गुरुवार, 1 नवंबर 2007

आपका अगला जन्म

कहते हैं कि इंसान सबसे अधिक प्यार अपनी औलाद को करता है। माँ के बच्चों के प्रति प्रेम/ समर्पण को कितना महिमामण्डित किया गया है। पिता के बारे में भी कहा जाता है कि वह प्रदर्शित नहीं करता मगर जो कुछ करता है औलाद के लिए ही। काफ़ी हद तक सच भी है यह बात। हम मनुष्य ही नहीं प्रकृति का एक-एक अवयव, सभी जीवित पदार्थ स्वयं का पुनरुत्पादन कर रहे हैं। बैक्टीरिया से लेकर पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सभी अपने सीमित जीवन काल को अनन्त काल तक खींचने के लिए अपने ही जैसी संरचना को अपने भीतर से जन्म देकर अपने से स्वतंत्र कर देते हैं। और अपनी मृत्यु के बाद भी एक दूसरे स्वरूप में जीवित रहते हैं।

यदि जीवन जीना किसी भी प्राणी की सबसे बड़ी प्रवृत्ति है तो उसका पुनरुत्पादन भी उसी वृत्ति का ही एक पक्ष है। ये एक दूसरी बात है कि मनुष्य ने अपने विकास क्रम में उसी यौन-वृत्ति को अपराध भावना और ग्लानि से जोड़ दिया है जो जीवन की इस निरन्तरता का आधार है। इस अपराध-बोध में धर्म की भूमिका केन्द्रीय रही है। पर मैं यहाँ कुछ और ही बात करना चाह रहा हूँ.. कि ऊपर दिये हुए तर्क के बाद यह कहना अनुचित न होगा कि इंसान अपनी औलाद के ज़रिये अपने जीवन को जारी रखता है। दूसरे शब्दों में किसी के बच्चे ही उसका अगला जन्म हैं।

आप को मेरी बात अनोखी ज़रूर लग सकती है। मगर मैं अपनी बात के लिए शास्त्रों का भी साक्ष्य देना चाहूँगा। ज्योतिष का साक्ष्य- किसी भी व्यक्ति की कुण्डली में पाँचवा स्थान उसकी सन्तान का स्थान होता है और वही अगले जन्म का भी। नवाँ स्थान माता-पिता गुरुजनों का स्थान होता है और वही पूर्वजन्म का भी।

ठीक है चलिये ये मान लिया गया कि हम अपने औलाद के ज़रिये और और जीते ही जाते हैं। वैज्ञानिक शब्दावलि में कहें तो अपने डी एन ए कोड को सफ़र में रखते हैं, भले ही संवर्धित करते हुए। एक रिले रेस के धावक की तरह- पीछे से बेटन लेकर बस आगे तक दे देते हैं। अपने जीवन काल में हम जो जीवन के बारे में अच्छा-बुरा सीखते हैं वह उस ब्लूप्रिन्ट में कोडीफ़ाई कर देते हैं।

.. क्या सचमुच? क्योंकि अगर ऐसा होता तो माता/पिता के जीवन के सारे अनुभव/ज्ञान सब बेटे/ बेटी को स्वतः पता चल जाते। मगर ऐसा होता नहीं। तो या तो ये पूरी प्रस्थापना ही गलत है या स्मृति/ज्ञान इतना महत्वहीन कि इसे कोडीफ़ाई करने की कोई ज़रूरत नहीं समझता हमारा शरीर/ प्रकृति/ ईश्वर। आप का क्या ख्याल है?

एक मोहल्ला दो कबाड़ी

आजकल अपने हिन्दी ब्लॉग्स की दुनिया में कबाड़ के प्रति कुछ अधिक ही प्रेम उमड़ रहा है। मित्र इरफ़ान के नाम के साथ जुड़कर कबाड़खाना नामक इस ब्लॉग पर पहले-पहले दृष्टि गई थी मेरी। अशोक पाण्डे नामक बन्धु चला रहे हैं इसे.. या उनके शब्दों में कहें तो खरीद रहे हैं पेप्पोर रद्दी पेप्पोर.. लगभग दो महीने हो गए उन्हे अपने मोहल्ले में आए..

इस बीच मैं घूमता-घामता रहा और फिर कुछ कामकाजी बना रहा तो बहुत देख नहीं पाया पाण्डे जी ने क्या-क्या खरीदा। आज अचानक देखता हूँ कि अशोक जी के धंधे में सेंध लगाने एक और कबाड़ी आ गया है। ब्लॉगवाणी पर कबाड़खाना देखा और नाम देखा विकास परिहार। सोचा कि जैसे आजकल तमाम लोग सामूहिक ब्लॉग चला रहे हैं तो ये भी उनके कबाड़ी परिवार के एक सदस्य होंगे। कबाड़खाना पर जा कर देखा तो एक जगमगाती गज़ल सुगबुगा रही थी।

पर मुझे कुछ अजीब सी बू आ रही थी। ये तो किसी दूसरी दुकान पर चला आया हूँ। बहुत खोजने पर भी अशोक पाण्डे का नाम नहीं मिला। फिर इरफ़ान के ब्लॉग से उनके ब्लॉगरोल में जाकर कबाड़खाना पर क्लिक किया तो एक दूसरे दुकान पर पहुँचा। इसका नाम भी कबाड़खाना था। किन्ही कामरेड पंत जी के संस्कृत कबाड़ की एक रोचक कहानी कोई ताज़ी-ताज़ी बेच कर गया था।

ह्म्म.. तो राज़ खुला कि वाक़ई एक ही नाम से दो ब्लॉग सक्रिय हैं.. उनके पते में भी सिर्फ़ एक 'a' का ही फ़र्क है और दोनों सक्रिय भी लगभग एक ही समय पर हुए हैं। दोनों श्रेष्ठ कबाडि़यों से मेरा निवेदन है कि भाई एक ही मोहल्ले में रहना है.. कबाड़ खरीदना-बेचना है.. तो थोड़ा आपस में समझौता कर के नाम में कुछ अन्तर कर लो। जनता के लिए थोड़ी सहूलियत होगी और आप के लिए भी।

ब्लॉगरोल की नई छटा

बहुत दिनों से टल रहा था यह काम। क्योंकि इसमें मेहनत थी और सर खपाई थी। मगर कल चार घंटे के कड़े परिश्रम के उपरांत यह काम कर ही डाला। अपने ब्लॉगरोल को एक नई शक्ल दे डाली। पहले भी उसमें कुछ कम चिट्ठे नहीं थे.. अब तो पचास से ऊपर चले गए हैं। मगर चूँकि श्रेणियों में विभाजित हैं तो भीड़ जैसे नहीं लगते। कुछ समय पहले इसकी चर्चा अनिल भाई ने भी की थी.. बेहतर होने की सम्भावना अभी भी अनेको होंगी पर मुझे तो पहले से ठीक ही लग रहा है।
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