यदि जीवन जीना किसी भी प्राणी की सबसे बड़ी प्रवृत्ति है तो उसका पुनरुत्पादन भी उसी वृत्ति का ही एक पक्ष है। ये एक दूसरी बात है कि मनुष्य ने अपने विकास क्रम में उसी यौन-वृत्ति को अपराध भावना और ग्लानि से जोड़ दिया है जो जीवन की इस निरन्तरता का आधार है। इस अपराध-बोध में धर्म की भूमिका केन्द्रीय रही है। पर मैं यहाँ कुछ और ही बात करना चाह रहा हूँ.. कि ऊपर दिये हुए तर्क के बाद यह कहना अनुचित न होगा कि इंसान अपनी औलाद के ज़रिये अपने जीवन को जारी रखता है। दूसरे शब्दों में किसी के बच्चे ही उसका अगला जन्म हैं।आप को मेरी बात अनोखी ज़रूर लग सकती है। मगर मैं अपनी बात के लिए शास्त्रों का भी साक्ष्य देना चाहूँगा। ज्योतिष का साक्ष्य- किसी भी व्यक्ति की कुण्डली में पाँचवा स्थान उसकी सन्तान का स्थान होता है और वही अगले जन्म का भी। नवाँ स्थान माता-पिता गुरुजनों का स्थान होता है और वही पूर्वजन्म का भी।
ठीक है चलिये ये मान लिया गया कि हम अपने औलाद के ज़रिये और और जीते ही जाते हैं। वैज्ञानिक शब्दावलि में कहें तो अपने डी एन ए कोड को सफ़र में रखते हैं, भले ही संवर्धित करते हुए। एक रिले रेस के धावक की तरह- पीछे से बेटन लेकर बस आगे तक दे देते हैं। अपने जीवन काल में हम जो जीवन के बारे में अच्छा-बुरा सीखते हैं वह उस ब्लूप्रिन्ट में कोडीफ़ाई कर देते हैं।.. क्या सचमुच? क्योंकि अगर ऐसा होता तो माता/पिता के जीवन के सारे अनुभव/ज्ञान सब बेटे/ बेटी को स्वतः पता चल जाते। मगर ऐसा होता नहीं। तो या तो ये पूरी प्रस्थापना ही गलत है या स्मृति/ज्ञान इतना महत्वहीन कि इसे कोडीफ़ाई करने की कोई ज़रूरत नहीं समझता हमारा शरीर/ प्रकृति/ ईश्वर। आप का क्या ख्याल है?