ज़िक्र होता रहा.. कविता मेरी पढ़ी हुई थी पर पास में नहीं थी.. मेरे निवेदन पर मेरे पुराने अज़ीज़ इरफ़ान ने यतन से आलोक जी के संग्रह की एक प्रति मुझे सप्रेम प्रेषित कर दी .. इरफ़ान इस तरह के कामों के लिए हमेशा प्रसिद्ध भी रहे हैं दोस्तों के बीच.. वो जिन दूसरे तरह के कामों के लिए भी प्रसिद्ध रहे हैं.. उनकी बात मैं यहाँ नहीं करूंगा..

वापस आलोक जी पर लौटते हुए पढ़ने वालों से मेरा आग्रह यही रहेगा कि वे कविता को कवि के निजी जीवन की छाया से स्वतंत्र करके पढ़े.. बावजूद इसके भागी हुई लड़कियां वास्तविक से ज़्यादा एक रूमानी दुनिया का खाका खींचती सी लगती है... मेरी ये राय कविता के शब्दों को कुंजी पटल पर पीटते हुए बनी है.. इसे बहुत कान न दें.. राय ही तो है..



भागी हुई लड़कियाँ

एक

घर की ज़ंजीरें
कितना ज़्यादा दिखाई पड़ती हैं
जब घर से कोई लड़की भागती है

क्या उस रात की याद आ रही है
जो पुरानी फ़िल्मों में बार बार आती थी
जब भी कोई लड़की घर से भागती थी?
बारिश से घिरे वे पत्थर के लैम्पपोस्ट
सिर्फ़ आँखों की बेचैनी दिखाने-भर उनकी रोशनी?

और वे तमाम गाने रजतपर्दों पर दीवानगी के
आज अपने ही घर में सच निकले?

क्या तुम यह सोचते थे कि
वे गाने सिर्फ़ अभिनेता-अभिनेत्रियों के लिए
रचे गए थे?
और वह खतरनाक अभिनय
लैला के ध्वंस का
जो मंच से अटूट उठता हुआ
दर्शकों की निजी ज़िंदगियों में फैल जाता था?

दो

तुम तो पढ़कर सुनाओगे नहीं
कभी वह ख़त
जिसे भागने से पहले वह
अपनी मेज़ पर रख गई
तुम तो छिपाओगे पूरे ज़माने से
उसका संवाद
चुराओगे उसका शीशा, उसका पारा,
उसका आबनूस
उसकी सात पालों वाली नाव
लेकिन कैसे चुराओगे
एक भागी हुई लड़की की उम्र
जो अभी काफ़ी बची हो सकती है
उसके दुपट्टे के झुटपुटे में?

उसकी बची खुची चीज़ों को
जला डालोगे?
उसकी अनुपस्थिति को भी जला डालोगे?
जो गूँज रही है उसकी उपस्थिति से
बहुत अधिक
सन्तूर की तरह
केश में

तीन

उसे मिटाओगे
एक भागी हुई लड़की को मिटाओगे
उसके ही घर की हवा से
उसे वहाँ से भी मिटाओगे
उसका जो बचपन है तुम्हारे भीतर
वहाँ से भी
मैं जानता हूँ
कुलीनता की हिंसा!

लेकिन उसके भागने की बात
याद से नहीं जाएगी
पुरानी पवन चक्कियों की तरह

वह कोई पहली लड़की नहीं है
जो भागी है
और न वह अन्तिम लड़की होगी
अभी और भी लड़के होंगे
और भी लड़कियाँ होंगी
जो भागेंगे मार्च के महीने में

लड़की भागती है
जैसे फूलों में ग़ुम होती हुई
तारों में ग़ुम होती हुई
तैराकी की पोशाक में दौड़ती हुई
खचाखच भरे जगरमगर स्टेडियम में


चार

अगर एक लड़की भागती है
तो यह हमेशा ज़रूरी नहीं है
कि कोई लड़का भी भागा होगा

कई दूसरे जीवन प्रसंग हैं
जिनके साथ वह जा सकती है
कुछ भी कर सकती है
सिर्फ़ जन्म देना ही स्त्री होना नहीं है

तुम्हारे टैंक जैसे बन्द और मज़बूत
घर से बाहर
लड़कियाँ काफ़ी बदल चुकी हैं
मैं तुम्हे यह इजाज़त नहीं दूँगा
कि तुम अब
उनकी सम्भावना की भी तस्करी करो

वह कहीं भी हो सकती है
गिर सकती है
बिखर सकती है
लेकिन वह खुद शामिल होगी सब में
ग़लतियाँ भी खुद ही करेगी
सब कुछ देखेगी
शुरु से अन्त तक
अपना अन्त भी देखती हुई जाएगी
किसी दूसरे की मृत्यु नहीं मरेगी

पाँच

लड़की भागती है
जैसे सफ़ेद घोड़े पर सवार
लालच और जुए के आर-पार
जर्जर दूल्हों से कितनी धूल उठती है!

तुम
जो
पत्नियों को अलग रखते हो
वेश्याओं से
और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो
पत्नियों से
कितना आतंकित होते हो
जब स्त्री बेखौफ़ भटकती है
ढूँढ़ती हुई अपना व्यक्तितव
एक ही साथ वेश्याओ और पत्नियों
और प्रेमिकाओं में!

अब तो वह कहीं भी हो सकती है
उन आगामी देशों में भी
जहाँ प्रणय एक काम होगा पूरा का पूरा!

छह

कितनी कितनी लड़कियाँ
भागती हैं मन ही मन
अपने रतजगे, अपनी डायरी में
सचमुच की भागी हुई लड़कियों से
उनकी आबादी बहुत बड़ी है

क्या तुम्हारे लिए कोई लड़की भागी?

क्या तुम्हारी रातों में
एक भी लाल मोरम वाली सड़क नहीं?

क्या तुम्हे दाम्पत्य दे दिया गया?
क्या तुम उसे उठा लाए
अपनी हैसियत अपनी ताक़त से?
तुम उठा लाए एक ही बार में
एक स्त्री की तमाम रातें
उसके निधन के बाद की भी रातें!

तुम नहीं रोए पृथ्वी पर एक बार भी
किसी स्त्री के सीने से लगकर

सिर्फ़ आज की रात रुक जाओ
तुम से नहीं कहा किसी स्त्री ने

सिर्फ़ आज की रात रुक जाओ
कितनी कितनी बार कहा कितनी
स्त्रियों ने दुनिया भर में
समुद्र के तमाम दरवाज़ों तक दौड़ती हुई आईं वे
सिर्फ़ आज की रात रुक जाओ
और दुनिया जब तक रहेगी
सिर्फ़ आज की रात रहेगी।

राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित
'दुनिया रोज़ बनती है' से साभार

12 टिप्‍पणियां:

अनिल रघुराज ने कहा…

आलोक धन्वा कुछ भी हों, लेकिन उनकी यह कविता बेजोड़ है...

बोधिसत्व ने कहा…

अच्छा किया भाई
आलोक जी पर कुछ और भी छापना चाहिए, क्योंकि उनके खिलाफ काफी कुछ तय करके छापा जा रहा है। हमारे यहाँ व्यक्ति और चरित्र का भेद बहुत कम होता है। इसलिए व्यक्ति को मारना है तो उसके चरित्र की हत्या कर दो। कुछ लोग आलोक जी को मारने के लिए गोलबंद हैं। उनका सामना किया ही जाना चाहिए।

परमजीत बाली ने कहा…

अच्छी रचनाए प्रेषित की है।बधाई।

Reyaz-ul-haque ने कहा…
इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.
Reyaz-ul-haque ने कहा…

और एक बात.
...क्या आपमें से किसी ने आलोक को यह कविता सुनाते हुए देखा हैं?

शायद हमलोग अपनी आनेवाली नस्लों को बहुत गर्व के साथ बताएंगे कि हमने आलोकजी को यह कविता सुनाते हुए देखा है.

Udan Tashtari ने कहा…

रचना बांटने के लिये आभार. बहुत इच्छा थी इस कविता को पढ़ने की.

बोधिसत्व ने कहा…
इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.
बेनामी ने कहा…
इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.
tejas ने कहा…

beauatiful poem. thank you for sharing. I do not know story of asima and alok, but I have been reading story "about" stry, about story about them.
A writer can write great piece, but as a person, same writer can be shit as person and vice versa.

चंद्रभूषण ने कहा…

हाय वो दीवानगी, जो कभी अपने भी वजूद पे तारी थी और इसी कविता के आईने में नम आंखों से अपनी तस्वीर देखती थी!

अनूप शुक्ला ने कहा…

अच्छा किया जो ये कवितायें पढ़वाईं। राय बनाने के बारे में तो यही राय है कि राय बनाना जारी रखें। बाद में और आंकड़े मिलने पर उसमें सुधार या बदलाव होता रहेगा। :)

अपना घर ने कहा…

आलोक जी की इस कविता को पढ़ कर ये पंक्तिया मन में गूँजती रहीं-
मेरे महबूब ना जा, आज की रात ना जा
अभी बाकी है सहर
थोड़ी देर और ठहर।
मुझे लगता है कि आलोक जी इन पंक्तियों से बहुत प्रभावित रहे होंगे।

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