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मंगलवार, 22 अप्रैल 2008

बेईमान रिक्षेवाले

आज से मुम्बई में तीन दिन की ऑटो-रिक्षावालों की हड़ताल चालू हो गई है। आम लोगों को इस हड़ताल से काफ़ी तक्लीफ़ है.. हर हड़ताल में होती ही है। मामला नए इलेक्ट्रानिक मीटर लगाने का है.. सरकार उन्हे ठेल रही है पर रिक्षेवाले तैयार नहीं हैं। सीधे-सीधे कुछ हज़ार का ज़बरदस्ती का खरचा है- कोई क्यों उठाना चाहेगा- बात समझ में आती है। आप ही को अगर सरकार बोले कि सब लोग अपनी कार-मोबाइक के अच्छे-खासे टायर बदलो तो आप भी शायद हड़ताल कर बैठें।

मगर यहाँ एक दूसरी दलील भी प्रच्छन्न है- वो ये कि मेकेनिकल मीटर के साथ खेल किया जा सकता है पर इलेक्ट्रानिक मीटर के साथ नहीं। ह्म्म.. जनता इस तर्क को निगलने को तैयार है क्योंकि सब लोग जानते हैं कि ये रिक्षेवाले साले बड़े लूटते हैं।

इसमें दो बाते हैं। एक तो यह कि ये सोच लेना कि इलेक्ट्रानिक मीटर के साथ छेड़छाड़ नहीं हो सकेगी थोड़ा बचकाना है और दूसरी यह कि इसमें सारे रिक्षेवालों को बेईमान और चोर कहा जा रहा है। आप कहेंगे कि वो तो साले हैं ही। चलिए मान लिया कि सब रिक्षे वाले बेईमान हैं। देश के बहुत सारे निम्न-मध्यम-वर्गीय लोगों की तरह उनकी भी आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपैया है। और आमदनी क्या.. महीने कुल मिलाकर छै-सात हजार रुपैया.. चोरी-बेईमानी करके आम आदमी को लूटने के बाद?

क्या कहना! अब इस तस्वीर के एक और पहलू पर भी विचार तो कीजिए। आप को क्या लगता है कि सरकार आम आदमी की इस रोज़-रोज़ की लूट को रोकने के लिए ये प्रगतिशील क़दम उठा रही है। क्या आप के देश की सत्ता पर आसीन लोग क्या सचमुच ऐसे नेक मक़सदों से प्रेरित होते हैं? वो किस तरह से काम करते हैं क्या आप नहीं जानते?

अच्छा आप बताइये कि ये जो इलेक्ट्रानिक मीटर लगाए जा रहे हैं वो बाज़ार में कहीं से भी तमाम मॉडलों में से चुनकर कोई भी के लगाया जा सकेगा? या कोई एक खास कम्पनी का खास मॉडल ही इस सम्मान का अधिकारी होगा? आप जानते हैं ऐसे में एक खास स्टैन्डर्ड मॉडल ही होता है। और अगर ये नया मीटर लागू हो गया तो इस खास कम्पनी की तो लॉटरी निकल आएगी.. नहीं?

और इसमें कम्पनी के मालिकों, ट्रान्सपोर्ट मंत्री, आर.टी.ओ. के अधिकारियों के बीच किसी साँठ-गाँठ होने की या कम्पनी का फ़ायदा कराने के लिए इस नीति को लागू करने के किसी षड्यंत्र होने का तो दूर-दूर तक कोई सवाल ही नहीं उठता क्योंकि चोर और बेईमान तो सिर्फ़ रिक्षेवाले, रेलवे टी.टी. और ट्रैफ़िक हवलदार होते हैं। इसलिए इसमें फ़ायदा अगर किसी का है तो सिर्फ़ आम जनता का.. !!??

.. मैं सोचने लगता हूँ कि दिल्ली में भी तो इलेक्ट्रानिक मीटर लगाया गया पर सुनते हैं वहाँ अब रिक्षेवालों ने मीटर से जाना ही बंद कर दिया। और अगर मान लीजिये कि नए मीटर लागू हो गए और उस से रिक्षेवालों की बेईमानी के चलते तीस-चालीस प्रतिशत किराए सीधे कम हो गए.. तो क्या उसके बाद रिक्षेवाले किराए में वृद्धि के लिए हड़ताल नहीं करेंगे? या आप ये सोचते हैं कि बैठते हैं तो बैठें.. पर उनकी सुनी नहीं जानी चाहिये क्योंकि उन्होने बेईमानी की और उन्हे अपने इस पाप का फल ऐसे ही मिलना चाहिए?

क्या हमें ऐसा सोचने का हक़ है? खास तौर पर उस देश में जहाँ लोग बैठे-बैठे चार-पाँच सौ करोड़ निगल जाते हैं और न डकार लेते हैं न पादते हैं। उसी देश में जहाँ किसान दस-बीस हज़ार के कर्ज़ का बोझ सहन नहीं कर पाते और पेड़ से लटक जाते हैं।
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