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गुरुवार, 1 नवंबर 2007
ब्लॉगरोल की नई छटा
बहुत दिनों से टल रहा था यह काम। क्योंकि इसमें मेहनत थी और सर खपाई थी। मगर कल चार घंटे के कड़े परिश्रम के उपरांत यह काम कर ही डाला। अपने ब्लॉगरोल को एक नई शक्ल दे डाली। पहले भी उसमें कुछ कम चिट्ठे नहीं थे.. अब तो पचास से ऊपर चले गए हैं। मगर चूँकि श्रेणियों में विभाजित हैं तो भीड़ जैसे नहीं लगते। कुछ समय पहले इसकी चर्चा अनिल भाई ने भी की थी.. बेहतर होने की सम्भावना अभी भी अनेको होंगी पर मुझे तो पहले से ठीक ही लग रहा है।
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